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Maharajganj News: दुग्ध समितियां तोड़ रहीं दम, उत्पादन बढ़ाने की जद्दोजहद
Sun, 01 Jun 2025 12:38 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
Updated Sun, 01 Jun 2025 12:38 AM IST
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महराजगंज। एक जून को विश्व दुग्ध दिवस मनाया जाता है। दूध उत्पादन में जनपद सिर्फ सूबे में ही नहीं, बल्कि मंडल में भी आखिरी पायदान पर है। दुग्ध समितियों से रोजाना महज 958 लीटर दूध का ही उत्पादन होता है। दूध उत्पादन के लिए 2015 में 189 दुग्ध समिति संचालित थीं जिसमें महज 50 शेष हैं।
इसमें से भी सिर्फ 35 समितियां ही मौजूदा समय में संचालित हैं। 1000 लीटर दुग्ध संग्रहण क्षमता का अवशीतन केंद्र भी है। जिले की सबसे बड़ी दुग्ध उत्पादन समिति निचलौल में महाराजा डेयरी की थी, यहां 189 गाय पाली गई थी। समिति मई 2025 में बंद हो गई। बताया जाता है कि पारंपरिक तरीके से यहां गो पालन किया जा रहा था, जबकि जरूरत आधुनिक और नवाचार वाले तरीके से करने की थी।
अन्य दुग्ध उत्पादन समितियों के दम तोड़ने का कारण भी कुछ इसी से मिलता जुलता रहा। बीते माह बंद हुए महाराजा डेयरी के संचालक उदयशंकर मिश्र कहते हैं कि जनपद में डेयरी के क्षेत्र में रोजगार की बड़ी संभावना है, लेकिन इसमें निवेश करने वाले और शिक्षित युवाओं को आगे आने की जरूरत है।
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सरकारी अनुदान या ऋण से डेयरी कारोबार तब तक नहीं उपयोगी हो सकता जबतक अनुदान की प्रक्रिया सरल नहीं होती। अनुदान देने के बाद कम से कम पांच वर्ष का समय भी विकसित होने के लिए चाहिए।
संचालन पढ़े-लिखे युवाओं के हाथ में रहे जो नवाचार व आधुनिक व तकनीकी संसाधनों को व्यवस्थित कराकर संचालन व्यवस्था प्रभावी करें। देसी और विदेशी नस्ल का तालमेल, कृत्रिम गर्भाधान व्यवस्था इत्यादि डेयरी विकास के महत्वपूर्ण अंग बन चुके हैं।
19,77,100 हैं दूध के लिए गाय व भैंस
पशु चिकित्सा विभाग की तरफ से हुए 2025 की पशु गणना के मुताबिक जिले में दूध के लिए 70470 गाय व 190630 की संख्या में भैंस का पालन किया गया है। इस संख्या के आधार पर दूध उत्पादन जनपद की मांग के सापेक्ष 20 फीसदी भी नहीं है।
प्रत्येक ब्लॉक में 10 समिति संचालन की आवश्यकता
डेयरी विकास विभाग के पर्यवेक्षक/स्थानीय प्रभारी उमाशंकर शर्मा के अनुसार, प्रत्येक विकास खंड में कम से कम 10 डेयरी संचालित हो तब कहीं मांग की पूर्ति व आत्मनिर्भरता की स्थिति विकसित हो सकती है, लेकिन इसके लिए एक ब्लाॅक में 100 करोड़ रुपये तक निवेश करना होगा। बिना निवेश के सरकारी अनुदान से उत्पादन में आत्मनिर्भरता की उम्मीद बेमानी है।
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इसमें से भी सिर्फ 35 समितियां ही मौजूदा समय में संचालित हैं। 1000 लीटर दुग्ध संग्रहण क्षमता का अवशीतन केंद्र भी है। जिले की सबसे बड़ी दुग्ध उत्पादन समिति निचलौल में महाराजा डेयरी की थी, यहां 189 गाय पाली गई थी। समिति मई 2025 में बंद हो गई। बताया जाता है कि पारंपरिक तरीके से यहां गो पालन किया जा रहा था, जबकि जरूरत आधुनिक और नवाचार वाले तरीके से करने की थी।
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अन्य दुग्ध उत्पादन समितियों के दम तोड़ने का कारण भी कुछ इसी से मिलता जुलता रहा। बीते माह बंद हुए महाराजा डेयरी के संचालक उदयशंकर मिश्र कहते हैं कि जनपद में डेयरी के क्षेत्र में रोजगार की बड़ी संभावना है, लेकिन इसमें निवेश करने वाले और शिक्षित युवाओं को आगे आने की जरूरत है।
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सरकारी अनुदान या ऋण से डेयरी कारोबार तब तक नहीं उपयोगी हो सकता जबतक अनुदान की प्रक्रिया सरल नहीं होती। अनुदान देने के बाद कम से कम पांच वर्ष का समय भी विकसित होने के लिए चाहिए।
संचालन पढ़े-लिखे युवाओं के हाथ में रहे जो नवाचार व आधुनिक व तकनीकी संसाधनों को व्यवस्थित कराकर संचालन व्यवस्था प्रभावी करें। देसी और विदेशी नस्ल का तालमेल, कृत्रिम गर्भाधान व्यवस्था इत्यादि डेयरी विकास के महत्वपूर्ण अंग बन चुके हैं।
19,77,100 हैं दूध के लिए गाय व भैंस
पशु चिकित्सा विभाग की तरफ से हुए 2025 की पशु गणना के मुताबिक जिले में दूध के लिए 70470 गाय व 190630 की संख्या में भैंस का पालन किया गया है। इस संख्या के आधार पर दूध उत्पादन जनपद की मांग के सापेक्ष 20 फीसदी भी नहीं है।
प्रत्येक ब्लॉक में 10 समिति संचालन की आवश्यकता
डेयरी विकास विभाग के पर्यवेक्षक/स्थानीय प्रभारी उमाशंकर शर्मा के अनुसार, प्रत्येक विकास खंड में कम से कम 10 डेयरी संचालित हो तब कहीं मांग की पूर्ति व आत्मनिर्भरता की स्थिति विकसित हो सकती है, लेकिन इसके लिए एक ब्लाॅक में 100 करोड़ रुपये तक निवेश करना होगा। बिना निवेश के सरकारी अनुदान से उत्पादन में आत्मनिर्भरता की उम्मीद बेमानी है।