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Maharajganj News: शिक्षित व्यक्ति को नहीं होता भय, हर जगह प्राप्त करता है सुख
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गोरखनाथ मंदिर स्थित महंत दिग्विजय नाथ स्मृति सभागार में ब्रह्मलीन महंत दिग्विजय नाथ महाराज और ब
ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ व महंत अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित संगोष्ठी में बोलीं प्रो. सुषमा यादव
गोरखपुर। नई शिक्षा नीति, शिक्षा और दीक्षा के अंतर को कम करने वाली नीति है। इसमें शिक्षा और दीक्षा दोनों की प्रक्रिया को विकसित करने का प्रयास किया गया है। शिक्षित व्यक्ति को कभी भय नहीं होता क्योंकि वह जहां जाएगा, अपनी शिक्षा से सुख प्राप्त करेगा। यह नीति सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त शिक्षा देने की नीति है। शिक्षा का उद्देश्य हर व्यक्ति में दिव्य ज्योति जलाना व विलक्षणता को प्रकट करना है।
ये बातें ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 56वीं व महंत अवेद्यनाथ की 11वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित संगोष्ठी के तीसरे दिन ''''राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: विकसित भारत की आधारशिला'''' विषय पर मुख्य वक्ता भगतफूल सिंह महिला विश्वविद्यालय सोनीपत हरियाणा की पूर्व कुलपति प्रो. सुषमा यादव ने कहीं।
उन्होंने कहा कि इस नीति में स्कूल शिक्षा के बाद महाविद्यालयी, उसके बाद विश्वविद्यालयी शिक्षा में परिवर्तन करने पर विचार हुआ है। हर नागरिक के लिए अच्छे जीवन स्तर के साथ देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर बल दिया गया है। भारत विकसित बनना चाहता है लेकिन पर्यावरण के संतुलन के साथ।
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विशिष्ट वक्ता दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, प्राणि विज्ञान के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डीके सिंह ने कहा कि तेजी से बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति है। छात्रों को डिजिटल शिक्षा के साथ-साथ भारतीय भाषाओं में भारतीय ज्ञान परंपरा की शिक्षा इस नीति का केंद्र बिंदु है। यह नीति भारत की आत्मा की पुकार है। इसके पीछे हमारे गुरुकुल शिक्षा परंपरा का विस्तार है।
अयोध्याधाम से आए स्वामी बालभरत दास ने कहा कि इस शिक्षा नीति में हमारी उस प्राचीन भारतीय शिक्षा को अपनाया गया है, जहां शस्त्र और शास्त्र दोनों की समान शिक्षा दी जाती है। यह नीति केवल पेट भरने की ही नहीं बल्कि मानव को पूर्ण मानव बनने की नीति है।
कामदगिरि पीठ, चित्रकूट धाम से आए महंत शशिभूषण दास ने कहा कि मानव जीवन में शिक्षा का बहुत महत्व है। हमारे मनीषियों ने उस विद्या की बात की जो मुक्ति प्रदान करे, ऐसी शिक्षा नीति जो नियुक्ति तथा विमुक्ति दोनों को दिलाने का सामर्थ्य रखती हो।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली, संस्कृत विभाग के प्रो संतोष शुक्ल ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 है जो पूर्ण रूप से भारतीय विरासत पर आधारित है। इस नीति का पहला लक्ष्य समावेशी शिक्षा पर जोर देना है।
अध्यक्षता गोरक्षनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ, स्वागत भाषण महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के उपाध्यक्ष राजेश मोहन सरकार, वैदिक मंगलाचरण डॉ. रंगनाथ त्रिपाठी, गोरक्षाष्टक पाठ आदित्य पांडेय तथा संचालन डॉ. भगवान सिंह ने किया। कार्यक्रम में काशी से आए जगद्गुरु विष्णुस्वामी संप्रदायाचार्य संतोषाचार्य सतुआ बाबा, महंत रामलखन दास, महंत राममिलन दास, बड़ौदा से महंत गंगादास, सच्चाबाबा आश्रम अरैल से आचार्य शिवप्रकाश, देवीपाटन महंत मिथिलेशनाथ प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
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गोरखपुर। नई शिक्षा नीति, शिक्षा और दीक्षा के अंतर को कम करने वाली नीति है। इसमें शिक्षा और दीक्षा दोनों की प्रक्रिया को विकसित करने का प्रयास किया गया है। शिक्षित व्यक्ति को कभी भय नहीं होता क्योंकि वह जहां जाएगा, अपनी शिक्षा से सुख प्राप्त करेगा। यह नीति सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त शिक्षा देने की नीति है। शिक्षा का उद्देश्य हर व्यक्ति में दिव्य ज्योति जलाना व विलक्षणता को प्रकट करना है।
ये बातें ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 56वीं व महंत अवेद्यनाथ की 11वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित संगोष्ठी के तीसरे दिन ''''राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: विकसित भारत की आधारशिला'''' विषय पर मुख्य वक्ता भगतफूल सिंह महिला विश्वविद्यालय सोनीपत हरियाणा की पूर्व कुलपति प्रो. सुषमा यादव ने कहीं।
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उन्होंने कहा कि इस नीति में स्कूल शिक्षा के बाद महाविद्यालयी, उसके बाद विश्वविद्यालयी शिक्षा में परिवर्तन करने पर विचार हुआ है। हर नागरिक के लिए अच्छे जीवन स्तर के साथ देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर बल दिया गया है। भारत विकसित बनना चाहता है लेकिन पर्यावरण के संतुलन के साथ।
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विशिष्ट वक्ता दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, प्राणि विज्ञान के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डीके सिंह ने कहा कि तेजी से बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति है। छात्रों को डिजिटल शिक्षा के साथ-साथ भारतीय भाषाओं में भारतीय ज्ञान परंपरा की शिक्षा इस नीति का केंद्र बिंदु है। यह नीति भारत की आत्मा की पुकार है। इसके पीछे हमारे गुरुकुल शिक्षा परंपरा का विस्तार है।
अयोध्याधाम से आए स्वामी बालभरत दास ने कहा कि इस शिक्षा नीति में हमारी उस प्राचीन भारतीय शिक्षा को अपनाया गया है, जहां शस्त्र और शास्त्र दोनों की समान शिक्षा दी जाती है। यह नीति केवल पेट भरने की ही नहीं बल्कि मानव को पूर्ण मानव बनने की नीति है।
कामदगिरि पीठ, चित्रकूट धाम से आए महंत शशिभूषण दास ने कहा कि मानव जीवन में शिक्षा का बहुत महत्व है। हमारे मनीषियों ने उस विद्या की बात की जो मुक्ति प्रदान करे, ऐसी शिक्षा नीति जो नियुक्ति तथा विमुक्ति दोनों को दिलाने का सामर्थ्य रखती हो।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली, संस्कृत विभाग के प्रो संतोष शुक्ल ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 है जो पूर्ण रूप से भारतीय विरासत पर आधारित है। इस नीति का पहला लक्ष्य समावेशी शिक्षा पर जोर देना है।
अध्यक्षता गोरक्षनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ, स्वागत भाषण महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के उपाध्यक्ष राजेश मोहन सरकार, वैदिक मंगलाचरण डॉ. रंगनाथ त्रिपाठी, गोरक्षाष्टक पाठ आदित्य पांडेय तथा संचालन डॉ. भगवान सिंह ने किया। कार्यक्रम में काशी से आए जगद्गुरु विष्णुस्वामी संप्रदायाचार्य संतोषाचार्य सतुआ बाबा, महंत रामलखन दास, महंत राममिलन दास, बड़ौदा से महंत गंगादास, सच्चाबाबा आश्रम अरैल से आचार्य शिवप्रकाश, देवीपाटन महंत मिथिलेशनाथ प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।