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सिसवां की माटी में आज भी झलकता है क्रांति का तेज
Updated Mon, 14 Aug 2017 04:43 PM IST
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सिसवा बाजार (महराजगंज)। अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करने पर यातनाओं की अति, सिसवां और यहां के अगल-बगल के रहने वाले हमारे पुरखों की यही कहानी है। सिसवां ब्लॉक के खेसरारी गांव की माटी में आज भी क्रांति का तेज महसूस होता है। यहां के रणबांकुरों ने संघर्ष के बल पर आजादी हासिल करने में अपने जान की बाजी तक लगा दिया था। इन वीर सेनानियों की गौरव गाथा आज भी ग्राम सभा सिसवा बुजुर्ग स्थित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्तंभ ही बयां करता है, जहां इन रणबांकुरों को हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्रता दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में दिल से याद किया जाता है।
1930 में प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना की अगुआई में खेसरारी गांव के विश्वनाथ सिंह, सुंदर सिंह, रामप्रसाद भालोटिया, ब्रजभूषण लोनिया, मदन पांडेय, तिलक चौधरी, दामोदर शर्मा, पारस नाथ पांडेय, रामबली भगत, सुदामा प्रसाद, मातादीन मद्धेशिया, कपिलदेव व रामदयाल ने अंग्रेजी हुकूमत की ओर से लगाये गए लगान का का विरोध करते हुए सिसवां क्षेत्र में बगावत का बिगुल फूंक दिया। इससे नाराज अंग्रेजी हुकूमत के आदेश पर अंग्रेज सैनिकों ने खेसरारी गांव में धावा बोल दिया और पूरे गांव को जमकर लूटा। अंग्रेजी हुकूमत की फ़ौज की संख्या बल अधिक होने के कारण इन सेनानियों को पीछे हटना पड़ा। प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना के साथ महात्मा गांधी से मिलकर अंग्रेजी हुकूमत द्वारा की गई बर्बरतापूर्ण कार्रवाई से अवगत कराया। इस मामले को महात्मा गांधी ने 1931 में इंग्लैंड में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में प्रमुखता से उठाया, जिसके परिणाम स्वरूप बाद में बाबा राघवदास की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय जांच कमेटी का गठन किया गया। स्वाधीनता की लड़ाई में कई लोग शहीद हो गए। इन सेनानियों की याद को दिल में जिंदा रखने के लिए ग्राम सभा सिसवा बुजुर्ग के प्राथमिक विद्यालय परिसर में शहीद स्मारक का निर्माण कराया गया है। इस स्मारक पर खेसरारी की घटना का स्वर्णिम इतिहास सुनहरे अक्षरों में दर्ज किया गया है। जहां सिसवां की माटी में आज भी क्रांति के तेज को झलकते हुए देखा जा सकता है।
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1930 में प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना की अगुआई में खेसरारी गांव के विश्वनाथ सिंह, सुंदर सिंह, रामप्रसाद भालोटिया, ब्रजभूषण लोनिया, मदन पांडेय, तिलक चौधरी, दामोदर शर्मा, पारस नाथ पांडेय, रामबली भगत, सुदामा प्रसाद, मातादीन मद्धेशिया, कपिलदेव व रामदयाल ने अंग्रेजी हुकूमत की ओर से लगाये गए लगान का का विरोध करते हुए सिसवां क्षेत्र में बगावत का बिगुल फूंक दिया। इससे नाराज अंग्रेजी हुकूमत के आदेश पर अंग्रेज सैनिकों ने खेसरारी गांव में धावा बोल दिया और पूरे गांव को जमकर लूटा। अंग्रेजी हुकूमत की फ़ौज की संख्या बल अधिक होने के कारण इन सेनानियों को पीछे हटना पड़ा। प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना के साथ महात्मा गांधी से मिलकर अंग्रेजी हुकूमत द्वारा की गई बर्बरतापूर्ण कार्रवाई से अवगत कराया। इस मामले को महात्मा गांधी ने 1931 में इंग्लैंड में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में प्रमुखता से उठाया, जिसके परिणाम स्वरूप बाद में बाबा राघवदास की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय जांच कमेटी का गठन किया गया। स्वाधीनता की लड़ाई में कई लोग शहीद हो गए। इन सेनानियों की याद को दिल में जिंदा रखने के लिए ग्राम सभा सिसवा बुजुर्ग के प्राथमिक विद्यालय परिसर में शहीद स्मारक का निर्माण कराया गया है। इस स्मारक पर खेसरारी की घटना का स्वर्णिम इतिहास सुनहरे अक्षरों में दर्ज किया गया है। जहां सिसवां की माटी में आज भी क्रांति के तेज को झलकते हुए देखा जा सकता है।
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