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Lalitpur News: जब अंग्रेजों की गुलामी न स्वीकारने पर पं. झुनारे रावत को सरेआम लटका दिया था फंदे पर
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- अंग्रेजों के हुक्म के चलते सात दिन तक लटकता रहा था शव
पेड़ आज भी दे रहा है अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता की गवाही
अशोक तिवारी
ललितपुर। आजादी की लड़ाई में ललितपुर भी पीछे नहीं रहा। जिले में ऐसे क्रांतिकारी भी हुए, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में खुद को बलिदान कर दिया और हंसते-हंसते वह देश की आन-बान और शान के लिए शहीद हो गए। ऐसे ही क्रांतिकारी थे शहीद पंडित झुनारे रावत, जिन्होंने अंग्रेजों की दासता स्वीकार नहीं की और हंसते-हंसते फंदे पर लटककर अपनी कुर्बानी दे दी।
देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाने के लिए चलाए गए आंदोलनों में जिले के देशभक्तों की सक्रिय भूमिका रही। इनमें मोहल्ला सुभाषपुरा निवासी क्रांतिकारी पंडित झुनारे रावत 25-30 वर्ष की आयु में अपने गोरिल्ला युद्ध कौशल से अंग्रेजी शासन की चूलें हिला दी थीं। झुनारे रावत की पांचवी पीढ़ी के महेंद्र और देवेंद्र रावत बताते हैं कि उनके दादा परदादा उन्हें बताते थे कि झुनारे रावत के गोरिल्ला युद्ध से अंग्रेजी सेना सहित अंग्रेज अफसर भी थर-थर कांपते थे। बताते हैं कि 1857 में अंग्रेजी की सेना के सेनापति जॉन बेबेस्टस के नेतृत्व में चंदेरी के राजा मौर्य प्रहलाद को पराजित कर दिया था। इस दौरान अंग्रेजी सेना ललितपुर में अपनी छावनी बनाए थे। अंग्रेजी सेना ललितपुर के लोगों और महिलाओं पर अत्याचार करने लगे। हालत यह हो गई थी कि महिलाएं घर से बाहर नहीं निकल पाती थीं। यह देखकर क्रांतिकारी परिवार में जन्मे पंडित झुनारे रावत के मन में अंग्रेजों के प्रति नफरत और देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने की लगन लग गई। झुनारे रावत ने आसपास एक देशभक्तों को जोड़कर एक छोटी सी सेना तैयार की थी। जिसमें करीब 500 सैनिक थे। उनके सेना के सभी सैनिक वीर योद्धा और गोरिल्ला युद्ध में पारंगत थे। झुनारे रावत की सेना अंग्रेजों पर इसी युद्धकला का प्रयोग करते हुए आक्रमण करते थे। झुनारे रावत और उनकी सेना का अंग्रेजी सेना को काफी भय रहता था और वह उन्हें पकड़ने के लिए जुटे हुए थे।
फरवरी 1858 में अमझरा घाटी से जब अंग्रेजी सेना ललितपुर की ओर बढ़ी तो वर्तमान में ग्राम मसौरा खुर्द के निकट स्थित गांव सांकली के पास पंडित झुनारे रावत ने करीब अपने सैनिकों के साथ अंग्रेजी सेना पर हमला बोल दिया था। अचानक हुए हमले से अंग्रेजी सेना संभल नहीं पाई। पंडित झुनारे रावत की सेना ने इस युद्ध में गोरिल्ला युद्ध की तकनीक अपनाकर दो दिन तक चली लड़ाई में कई अंग्रेजी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था और चारों दिशाओं में भाग गए थे। लेकिन झुनारे रावत का घोड़ा गिर गया था। जिस कारण से अंग्रेजी सेना ने उन्हें घेरकर बंदी बना लिया था। अंग्रेजी सेना झुनारे रावत को ललितपुर लेकर आई और कई दिनों तक उन्हें तरह तरह से प्रताड़ित किया। अंग्रेजों ने दासता स्वीकारने की बात कही। लेकिन क्रांतिकारी पंडित झुनारे रावत ने उनकी दासता स्वीकार नहीं की। इसके बाद उनके पैतृक निवास के बाहर खड़े नीम-पीपल के पेड़ पर सरेआम रस्सी के फंदे पर लटका दिया था। अंग्रेजों ने यह भी हुक्म दिया था कि जो कोई भी पंडित झुनारे रावत के शव को हाथ लगाएगा या उतारेगा उसका भी यह अंजाम किया जाएगा। अंग्रेजाें के हुक्म के चलते पंडित झुनारे रावत का शव पेड़ पर करीब सात दिनों तक लटका रहा था। पंडित झुनारे रावत को पकड़कर फंदे पर लटका देने के बाद अंग्रेज अफसर इतने खुश थे कि उन्होंने 11 मार्च 1858 को ललितपुर में विजय उत्सव मनाया था। वर्तमान में इस स्थान पर नीम का पेड़ तो नहीं लेकिन पीपल का पेड़ लगा है और चबूतरा बना है। जिसे पंडित पंडित झुनारे रावत शहीदी स्थल कहते हैं। यहां पर शंकरजी का एक मंदिर बना हुआ है। जहां पर प्रतिवर्ष भादों माह में कृष्ण जन्माष्टमी के दूसरे दिन नवमी पर मेला लगता है। शहर के लोग यहां पहुंचते हैं और पंडित झुनारे रावत के आजादी के लिए दिए गए बलिदान को नमन करते है।
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राजा मर्दन सिंह और राजा बखतबली के बीच कटुता को कराया था खत्म
इतिहासकार बताते हैं कि बानपुर के राजा मर्दन सिंह और मध्य प्रदेश के शाहगढ़ के राजा बखतबली के बीच शत्रुता थी। लेकिन पंडित झुनारे रावत ने दोनों राजाओं से मिलकर उनके बीच मतभेदों को समाप्त कराकर मित्रता कराई थी।
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अंग्रेजों के भय से नहीं करता था परिवार की कोई मदद
पंडित झुनारे रावत को फंदे पर लटका देने के बाद अंग्रेजी हुकूमत के अफसरों ने लोगों को उनके परिवार की किसी प्रकार की कोई मदद न करने का हुक्म दे दिया था। इस कारण से कोई भी इस परिवार की मदद नहीं करता था। हालत यह हो गई थी कि कभी ललितपुर में उच्च परिवार में सुमार किया जाने वाला रावत परिवार के समक्ष रोजी रोटी तक का संकट खड़ा हो गया। झुनारे रावत के परिवार वाले महेंद्र व देवेंद्र बताते हैं कि उनके परदादी सुनाती थी कि उनके घर के सामने से जब घोड़ों से होकर रात के समय अंग्रेज गुजरते थे तो घोड़ों की टाप की आवाज सुनकर घर के लैंप बुझा देते थे। जिससे वह लोग अंग्रेजों से सुरक्षित रहे।
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बम बनाते समय बम फटने से हाथ गंवाया पिता ने तो क्रांति की विरासत संभाली थी झुनारे रावत ने
पंडित झुनारे रावत के पांचवी पीढ़ी के महेंद्र व देवेंद्र बताते हैं कि झुनारे रावत के पिता भी क्रांतिकारी रहे। उन्हें बम बनाने में महारत हासिल था। आजादी की लड़ाई के लिए क्रांतिकारियों को बम बनाते समय एक बम फट गया था। जिससे उनका एक हाथ कट गया था। पिता से मिली क्रांतिकारी की विरासत को उनके पुत्र पंडित झुनारे रावत ने अपने हाथ में ले लिया था। अंग्रेजों से देश को आजादी दिलाने की दीवानगी पंडित झुनारे रावत में ऐसी थी कि उन्होंने शादी नहीं की थी।
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परिवार को शासन प्रशासन से नहीं मिला सम्मान
ललितपुर के लोग शहीद पंडित झुनारे रावत की वीरता की कहानी आज भी अपने बच्चों को सुनाते हैं। अंग्रेजों ने भी इस शहीद की वीरता के बारे में अपनी किताबों में जिक्र किया। लेकिन शासन-प्रशासन ने पंडित झुनारे रावत को कभी याद नहीं किया। न ही उनके परिवार वालों को स्वतंत्रता दिवस या अन्य कार्यक्रमों में बुलाया जाता है। करीब दस वर्ष पूर्व तक पंड़ित झुनारे रावत का परिवार कच्चे मकान खप्पर वाले मकान में निवास करता रहा। वर्तमान में जरुर उक्त खप्पर वाले मकान को गिराकर उसमें कुछ दुकानों का निर्माण कर उन्हें किराए पर देकर उससे अपना परिवार चला रहे हैं।
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पेड़ आज भी दे रहा है अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता की गवाही
अशोक तिवारी
ललितपुर। आजादी की लड़ाई में ललितपुर भी पीछे नहीं रहा। जिले में ऐसे क्रांतिकारी भी हुए, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में खुद को बलिदान कर दिया और हंसते-हंसते वह देश की आन-बान और शान के लिए शहीद हो गए। ऐसे ही क्रांतिकारी थे शहीद पंडित झुनारे रावत, जिन्होंने अंग्रेजों की दासता स्वीकार नहीं की और हंसते-हंसते फंदे पर लटककर अपनी कुर्बानी दे दी।
देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाने के लिए चलाए गए आंदोलनों में जिले के देशभक्तों की सक्रिय भूमिका रही। इनमें मोहल्ला सुभाषपुरा निवासी क्रांतिकारी पंडित झुनारे रावत 25-30 वर्ष की आयु में अपने गोरिल्ला युद्ध कौशल से अंग्रेजी शासन की चूलें हिला दी थीं। झुनारे रावत की पांचवी पीढ़ी के महेंद्र और देवेंद्र रावत बताते हैं कि उनके दादा परदादा उन्हें बताते थे कि झुनारे रावत के गोरिल्ला युद्ध से अंग्रेजी सेना सहित अंग्रेज अफसर भी थर-थर कांपते थे। बताते हैं कि 1857 में अंग्रेजी की सेना के सेनापति जॉन बेबेस्टस के नेतृत्व में चंदेरी के राजा मौर्य प्रहलाद को पराजित कर दिया था। इस दौरान अंग्रेजी सेना ललितपुर में अपनी छावनी बनाए थे। अंग्रेजी सेना ललितपुर के लोगों और महिलाओं पर अत्याचार करने लगे। हालत यह हो गई थी कि महिलाएं घर से बाहर नहीं निकल पाती थीं। यह देखकर क्रांतिकारी परिवार में जन्मे पंडित झुनारे रावत के मन में अंग्रेजों के प्रति नफरत और देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने की लगन लग गई। झुनारे रावत ने आसपास एक देशभक्तों को जोड़कर एक छोटी सी सेना तैयार की थी। जिसमें करीब 500 सैनिक थे। उनके सेना के सभी सैनिक वीर योद्धा और गोरिल्ला युद्ध में पारंगत थे। झुनारे रावत की सेना अंग्रेजों पर इसी युद्धकला का प्रयोग करते हुए आक्रमण करते थे। झुनारे रावत और उनकी सेना का अंग्रेजी सेना को काफी भय रहता था और वह उन्हें पकड़ने के लिए जुटे हुए थे।
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फरवरी 1858 में अमझरा घाटी से जब अंग्रेजी सेना ललितपुर की ओर बढ़ी तो वर्तमान में ग्राम मसौरा खुर्द के निकट स्थित गांव सांकली के पास पंडित झुनारे रावत ने करीब अपने सैनिकों के साथ अंग्रेजी सेना पर हमला बोल दिया था। अचानक हुए हमले से अंग्रेजी सेना संभल नहीं पाई। पंडित झुनारे रावत की सेना ने इस युद्ध में गोरिल्ला युद्ध की तकनीक अपनाकर दो दिन तक चली लड़ाई में कई अंग्रेजी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था और चारों दिशाओं में भाग गए थे। लेकिन झुनारे रावत का घोड़ा गिर गया था। जिस कारण से अंग्रेजी सेना ने उन्हें घेरकर बंदी बना लिया था। अंग्रेजी सेना झुनारे रावत को ललितपुर लेकर आई और कई दिनों तक उन्हें तरह तरह से प्रताड़ित किया। अंग्रेजों ने दासता स्वीकारने की बात कही। लेकिन क्रांतिकारी पंडित झुनारे रावत ने उनकी दासता स्वीकार नहीं की। इसके बाद उनके पैतृक निवास के बाहर खड़े नीम-पीपल के पेड़ पर सरेआम रस्सी के फंदे पर लटका दिया था। अंग्रेजों ने यह भी हुक्म दिया था कि जो कोई भी पंडित झुनारे रावत के शव को हाथ लगाएगा या उतारेगा उसका भी यह अंजाम किया जाएगा। अंग्रेजाें के हुक्म के चलते पंडित झुनारे रावत का शव पेड़ पर करीब सात दिनों तक लटका रहा था। पंडित झुनारे रावत को पकड़कर फंदे पर लटका देने के बाद अंग्रेज अफसर इतने खुश थे कि उन्होंने 11 मार्च 1858 को ललितपुर में विजय उत्सव मनाया था। वर्तमान में इस स्थान पर नीम का पेड़ तो नहीं लेकिन पीपल का पेड़ लगा है और चबूतरा बना है। जिसे पंडित पंडित झुनारे रावत शहीदी स्थल कहते हैं। यहां पर शंकरजी का एक मंदिर बना हुआ है। जहां पर प्रतिवर्ष भादों माह में कृष्ण जन्माष्टमी के दूसरे दिन नवमी पर मेला लगता है। शहर के लोग यहां पहुंचते हैं और पंडित झुनारे रावत के आजादी के लिए दिए गए बलिदान को नमन करते है।
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इतिहासकार बताते हैं कि बानपुर के राजा मर्दन सिंह और मध्य प्रदेश के शाहगढ़ के राजा बखतबली के बीच शत्रुता थी। लेकिन पंडित झुनारे रावत ने दोनों राजाओं से मिलकर उनके बीच मतभेदों को समाप्त कराकर मित्रता कराई थी।
अंग्रेजों के भय से नहीं करता था परिवार की कोई मदद
पंडित झुनारे रावत को फंदे पर लटका देने के बाद अंग्रेजी हुकूमत के अफसरों ने लोगों को उनके परिवार की किसी प्रकार की कोई मदद न करने का हुक्म दे दिया था। इस कारण से कोई भी इस परिवार की मदद नहीं करता था। हालत यह हो गई थी कि कभी ललितपुर में उच्च परिवार में सुमार किया जाने वाला रावत परिवार के समक्ष रोजी रोटी तक का संकट खड़ा हो गया। झुनारे रावत के परिवार वाले महेंद्र व देवेंद्र बताते हैं कि उनके परदादी सुनाती थी कि उनके घर के सामने से जब घोड़ों से होकर रात के समय अंग्रेज गुजरते थे तो घोड़ों की टाप की आवाज सुनकर घर के लैंप बुझा देते थे। जिससे वह लोग अंग्रेजों से सुरक्षित रहे।
बम बनाते समय बम फटने से हाथ गंवाया पिता ने तो क्रांति की विरासत संभाली थी झुनारे रावत ने
पंडित झुनारे रावत के पांचवी पीढ़ी के महेंद्र व देवेंद्र बताते हैं कि झुनारे रावत के पिता भी क्रांतिकारी रहे। उन्हें बम बनाने में महारत हासिल था। आजादी की लड़ाई के लिए क्रांतिकारियों को बम बनाते समय एक बम फट गया था। जिससे उनका एक हाथ कट गया था। पिता से मिली क्रांतिकारी की विरासत को उनके पुत्र पंडित झुनारे रावत ने अपने हाथ में ले लिया था। अंग्रेजों से देश को आजादी दिलाने की दीवानगी पंडित झुनारे रावत में ऐसी थी कि उन्होंने शादी नहीं की थी।
परिवार को शासन प्रशासन से नहीं मिला सम्मान
ललितपुर के लोग शहीद पंडित झुनारे रावत की वीरता की कहानी आज भी अपने बच्चों को सुनाते हैं। अंग्रेजों ने भी इस शहीद की वीरता के बारे में अपनी किताबों में जिक्र किया। लेकिन शासन-प्रशासन ने पंडित झुनारे रावत को कभी याद नहीं किया। न ही उनके परिवार वालों को स्वतंत्रता दिवस या अन्य कार्यक्रमों में बुलाया जाता है। करीब दस वर्ष पूर्व तक पंड़ित झुनारे रावत का परिवार कच्चे मकान खप्पर वाले मकान में निवास करता रहा। वर्तमान में जरुर उक्त खप्पर वाले मकान को गिराकर उसमें कुछ दुकानों का निर्माण कर उन्हें किराए पर देकर उससे अपना परिवार चला रहे हैं।