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‘उकस’ खा गया ‘टाइवन चना’
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 16 Dec 2016 12:28 AM IST
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agriculture meet, lalitpur news
- फोटो : demo
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एक दशक पहले तक प्रदेश में सबसे ज्यादा चना उत्पादक के तौर पर पहचाने जाने वाला ललितपुर अब पिछड़ गया है। दक्षिण भारत के लोगों का पसंदीदा ललितपुर क े प्रसिद्ध टाइवन चने को उकसा रोग व प्रकृति की मार ने लील लिया है। इस कारण एक समय अस्सी हजार हेक्टेअर में बोया जाने वाला चना आठ हजार हेक्टेअर पर सिमट गया है।
जनपद की जमीन में विल्ट (उकस रोग) नामक बीमारी लग गई है। इसके चलते चने के तने में इस रोग के वाइरस पहुंचकर पौधे को प्रभावित कर देते हैं, जिससे उपज पर फर्क पड़ता है। हालांकि इस बीमारी का इलाज उपलब्ध है, लेकिन जागरूकता के अभाव किसान इसका लाभ नहीं ले पा रहे हैं।
विल्ट रोग के अलावा चने की पैदावार के कम होने के पीछे दूसरा सबसे बड़ा कारण प्रकृति की मार है। पिछले 15 साल में जनपद में किसानों को लगातार दैवी आपदा का सामना करना पड़ रहा है। कभी ओला वृष्टि, तो कभी अतिवृष्टि की मार व सूखे के कहर से दलहनी फसल सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। चूंकि गेहूं की फसल प्रकृति की मार को दलहन फसल के मुकाबले ज्यादा सह लेती है, इसके चलते किसानों ने चने से मुंह मोड़कर गेहूं का अपना लिया है।
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यह है उपाय
विल्ट रोग को खत्म करने के लिए किसान को अपने खेत में ट्राइकोडर्मा नामक दवाई का उपयोग करना चाहिए। जनपद के किसान फसल के पहले खेत में कीटनाशक और अन्य अन्य खाद का उपयोग करने से कतराते हैं। फसल की बुवाई के बाद किसान खाद व कीटनाशक का उपयोग करते हैं।
चना का हब बनाने का प्रयास
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डा एके चौहान ने बताया कि जनपद की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए चना यहां के किसानों के लिए कम लागत व ज्यादा मुनाफा वाली फसल है। चने की उपज कम होने के पीछे एक बड़ा कारण खरीफ की फसल में बदलाव होना भी है। पहले जनपद में खरीफ की फसल के तौर ज्वार बोया जाता था। वहीं अब ज्यादातर खेतों में उर्द बोयी जा रही है। ज्वार की फसल से खेतों में विशेष प्रकार का रसायन जमा हो जाता है, जिससे उकसा रोग के कीटाणु खत्म हो जाते हैं। कृषि विज्ञान केंद्र खिरिया में बीज प्रसंक्करण केंद्र बनने जा रहा है जिसके तहत जनपद में सबसे ज्यादा मसूर व चने की फसल उपज हो, इसके लिए विशेष प्रकार के बीजों पर काम किया जाएगा। आने वाले दिनों में एक बार फिर जनपद चना का बड़ा उत्पादक बन सकता है।
पानी का मोल समझें किसान
जनपद में हमेशा से पानी की कमी रही है। पिछले कुछ सालों में बांधों के निर्माण होने के बाद सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो गया है। चने की फसल में गेहूं से कम पानी लगता है। पानी की उपलब्धता के बाद से किसानों द्वारा धुआंधार तरीके से गेहूं की उपज पैदा की जा रही है। किसानों को जनपद में उपलब्ध पानी की महत्ता समझनी होगी। चने व अन्य दलहन फसलों की तरफ रुख करके पानी का संरक्षण करना चाहिए, नहीं तो आने वाले दिनों में स्थिति भीषण हो सकती है।
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जनपद की जमीन में विल्ट (उकस रोग) नामक बीमारी लग गई है। इसके चलते चने के तने में इस रोग के वाइरस पहुंचकर पौधे को प्रभावित कर देते हैं, जिससे उपज पर फर्क पड़ता है। हालांकि इस बीमारी का इलाज उपलब्ध है, लेकिन जागरूकता के अभाव किसान इसका लाभ नहीं ले पा रहे हैं।
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विल्ट रोग के अलावा चने की पैदावार के कम होने के पीछे दूसरा सबसे बड़ा कारण प्रकृति की मार है। पिछले 15 साल में जनपद में किसानों को लगातार दैवी आपदा का सामना करना पड़ रहा है। कभी ओला वृष्टि, तो कभी अतिवृष्टि की मार व सूखे के कहर से दलहनी फसल सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। चूंकि गेहूं की फसल प्रकृति की मार को दलहन फसल के मुकाबले ज्यादा सह लेती है, इसके चलते किसानों ने चने से मुंह मोड़कर गेहूं का अपना लिया है।
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यह है उपाय
विल्ट रोग को खत्म करने के लिए किसान को अपने खेत में ट्राइकोडर्मा नामक दवाई का उपयोग करना चाहिए। जनपद के किसान फसल के पहले खेत में कीटनाशक और अन्य अन्य खाद का उपयोग करने से कतराते हैं। फसल की बुवाई के बाद किसान खाद व कीटनाशक का उपयोग करते हैं।
चना का हब बनाने का प्रयास
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डा एके चौहान ने बताया कि जनपद की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए चना यहां के किसानों के लिए कम लागत व ज्यादा मुनाफा वाली फसल है। चने की उपज कम होने के पीछे एक बड़ा कारण खरीफ की फसल में बदलाव होना भी है। पहले जनपद में खरीफ की फसल के तौर ज्वार बोया जाता था। वहीं अब ज्यादातर खेतों में उर्द बोयी जा रही है। ज्वार की फसल से खेतों में विशेष प्रकार का रसायन जमा हो जाता है, जिससे उकसा रोग के कीटाणु खत्म हो जाते हैं। कृषि विज्ञान केंद्र खिरिया में बीज प्रसंक्करण केंद्र बनने जा रहा है जिसके तहत जनपद में सबसे ज्यादा मसूर व चने की फसल उपज हो, इसके लिए विशेष प्रकार के बीजों पर काम किया जाएगा। आने वाले दिनों में एक बार फिर जनपद चना का बड़ा उत्पादक बन सकता है।
पानी का मोल समझें किसान
जनपद में हमेशा से पानी की कमी रही है। पिछले कुछ सालों में बांधों के निर्माण होने के बाद सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो गया है। चने की फसल में गेहूं से कम पानी लगता है। पानी की उपलब्धता के बाद से किसानों द्वारा धुआंधार तरीके से गेहूं की उपज पैदा की जा रही है। किसानों को जनपद में उपलब्ध पानी की महत्ता समझनी होगी। चने व अन्य दलहन फसलों की तरफ रुख करके पानी का संरक्षण करना चाहिए, नहीं तो आने वाले दिनों में स्थिति भीषण हो सकती है।