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Lalitpur News: चौसठ योगिनी मंदिर ज्ञान आध्यात्म का अद्भुत केंद्र
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ललितपुर। दूधई मंदिर में स्थित चौसठ योगिनी का मंदिर में बुंदेलखंड के अन्य चौसठ योगिनी मंदिरों में सबसे प्राचीन है। दूधई का चौसठ योगिनी मंदिर दसवीं सदी का है। इस मंदिर को लेकर कई मान्यताएं हैं। चौसठ योगिनी को आदि शक्ति मां कालिका का अंश माना जाता है।
प्राचीन समय में बुंदेलखंड शक्ति तंत्र, ज्ञान-विज्ञान उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां चौसठ योगिनियों के कई मंदिर व मूर्तियां हैं, जो 9वीं से 12वीं सदी तक की हैं। ये योगिनियां या जोगिनियां देवी, देवता महादेव की आराधक मानी जाती हैं। जनपद में पाली से बालाबेहट रोड पर दूधई का मंदिर अब तक मिले चौसठ योगिनियों के मंदिरों में सबसे प्राचीन है। इसके अब यहां अवशेष ही देखने को मिलते हैं। इसका संरक्षण, रखरखाव पुरातत्व विभाग के हाथों में है। शिव व शक्ति की पूजा का देश के सभी हिस्सों में बड़ा महत्व रहा है। यही वजह है कि प्राचीन भारत में इनके असंख्य मंदिर हैं। इनमें पुरातत्व विभाग को चौसठ योगिनी के नौ मंदिर मिले हैं, जिनमें चार प्रमुख मंदिर बुंदेलखंड में हैं, जो खजुराहो, महोबा के सिजहरी, ललितपुर के दुधई, बांदा के लोखरी में हैं। जबकि, जराय मठ, करौखर गांव में योगिनी देवी वाराही की कई प्रतिमाएं हैं। पर्यावरणविद् अधिवक्ता पुष्पेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि देवगढ़ के जंगल में भी छठी सदी की योगिनी की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। इतिहासविदों के अनुसार दूधई में मिली योगिनी मंदिर की खोज अंग्रेजी शासनकाल में हुई थी, तब इसे अखाड़ा कहा जाता था, लेकिन, बाद में पुरातत्व विभाग के सर्वे में इसके योगिनी मंदिर होने की पुष्टि हुई, जो 10वीं सदी का है। आज इनके संरक्षण की बहुत आवश्यकता है।
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यह हैं धार्मिक मान्यताएं
इन योगिनियों को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं हैं। इनमें योगाभ्यास करने वाली स्त्री को योगिनी कहा जाता है। चौसठ योगिनी को आदि शक्ति मां कालिका का अंश माना जाता है। दूसरी मान्यता है कि यह मां पार्वती की सखियां हैं, जो तंत्र व योग विद्या से संबंध रखती हैं। एक अन्य मान्यता है कि यह चौसठ योगिनी मंदिर के मध्य में विराजमान शिव की आराधना करती हैं। गोलाकार अथवा चौकोर संपूर्ण परिसर में इन योगिनियों के कक्ष होते हैं। इनमें इनकी प्रतिमाएं रहती हैं। प्राचीन साहित्य में वर्णित संस्कृत साहित्य में योगिनी को दुर्गा की सहायक कहा गया है। योगिनी को मातृ अथवा मातृदेवी कहा गया है। पहले इनकी संख्या 7-8 थी, जो बाद में 64 हो गई, जिसके बाद योगिनी संप्रदाय चौसठ योगिनी संप्रदाय कहा जाने लगा। योगिनियों के बारे में कथा सरितसागर, बेताल पच्चीसी, राजतरंगिणी, प्रबोध चंद्रोदय, रुद्र उपनिषद आदि में वर्णन है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार मातृदेवियों ने प्रकट होकर रक्तबीज नामक दानव के रक्त को पिया था। अनेक ग्रंथों के अनुसार योगिनी संप्रदाय के संस्थापक मत्स्येंद्रनाथ थे। एक मान्यता है कि साधक के विभिन्न अंगों में योगिनियों का निवास होता है, जिनका संबंध योग नाड़ियों से है।
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ये हैं 64 योगिनी
चौसठ योगिनी में बहुरूप, तारा, नर्मदा, यमुना, शांति, वारुणी, क्षेमंकरी, ऐंद्री, वाराही, रणवीरा, वानर मुखी, वैष्णवी, कालरात्रि, वैद्य रूपा, चर्चिका, बेताली, छिन्नमस्तिका, वृषवाहन, ज्वालाकामिनी, घटवार, करकाली, सरस्वती, बिरूपा, कावेरी, भलुका, नारसिंही, बिरजा, विकटानना, महालक्ष्मी, कोमारी, महामाया, रति, करकरी, सर्पस्या, यक्षिणी, विनायकी, विंध्यवासिनी, वीर कुमारी, माहेश्वरी, अंबिका, कामिनी, घटवारी, स्तुति, काली, उमा, नारायणी, समुद्र, ब्राह्मणी, ज्वाला मुखी, आग्नेयी, अदिति, चंद्रकांति, वायुवेगा, चामुंडा, मुरति, गंगा, धूमावती, गांधार, सर्व मंगल, अजिता, सूर्य पुत्री, वायु वीणा, अघोर और भद्रकाली हैं। बुंदेलखंड में इनमें से कई योगिनियों की पूजा आज भी होती है।
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जनपद के दूधई व देवगढ़ में कई प्राचीन मूर्तियां स्थापित हैं, जिनका संरक्षण पुरातत्व विभाग द्वारा किया जा रहा है। पुरातत्व संग्रहालय में भी कई प्राचीन मूर्तियों को संरक्षित करके रखा गया है।
-डॉ.राजीव त्रिवेदी, क्षेत्रीय पुरात्व अधिकारी।
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प्राचीन समय में बुंदेलखंड शक्ति तंत्र, ज्ञान-विज्ञान उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां चौसठ योगिनियों के कई मंदिर व मूर्तियां हैं, जो 9वीं से 12वीं सदी तक की हैं। ये योगिनियां या जोगिनियां देवी, देवता महादेव की आराधक मानी जाती हैं। जनपद में पाली से बालाबेहट रोड पर दूधई का मंदिर अब तक मिले चौसठ योगिनियों के मंदिरों में सबसे प्राचीन है। इसके अब यहां अवशेष ही देखने को मिलते हैं। इसका संरक्षण, रखरखाव पुरातत्व विभाग के हाथों में है। शिव व शक्ति की पूजा का देश के सभी हिस्सों में बड़ा महत्व रहा है। यही वजह है कि प्राचीन भारत में इनके असंख्य मंदिर हैं। इनमें पुरातत्व विभाग को चौसठ योगिनी के नौ मंदिर मिले हैं, जिनमें चार प्रमुख मंदिर बुंदेलखंड में हैं, जो खजुराहो, महोबा के सिजहरी, ललितपुर के दुधई, बांदा के लोखरी में हैं। जबकि, जराय मठ, करौखर गांव में योगिनी देवी वाराही की कई प्रतिमाएं हैं। पर्यावरणविद् अधिवक्ता पुष्पेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि देवगढ़ के जंगल में भी छठी सदी की योगिनी की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। इतिहासविदों के अनुसार दूधई में मिली योगिनी मंदिर की खोज अंग्रेजी शासनकाल में हुई थी, तब इसे अखाड़ा कहा जाता था, लेकिन, बाद में पुरातत्व विभाग के सर्वे में इसके योगिनी मंदिर होने की पुष्टि हुई, जो 10वीं सदी का है। आज इनके संरक्षण की बहुत आवश्यकता है।
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यह हैं धार्मिक मान्यताएं
इन योगिनियों को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं हैं। इनमें योगाभ्यास करने वाली स्त्री को योगिनी कहा जाता है। चौसठ योगिनी को आदि शक्ति मां कालिका का अंश माना जाता है। दूसरी मान्यता है कि यह मां पार्वती की सखियां हैं, जो तंत्र व योग विद्या से संबंध रखती हैं। एक अन्य मान्यता है कि यह चौसठ योगिनी मंदिर के मध्य में विराजमान शिव की आराधना करती हैं। गोलाकार अथवा चौकोर संपूर्ण परिसर में इन योगिनियों के कक्ष होते हैं। इनमें इनकी प्रतिमाएं रहती हैं। प्राचीन साहित्य में वर्णित संस्कृत साहित्य में योगिनी को दुर्गा की सहायक कहा गया है। योगिनी को मातृ अथवा मातृदेवी कहा गया है। पहले इनकी संख्या 7-8 थी, जो बाद में 64 हो गई, जिसके बाद योगिनी संप्रदाय चौसठ योगिनी संप्रदाय कहा जाने लगा। योगिनियों के बारे में कथा सरितसागर, बेताल पच्चीसी, राजतरंगिणी, प्रबोध चंद्रोदय, रुद्र उपनिषद आदि में वर्णन है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार मातृदेवियों ने प्रकट होकर रक्तबीज नामक दानव के रक्त को पिया था। अनेक ग्रंथों के अनुसार योगिनी संप्रदाय के संस्थापक मत्स्येंद्रनाथ थे। एक मान्यता है कि साधक के विभिन्न अंगों में योगिनियों का निवास होता है, जिनका संबंध योग नाड़ियों से है।
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ये हैं 64 योगिनी
चौसठ योगिनी में बहुरूप, तारा, नर्मदा, यमुना, शांति, वारुणी, क्षेमंकरी, ऐंद्री, वाराही, रणवीरा, वानर मुखी, वैष्णवी, कालरात्रि, वैद्य रूपा, चर्चिका, बेताली, छिन्नमस्तिका, वृषवाहन, ज्वालाकामिनी, घटवार, करकाली, सरस्वती, बिरूपा, कावेरी, भलुका, नारसिंही, बिरजा, विकटानना, महालक्ष्मी, कोमारी, महामाया, रति, करकरी, सर्पस्या, यक्षिणी, विनायकी, विंध्यवासिनी, वीर कुमारी, माहेश्वरी, अंबिका, कामिनी, घटवारी, स्तुति, काली, उमा, नारायणी, समुद्र, ब्राह्मणी, ज्वाला मुखी, आग्नेयी, अदिति, चंद्रकांति, वायुवेगा, चामुंडा, मुरति, गंगा, धूमावती, गांधार, सर्व मंगल, अजिता, सूर्य पुत्री, वायु वीणा, अघोर और भद्रकाली हैं। बुंदेलखंड में इनमें से कई योगिनियों की पूजा आज भी होती है।
जनपद के दूधई व देवगढ़ में कई प्राचीन मूर्तियां स्थापित हैं, जिनका संरक्षण पुरातत्व विभाग द्वारा किया जा रहा है। पुरातत्व संग्रहालय में भी कई प्राचीन मूर्तियों को संरक्षित करके रखा गया है।
-डॉ.राजीव त्रिवेदी, क्षेत्रीय पुरात्व अधिकारी।