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बीमारी सिलिकोसिस की और इलाज दिया जा रहा टीबी का
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hospital
- फोटो : hospital
ललितपुर। पत्थर की खदानों पर हाड़तोड़ मेहनत करने वाले गरीब आदिवासी मजदूरों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा पत्थर खदानों से उड़ने वाली डस्ट से होने वाली जानलेवा बीमारी सिलिकोसिस के नाम पर टीबी का इलाज दिया जा रहा है। यही कारण है कि तमाम सर्वेक्षणों के बाद भी बीते डेढ़ वर्ष में विभाग सिलिकोसिस से ग्रसित एक भी मरीज नहीं खोज पाया है।
पत्थरों की खदानों पर काम करने वाले मजदूरों के फेफड़ों में पत्थर के कण जमा होने के कारण वे सिलिकोसिस जैसी खतरनाक बीमारी को जन्म देते हैं। इससे श्रमिक असमय मौत के शिकार बन जाते हैं। सिलिकोसिस से ग्रसित मरीजों का पता लगाने के लिए शासन के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग की ओर से सर्वेक्षण कराए जाते हैं। इस दौरान खदान पर काम करने वाले मजदूरों की जांच कराई जाती है।
चौंकाने वाली बात यह है कि सिलिकोसिस के नाम पर टीबी की जांच की जाती है, जिससे सिलिकोसिस के ग्रसित सही मरीजों की पहचान नहीं हो पाती और वे इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं। जिला क्षय रोग मानते हैं कि टीबी की जांच से सिलिकोसिस की बीमारी का पता नहीं चलता, क्योंकि टीबी की जांच बलगम, रक्त व एक्सरे की सहायता से की जाती है। वहीं, सिलिकोसिस की बीमारी में मरीजों के फेफड़ों में पत्थर के कण जमा हो जाते हैं, इसका पता अल्ट्रासाउण्ड, वायोप्सी जांच से ही लगाया जा सकता है। जनपद मुख्यालय स्थित संयुक्त जिला चिकित्सालय में रेडियोलॉजिस्ट के अभाव में अल्ट्रासाउंड सेवाएं वर्षों से ठप पड़ी हैं। ऐसी स्थिति में विभागीय सर्वेक्षण के दौरान अब तक सिलिकोसिस से ग्रसित एक भी मरीज सामने नहीं आया है। जबकि, जमीनी सच्चाई यह है कि सिलिकोसिस की बीमारी खदानों पर काम करने वाले मजदूरों को असमय मौत की नींद सुला रही है, इसका उदाहरण है ग्राम रमपुरा में रहने वाले अनेक मजदूर कम उम्र में अपनी जान गवां चुके हैं। इस गाँव में कम उम्र की आदिवासी विधवा महिलाएं ही शेष बची हैं। असमय मौत के शिकार बने अनेक मजदूरों की विधवाएं और उनके मासूम बच्चे उदरपूर्ति के लिए खदानों पर काम करने को विवश हैं। इन गरीब मजदूरों की जान की परवाह न तो उनसे काम लेने वालों को है और न ही स्थानीय प्रशासन को।
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सिलिकोसिस और टीवी के लक्षण एक जैसे होते हैं। एक्सरे में भी सही पता नहीं लगता है जिससे बीमारी का पता लगाना मुश्किल होता है। मरीज की गम्भीर स्थिति होने पर मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाता है। वर्तमान में किसी भी मरीज का सिलिकोसिस का इलाज नहीं चल रहा है। वर्ष 2018 में संदेह होने पर चार मरीजों को मेडिकल कालेज झांसी रेफर किया गया था। खदान संचालकों को चाहिए कि कामगारों को खदान में काम करते वक्त मास्क जरूर पहनाएं।
- डा. जेएस बख्शी
जिला क्षय रोग अधिकारी
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पत्थरों की खदानों पर काम करने वाले मजदूरों के फेफड़ों में पत्थर के कण जमा होने के कारण वे सिलिकोसिस जैसी खतरनाक बीमारी को जन्म देते हैं। इससे श्रमिक असमय मौत के शिकार बन जाते हैं। सिलिकोसिस से ग्रसित मरीजों का पता लगाने के लिए शासन के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग की ओर से सर्वेक्षण कराए जाते हैं। इस दौरान खदान पर काम करने वाले मजदूरों की जांच कराई जाती है।
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चौंकाने वाली बात यह है कि सिलिकोसिस के नाम पर टीबी की जांच की जाती है, जिससे सिलिकोसिस के ग्रसित सही मरीजों की पहचान नहीं हो पाती और वे इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं। जिला क्षय रोग मानते हैं कि टीबी की जांच से सिलिकोसिस की बीमारी का पता नहीं चलता, क्योंकि टीबी की जांच बलगम, रक्त व एक्सरे की सहायता से की जाती है। वहीं, सिलिकोसिस की बीमारी में मरीजों के फेफड़ों में पत्थर के कण जमा हो जाते हैं, इसका पता अल्ट्रासाउण्ड, वायोप्सी जांच से ही लगाया जा सकता है। जनपद मुख्यालय स्थित संयुक्त जिला चिकित्सालय में रेडियोलॉजिस्ट के अभाव में अल्ट्रासाउंड सेवाएं वर्षों से ठप पड़ी हैं। ऐसी स्थिति में विभागीय सर्वेक्षण के दौरान अब तक सिलिकोसिस से ग्रसित एक भी मरीज सामने नहीं आया है। जबकि, जमीनी सच्चाई यह है कि सिलिकोसिस की बीमारी खदानों पर काम करने वाले मजदूरों को असमय मौत की नींद सुला रही है, इसका उदाहरण है ग्राम रमपुरा में रहने वाले अनेक मजदूर कम उम्र में अपनी जान गवां चुके हैं। इस गाँव में कम उम्र की आदिवासी विधवा महिलाएं ही शेष बची हैं। असमय मौत के शिकार बने अनेक मजदूरों की विधवाएं और उनके मासूम बच्चे उदरपूर्ति के लिए खदानों पर काम करने को विवश हैं। इन गरीब मजदूरों की जान की परवाह न तो उनसे काम लेने वालों को है और न ही स्थानीय प्रशासन को।
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सिलिकोसिस और टीवी के लक्षण एक जैसे होते हैं। एक्सरे में भी सही पता नहीं लगता है जिससे बीमारी का पता लगाना मुश्किल होता है। मरीज की गम्भीर स्थिति होने पर मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाता है। वर्तमान में किसी भी मरीज का सिलिकोसिस का इलाज नहीं चल रहा है। वर्ष 2018 में संदेह होने पर चार मरीजों को मेडिकल कालेज झांसी रेफर किया गया था। खदान संचालकों को चाहिए कि कामगारों को खदान में काम करते वक्त मास्क जरूर पहनाएं।
- डा. जेएस बख्शी
जिला क्षय रोग अधिकारी