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धनुषयज्ञ की लीला देखने उमड़ा जन सैलाब
lalitpur
Updated Thu, 11 Oct 2018 01:47 AM IST
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administration
- फोटो : amar ujala
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महरौनी। कस्बा महरौनी में चल रहे श्री रामलीला महोत्सव के तीसरे दिन धनुषयज्ञ की लीला का मंचन हुआ, जिसे देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। इस मौके पर आकर्षक और शानदार ढंग से समूचे प्रांगण को सजाया गया। मंचन के दौरान सभी कलाकारों ने अपने बेहतरीन अभिनय संवादों से उपस्थित जनसमुदाय की खूब वाहवाही बटोरी।
लीला मंचन के पहले रविशेखर पांडेय ने प्रथम आरती करने का सौभाग्य प्राप्त किया। लीला दर्शन करने पहुंचे उत्तरप्रदेश शासन के श्रम एवं सेवायोजन राज्यमंत्री मनोहर लाल पंथ ने कहा कि भगवान राम का जीवन चरित्र अनुकरणीय है, जिन्होंने सत्य को विजय दिलाई। उन्होंने कहा भगवान राम की लीला के माध्यम से समाज को अच्छी सीख देने के लिये आयोजक मंडल के प्रयास सर्व सराहनीय हैं। इस अवसर पर नगर पंचायत अध्यक्ष कृष्णा सिंह और भाजपा मंडल अध्यक्ष आशुतोष सिंह सेंगर ने भी रामलीला महोत्सव की सफलता हेतु शुभकामनाएं ज्ञापित की ।लीला मंचन के प्रथम दृश्य में सीता जी के स्वयंवर में जनक के आमंत्रण पर देश देशांतर के राजाओं का आगमन होता है।तव जनक स्वयंवर सभा में रखे शिवधनुष का पूजन करते हैं और बंदीजन सभा में राजा जनक का प्रण सबको सुनाते हैं कि जो भी इस धनुष पर प्रत्यंचा चढाने में सफल होगा तो उसके साथ जनकनन्दिनी का विवाह होगा । धनुषयज्ञ के आयोजन का समाचार सुनकर स्वयंवर सभा में लंकापति रावण पहुँचता है। उधर राजा बलि के पुत्र बाणासुर को आकाशवाणी से रावण के स्वयंवर सभा में पहुँचने का समाचार मिला।वह आकर रावण से संवाद करता है।रावण और वाणासुर के ओजस्वी संवादों को सुनकर दर्शक रोमांचित हो उठे।अंतत: रावण स्वयंवर सभा को छोडकर लंका वापिस लौट जाता है और राजा जनक बाणेश का आभार ज्ञापित करते हैं।इधर जब सारे राजा धनुष पर प्रत्यंचा चढाना तो दूर बल्कि उसे तिल भर हिला तक नहीं पाते हैं तो यह देखकर राजा जनक अधीर हो उठे और करुण विलाप करते हैं। आत्मग्लानि से भरे राजा इस आशंका से भयभीत हो जाते हैं कि उनके इस कठिन प्रण के चलते सीता जी जीवन भर कुआंरी ना रह जायें।वह हताशा भरे गुस्से में आकर सबको ताना देते हैं और पृथ्वी को वीरों से खाली बता देते हैं।इस बात से लक्ष्मण जी क्रोधित हो जाते हैं और अपनी प्रतिक्रिया तीखे संवादों से देते हैं।तव राम जी अपने अनुज को शांत करते हैं और फिर गुरू विश्वामित्र की आज्ञा पाकर श्रीराम विशाल शिवधनुष भंग कर देते हैं। समूचा वातावरण जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा । वहाँ ध्यान में लीन मुनि परशुराम धनुषभंग से हुयी जोरदार आवाज सुनकर व्याकुल हो उठे और जनकसभा की ओर रवाना होते हैं।मंचन के आखिरी दृश्य में हर्षोल्लास भरे वातावरण में श्रीराम और सीता जी का वरमाला कार्यक्रम संपन्न होता है और युगल छवि के दर्शन पाकर उपस्थित जनसमूह भावविभोर हो गया ।मंचन में प्रखर मिश्रा, विनीत पुरोहित, मानवेन्द्र सिंह, कृष्णस्वरूप पटैरिया, शिवम पांडेय, बाबूलाल नायक,सुरेन्द्र तिवारी, हृदेश गोस्वामी,भागचन्द्र जैन,सूर्यकान्त त्रिपाठी,राजबहादुर खरे,विनोद कुशवाहा,रामू तिवारी,कल्लू राजा,भगवत भौंडेले, रामेश्वर सोनी,अनुज भौंडेले,पवन तिवारी, दीपक तिवारी,सत्येन्द्र सिंह आदि का अभिनय सराहनीय रहा।
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लीला मंचन के पहले रविशेखर पांडेय ने प्रथम आरती करने का सौभाग्य प्राप्त किया। लीला दर्शन करने पहुंचे उत्तरप्रदेश शासन के श्रम एवं सेवायोजन राज्यमंत्री मनोहर लाल पंथ ने कहा कि भगवान राम का जीवन चरित्र अनुकरणीय है, जिन्होंने सत्य को विजय दिलाई। उन्होंने कहा भगवान राम की लीला के माध्यम से समाज को अच्छी सीख देने के लिये आयोजक मंडल के प्रयास सर्व सराहनीय हैं। इस अवसर पर नगर पंचायत अध्यक्ष कृष्णा सिंह और भाजपा मंडल अध्यक्ष आशुतोष सिंह सेंगर ने भी रामलीला महोत्सव की सफलता हेतु शुभकामनाएं ज्ञापित की ।लीला मंचन के प्रथम दृश्य में सीता जी के स्वयंवर में जनक के आमंत्रण पर देश देशांतर के राजाओं का आगमन होता है।तव जनक स्वयंवर सभा में रखे शिवधनुष का पूजन करते हैं और बंदीजन सभा में राजा जनक का प्रण सबको सुनाते हैं कि जो भी इस धनुष पर प्रत्यंचा चढाने में सफल होगा तो उसके साथ जनकनन्दिनी का विवाह होगा । धनुषयज्ञ के आयोजन का समाचार सुनकर स्वयंवर सभा में लंकापति रावण पहुँचता है। उधर राजा बलि के पुत्र बाणासुर को आकाशवाणी से रावण के स्वयंवर सभा में पहुँचने का समाचार मिला।वह आकर रावण से संवाद करता है।रावण और वाणासुर के ओजस्वी संवादों को सुनकर दर्शक रोमांचित हो उठे।अंतत: रावण स्वयंवर सभा को छोडकर लंका वापिस लौट जाता है और राजा जनक बाणेश का आभार ज्ञापित करते हैं।इधर जब सारे राजा धनुष पर प्रत्यंचा चढाना तो दूर बल्कि उसे तिल भर हिला तक नहीं पाते हैं तो यह देखकर राजा जनक अधीर हो उठे और करुण विलाप करते हैं। आत्मग्लानि से भरे राजा इस आशंका से भयभीत हो जाते हैं कि उनके इस कठिन प्रण के चलते सीता जी जीवन भर कुआंरी ना रह जायें।वह हताशा भरे गुस्से में आकर सबको ताना देते हैं और पृथ्वी को वीरों से खाली बता देते हैं।इस बात से लक्ष्मण जी क्रोधित हो जाते हैं और अपनी प्रतिक्रिया तीखे संवादों से देते हैं।तव राम जी अपने अनुज को शांत करते हैं और फिर गुरू विश्वामित्र की आज्ञा पाकर श्रीराम विशाल शिवधनुष भंग कर देते हैं। समूचा वातावरण जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा । वहाँ ध्यान में लीन मुनि परशुराम धनुषभंग से हुयी जोरदार आवाज सुनकर व्याकुल हो उठे और जनकसभा की ओर रवाना होते हैं।मंचन के आखिरी दृश्य में हर्षोल्लास भरे वातावरण में श्रीराम और सीता जी का वरमाला कार्यक्रम संपन्न होता है और युगल छवि के दर्शन पाकर उपस्थित जनसमूह भावविभोर हो गया ।मंचन में प्रखर मिश्रा, विनीत पुरोहित, मानवेन्द्र सिंह, कृष्णस्वरूप पटैरिया, शिवम पांडेय, बाबूलाल नायक,सुरेन्द्र तिवारी, हृदेश गोस्वामी,भागचन्द्र जैन,सूर्यकान्त त्रिपाठी,राजबहादुर खरे,विनोद कुशवाहा,रामू तिवारी,कल्लू राजा,भगवत भौंडेले, रामेश्वर सोनी,अनुज भौंडेले,पवन तिवारी, दीपक तिवारी,सत्येन्द्र सिंह आदि का अभिनय सराहनीय रहा।
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