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Lalitpur News: महात्मा गांधी के आह्वान पर नौकरी छोड़ चुन्नीलाल चौरसिया उतरे थे स्वतंत्रता के आंदोलन में

Fri, 15 Aug 2025 01:29 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 15 Aug 2025 01:29 AM IST
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On the call of Mahatma Gandhi, Chunnilal Chaurasia left his job and joined the freedom movement
- गांधीजी के आह्वान पर छोड़ी थी डिप्टी रेंजर की नौकरी
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- चुन्नीलाल चौरसिया ने हिला दी थीं ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें

- भारत छोड़ो आंदोलन में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका, कई बार गए जेल
संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। गांधी के आह्वान पर डिप्टी रेंजर चुन्नीलाल चौरसिया ने डिप्टी रेंजर की नौकरी को छोड़ दिया था, वह स्वतंत्रता के आंदोलन में कूद पड़े, उन्होंने अंग्रेजों को बहुत छकाया, भारत छोड़ो आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका नहीं थी। क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं।
कस्बा पाली निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चुन्नीलाल चौरसिया एक ऐसा नाम था, जिससे अंग्रेज अफसर खौफ खाते थे। जिसने पाली क्षेत्र में आजादी के आंदोलन की अलख जगाई थी। कस्बा पाली निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चुन्नीलाल चौरसिया के पिता पोटेराम सागर जिले के खिमलासा में शिक्षक थे। वे दो भाई थे, उनके बड़े भाई भैरो प्रसाद भी शिक्षक थे। चुन्नीलाल का जन्म वर्ष 1914 में खिमलासा में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा खिमलासा में हुई, बाद में उन्होंने सागर व जबलपुर से उच्च शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 1934 में वे डिप्टी रेंजर बन गए। जबलपुर जिले की तत्कालीन मंडला तहसील के सैपुरा बीट में उनकी तैनाती थी। उस समय देश में आजादी का आंदोलन चलाया जा रहा था। क्रांतिकारी ब्रिटिश हुकूमत का विरोध कर धरना प्रदर्शन कर रहे थे। महात्मा गांधी के आह्वान पर वर्ष 1936 में उन्होंने अंग्रेजी सरकार की डिप्टी रेंजर की नौकरी छोड़ दी और आंदोलन में कूद गए। उन्होंने आंदोलन को खड़ा करने के लिए अपनी मातृभूमि कस्बा पाली को चुना था। उन्होंने पाली में कांग्रेस का गठन किया और गांव-गांव में बैठक कर लोगों को आजादी के प्रति जागरूक व प्रेरित करने लगे। इसके चलते वे अंग्रेज अफसरों के निशाने पर थे। वर्ष 1940 में मौजूदा जंग हमारा फर्ज आंदोलन में सक्रियता के चलते उन्हें एक वर्ष के लिए नजरबंद कर दिया गया था। 18 मार्च 1941 को धारा 38 डीआइआर के तहत उन्हें 9 माह के कठोर कारावास की सजा ललितपुर के तत्कालीन मजिस्ट्रेट ने सुनाई थी। इसके बाद उन्हें झांसी जेल भेज दिया था। जेल से बाहर आए तो फिर आंदोलन में जुट गए। 12 जनवरी 1942 को 35 दिन के लिए फिर जेल भेज दिया था। 13 मार्च 1973 दिन मंगलवार सड़क हादसे में उनकी मौत गई थी।
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कई महत्वपूर्ण पदों पर भी रहे
वर्ष 1954 में वे जिला पंचायत बोर्ड झांसी के उपाध्यक्ष व कांग्रेस के मंडल अध्यक्ष भी रहे। 1962 में पाली न्याय पंचायत के सरपंच व 1967 में ग्राम सभा पाली के सभापति भी रहे।
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