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अगर मुझे जेल से छोड़ा जाता तो सरकारी कार्यालयों को कर देंगे आग के हवाले
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स्वतंत्रता सेनानी मदन लाल किलेदार
- फोटो : LALITPUR
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ललितपुर। जनपद में जन्मे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अंग्रेजी हुकूमत की नाक में दम कर दिया था। इन्हीं में से एक मदनलाल किलेदार थे। इनके परिवार का योगदान भुलाया नहीं जा सकता है।
बताते हैं कि न्यायाधीश से रिहाई अस्वीकार करते हुए उन्होंने कहा था कि अगर मुझे छोड़ा जाता है तब मैं वापस जाकर सरकारी कार्यालयों को आग लगाने का कार्य प्रारंभ कर दूूंगा। मजिस्ट्रेट यह बात सुनकर आगबबूला हो गया और उन्हें एक वर्ष व सौ रुपये जुर्माना की सजा सुना दी।
शहर के मोहल्ला महावीरपुरा के किलेदार परिवार के योगदान को कोई भूल नहीं सकता है। इस परिवार से तीन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी निकले। इनमें नंदकिशोर किलेदार, बृजनंदन किलेदार, मदनलाल किलेदार शामिल हैं। छोटेलाल किलेदार के जन्मे मदनलाल किलेदार ने जब होश संभाला, तब उनके परिवार के लोग स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन से जुड़े थे। इसका असर उनके मन मस्तिष्क पर पड़ा। किशोरावस्था में ही उन्होंने आंदोलन में भाग लेना आरंभ कर दिया। उग्र तेवर वाले किलेदार अंग्रेजों की पिटाई करने से भी पीछे नहीं रहे। वह अंग्रेेजों से मारपीट करने पर खुद को धन्य समझते थे।
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एक समय ऐसा आया जब उनकी सक्रिय गतिविधियों से अंग्रेज परेशान हो गए थे। वर्ष 1942 के आंदोलन में जब उन्हें बंदी बनाया गया, तब न्यायाधीश ने उम्र को देखते हुए उन्हें छोड़ने का आदेश दिया। इस पर उन्होंने रिहाई लेने से इंकार कर दिया। उन्होंने न्यायालय में ही कह दिया कि अगर मुझे छोड़ा जाता है, तब मैं वापस जाकर सरकारी कार्यालयों को आग लगाने का कार्य प्रारंभ कर दूंगा। इस पर मजिस्ट्रेट यह बात सुनकर आगबबूला हो उठा और उसने एक वर्ष की सजा व सौ रुपये जुर्माना लगा दिया।
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बताते हैं कि न्यायाधीश से रिहाई अस्वीकार करते हुए उन्होंने कहा था कि अगर मुझे छोड़ा जाता है तब मैं वापस जाकर सरकारी कार्यालयों को आग लगाने का कार्य प्रारंभ कर दूूंगा। मजिस्ट्रेट यह बात सुनकर आगबबूला हो गया और उन्हें एक वर्ष व सौ रुपये जुर्माना की सजा सुना दी।
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शहर के मोहल्ला महावीरपुरा के किलेदार परिवार के योगदान को कोई भूल नहीं सकता है। इस परिवार से तीन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी निकले। इनमें नंदकिशोर किलेदार, बृजनंदन किलेदार, मदनलाल किलेदार शामिल हैं। छोटेलाल किलेदार के जन्मे मदनलाल किलेदार ने जब होश संभाला, तब उनके परिवार के लोग स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन से जुड़े थे। इसका असर उनके मन मस्तिष्क पर पड़ा। किशोरावस्था में ही उन्होंने आंदोलन में भाग लेना आरंभ कर दिया। उग्र तेवर वाले किलेदार अंग्रेजों की पिटाई करने से भी पीछे नहीं रहे। वह अंग्रेेजों से मारपीट करने पर खुद को धन्य समझते थे।
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एक समय ऐसा आया जब उनकी सक्रिय गतिविधियों से अंग्रेज परेशान हो गए थे। वर्ष 1942 के आंदोलन में जब उन्हें बंदी बनाया गया, तब न्यायाधीश ने उम्र को देखते हुए उन्हें छोड़ने का आदेश दिया। इस पर उन्होंने रिहाई लेने से इंकार कर दिया। उन्होंने न्यायालय में ही कह दिया कि अगर मुझे छोड़ा जाता है, तब मैं वापस जाकर सरकारी कार्यालयों को आग लगाने का कार्य प्रारंभ कर दूंगा। इस पर मजिस्ट्रेट यह बात सुनकर आगबबूला हो उठा और उसने एक वर्ष की सजा व सौ रुपये जुर्माना लगा दिया।