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न नहर न पानी मुश्किल से चलती खेती किसानी
lalitpur
Updated Wed, 23 Nov 2016 12:01 AM IST
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कृषि
- फोटो : amar ujala
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पाली (ललितपुर)।
तहसील पाली के कई गांवों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध नहीं होने के कारण किसानों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सबसे ज्यादा दिक्कतें बालाबेहट क्षेत्र के पठारी इलाकों के सैकड़ों गांवों में किसानों को अपने खेतों की सिंचाई करने के लिए सामने आतीं हैं। इस क्षेत्र में सिंचाई के लिए कोई खास इंतजाम नहीं है। जिन किसानों के निजी नलकूप है उनकी तो नैया तो पार लग जाती है, बाकी बचे अधिकांश किसान जो प्राकृतिक जलश्रोतों, चेकडेमों आदि पर निर्भर होकर अपने खेतों की प्यास बुझाने के इंतजाम में कड़ी मशक्कत करते रहते हैं। इन श्रोतों का पानी भी पहली ही सिंचाई में रसातल को चला जाता है। ऐसे तटों पर पानी को लेकर मारामारी सी मची रहती है। रसातल में पानी चले जाने से यहां का किसान मावठ (बारिश) गिरने की टकटकी लगाने लगता है । मावठ न गिरने पर निजी नलकूपों से महंगा पानी खरीदना पड़ता है। पानी की कीमत भी 150 रुपये से लेकर 200 रुपये प्रति घंटा होती है। यही वजह है की यहां का किसान कम पानी चाहने वाली फसल की बुवाई करता है। जिसमें उसको मुनाफा भी कम ही हो पाता है। इस क्षेत्र में किसानों के लिए ऐसी कोई नदी, नहर नहीं है जो इनकी पैदावार को उम्मीद के मुताबिक खड़ा कर सके। इस मुशिकल घड़ी से निपटने के लिए गरीब किसान अपनी खेती ठेके पर देकर खुद मेहनत मजदूरी कर अपनी आजीविका जुटाने मे लगा रहता है ।
रबर बांध की हवा निकली
ग्राम बालाबेहट में सिंचाई विभाग द्वारा सिंचाई का साधन उपलब्ध कराने के लिए सौंर नदी पर प्रदेश का पहला रबर बांध प्रस्तावित किया था। रबर बांध बनाने को लेकर सर्वे हो चुका है, लेकिन वन विभाग की जमीन के कारण मामला ठंडे बस्ते में चला गया है। प्रस्तावित रबर बांध की योजना से पूरे क्षेत्र के किसानों में एक गजब की खुशी लहर दौड़ गई थी। लेकिन जानकारी के मुताबिक इस बांध को लेकर स्थिति असमंजस वाली हो गई है। इस बांध का निर्माण जल्द हो जाता तो यहां हरित क्रांति आ जाती। लेकिन इस रबर बांध की हवा फिलहाल मे निकली सी लग रही है। सिंचाई के लिए यहां के किसान नहर की भी मांग करते आये लेकिन किसानों की इस बदहाली को मुद्दा बनाकर राजनीति तो खूब होती है। लेकिन किसानों को उनकी बदहाली से निकालने के लिए कोई खास पहल नही होती ।
बदहाल है पाली के तालाब
पाली। लगभग 150 एकड़ से ज्यादा क्षेत्रफल में फैले पाली कस्बे के भुजरया तालाब में आज एक बूंद पानी नही है। तालाब पर बने चेकडैम में है, जिसका उपयोग किसान सिंचाई के लिए कर रहे हैं। नीलकंठ तालाब का दायरा भी सिकुड़ गया है। नागौरी का तालाब में सिर्फ इतना ही पहली सिंचाई का काम चला देगा। सिंचाई विभाग द्वारा जनपद में दो दर्जन से ज्यादा तालाबों का जीर्णोद्धार कराया गया, लेकिन पाली कस्बे के तालाबों का कोई ध्यान नहीं रखा गया। जबकि जिन क्षेत्रों में नहर का साधन उपलब्ध है, लेकिन फिर भी पाली के तालाबों का जीर्णोद्घार नहीं कराया है।
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जाखलौन पंप केनाल से मिल सकती नहर
लगभग दो दशक पूर्व से पाली क्षेत्र के किसान जाखलौन पंप केनाल से नहर की मांग करते आ रहे है। नहर के जुड़ने से पाली के बड़े भाग में सिंचाई के लिए पानी मिल जाएगा। वंट, सिमरधा, चीमना आदि गांवों से होकर यह डोंगरा क्षेत्र तक सिंचित कर सकती है। इस संबंध में नगर पंचायत चेयरमैन रामकुमार चौरसिया का कहना है की डीएम व सिंचाई विभाग के उच्चाधिकारियों को ज्ञापन व पत्राचार के माध्यम से अवगत कराया । लेकिन आश्वासनों के अलावा अब कुछ हासिल नही हुआ । किसानों के हित मे नहर के लिए हाईकोर्ट मे एक याचिका दायर करने का विचार चल रहा है। पाली से तीन किलोमीटर की दूरी पर कनपुरा घाटी लग जाती है। पठारी इलाकों में निजी नलकूपों को 300 फीट से ज्यादा खुदवाना पड़ता है। इसमें भी किसी किस्मत वाले की लकीर में ही पानी निकलता है, अन्य किसानों की जमीन खोखली होती रहती है
क्षेत्र को बांध व नहर की जरूरत
पार्षद अरविंद चौरसिया का कहना है की पाली क्षेत्र में नहर का होना आवश्यक है। पानी के अभाव के चलते किसानों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है । छन्नू खां मंसूरी का कहना है बीते दो साल से प्राकृतिक आपदा ने किसानों को कही का न छोड़ा। खाद-बीज पानी के लिए किसान कर्ज के दल दल में फंस गया है। इस क्षेत्र से नहर निकल जाये तो किसानों का भला हो जायेगा ।
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तहसील पाली के कई गांवों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध नहीं होने के कारण किसानों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सबसे ज्यादा दिक्कतें बालाबेहट क्षेत्र के पठारी इलाकों के सैकड़ों गांवों में किसानों को अपने खेतों की सिंचाई करने के लिए सामने आतीं हैं। इस क्षेत्र में सिंचाई के लिए कोई खास इंतजाम नहीं है। जिन किसानों के निजी नलकूप है उनकी तो नैया तो पार लग जाती है, बाकी बचे अधिकांश किसान जो प्राकृतिक जलश्रोतों, चेकडेमों आदि पर निर्भर होकर अपने खेतों की प्यास बुझाने के इंतजाम में कड़ी मशक्कत करते रहते हैं। इन श्रोतों का पानी भी पहली ही सिंचाई में रसातल को चला जाता है। ऐसे तटों पर पानी को लेकर मारामारी सी मची रहती है। रसातल में पानी चले जाने से यहां का किसान मावठ (बारिश) गिरने की टकटकी लगाने लगता है । मावठ न गिरने पर निजी नलकूपों से महंगा पानी खरीदना पड़ता है। पानी की कीमत भी 150 रुपये से लेकर 200 रुपये प्रति घंटा होती है। यही वजह है की यहां का किसान कम पानी चाहने वाली फसल की बुवाई करता है। जिसमें उसको मुनाफा भी कम ही हो पाता है। इस क्षेत्र में किसानों के लिए ऐसी कोई नदी, नहर नहीं है जो इनकी पैदावार को उम्मीद के मुताबिक खड़ा कर सके। इस मुशिकल घड़ी से निपटने के लिए गरीब किसान अपनी खेती ठेके पर देकर खुद मेहनत मजदूरी कर अपनी आजीविका जुटाने मे लगा रहता है ।
रबर बांध की हवा निकली
ग्राम बालाबेहट में सिंचाई विभाग द्वारा सिंचाई का साधन उपलब्ध कराने के लिए सौंर नदी पर प्रदेश का पहला रबर बांध प्रस्तावित किया था। रबर बांध बनाने को लेकर सर्वे हो चुका है, लेकिन वन विभाग की जमीन के कारण मामला ठंडे बस्ते में चला गया है। प्रस्तावित रबर बांध की योजना से पूरे क्षेत्र के किसानों में एक गजब की खुशी लहर दौड़ गई थी। लेकिन जानकारी के मुताबिक इस बांध को लेकर स्थिति असमंजस वाली हो गई है। इस बांध का निर्माण जल्द हो जाता तो यहां हरित क्रांति आ जाती। लेकिन इस रबर बांध की हवा फिलहाल मे निकली सी लग रही है। सिंचाई के लिए यहां के किसान नहर की भी मांग करते आये लेकिन किसानों की इस बदहाली को मुद्दा बनाकर राजनीति तो खूब होती है। लेकिन किसानों को उनकी बदहाली से निकालने के लिए कोई खास पहल नही होती ।
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बदहाल है पाली के तालाब
पाली। लगभग 150 एकड़ से ज्यादा क्षेत्रफल में फैले पाली कस्बे के भुजरया तालाब में आज एक बूंद पानी नही है। तालाब पर बने चेकडैम में है, जिसका उपयोग किसान सिंचाई के लिए कर रहे हैं। नीलकंठ तालाब का दायरा भी सिकुड़ गया है। नागौरी का तालाब में सिर्फ इतना ही पहली सिंचाई का काम चला देगा। सिंचाई विभाग द्वारा जनपद में दो दर्जन से ज्यादा तालाबों का जीर्णोद्धार कराया गया, लेकिन पाली कस्बे के तालाबों का कोई ध्यान नहीं रखा गया। जबकि जिन क्षेत्रों में नहर का साधन उपलब्ध है, लेकिन फिर भी पाली के तालाबों का जीर्णोद्घार नहीं कराया है।
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जाखलौन पंप केनाल से मिल सकती नहर
लगभग दो दशक पूर्व से पाली क्षेत्र के किसान जाखलौन पंप केनाल से नहर की मांग करते आ रहे है। नहर के जुड़ने से पाली के बड़े भाग में सिंचाई के लिए पानी मिल जाएगा। वंट, सिमरधा, चीमना आदि गांवों से होकर यह डोंगरा क्षेत्र तक सिंचित कर सकती है। इस संबंध में नगर पंचायत चेयरमैन रामकुमार चौरसिया का कहना है की डीएम व सिंचाई विभाग के उच्चाधिकारियों को ज्ञापन व पत्राचार के माध्यम से अवगत कराया । लेकिन आश्वासनों के अलावा अब कुछ हासिल नही हुआ । किसानों के हित मे नहर के लिए हाईकोर्ट मे एक याचिका दायर करने का विचार चल रहा है। पाली से तीन किलोमीटर की दूरी पर कनपुरा घाटी लग जाती है। पठारी इलाकों में निजी नलकूपों को 300 फीट से ज्यादा खुदवाना पड़ता है। इसमें भी किसी किस्मत वाले की लकीर में ही पानी निकलता है, अन्य किसानों की जमीन खोखली होती रहती है
क्षेत्र को बांध व नहर की जरूरत
पार्षद अरविंद चौरसिया का कहना है की पाली क्षेत्र में नहर का होना आवश्यक है। पानी के अभाव के चलते किसानों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है । छन्नू खां मंसूरी का कहना है बीते दो साल से प्राकृतिक आपदा ने किसानों को कही का न छोड़ा। खाद-बीज पानी के लिए किसान कर्ज के दल दल में फंस गया है। इस क्षेत्र से नहर निकल जाये तो किसानों का भला हो जायेगा ।