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घंटे-घड़ियाल गूंजे, जागे देवाधिदेव
ब्यूरो
Updated Mon, 23 Nov 2015 12:36 AM IST
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ललितपुर। असाढ़ सुदी ग्यारस अर्थात देवशयनी ग्यारस से क्षीर सागर में सो रहे देवाधिदेव भगवान विष्णु का रविवार की रात्रि घंटे-घड़ियाल गूंजने से जागरण हो गया।
इस दौरान मंदिरों और घरों में गन्ने के मंडप बनाए गए और पंचामृत से भगवान का स्नान कराया गया। देवोत्थान एकादशी की मंत्रोच्चार के बीच पूजा-अर्चना की गई।
माना जाता है कि देवशयनी ग्यारस के दिन देवाधिदेव भगवान नारायण (विष्णुजी) छह माह के लिए क्षीर सागर में विश्राम करने चले जाते हैं। इससे सनातन धर्मावलंबियों के यहां पर शादी आदि शुभ कार्य बंद हो जाते हैं। छह माह विश्राम करने के बाद कार्तिक माह की देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान नारायण का जागरण होता है। जागरण से सभी शुभ कार्य वैवाहिक क्रियाएं, गृह प्रवेश, जनेऊ, नामकरण संस्कार आदि कार्य शुरू हो जाते हैं।
रविवार को देवोत्थान एकादशी के अवसर पर बाजार में खरीदारों की भीड़ उमड़ी। लोगों ने पूजा के सामान की खरीदारी की। बाजार में 20 रुपये में कमल का फूल व कुम्हार के दीयों की एक सुराती 10 से 15 रुपये में बिकती रही। ग्वालन 20 रुपये व देवी-देवताओं के पोस्टर भी अलग-अलग कीमत में मौजूद रहे। पूजा के लिए फूल भी लोगों ने खरीदे।
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शाम होते ही मंदिरों के साथ घरों में तैयारियां शुरू हो गईं। गन्ने का मंडप सजाया गया। भगवान नारायण का पंचामृत से स्नान कराने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच घंटे व घड़ियाल की गूंज पर भगवान का जागरण हुआ। जागरण होते ही मंदिरों के साथ घरों में जयकारे लगने लगे। जयकारों का सिलसिला देर तक चलता रहा। इसके बाद आतिशबाजी हुई, जो देर रात तक चलती रही।
इन मंदिरों में हुआ तुलसी विवाह
देवोत्थानी एकादशी के अवसर पर नगर के श्री रघुनाथ जी बड़ा मंदिर, नृसिंह मंदिर, जगदीश मंदिर, तुवन मंदिर, रामराजा मंदिर आदि मंदिरों में विधि- विधान से भगवान शालिगराम व तुलसी का विवाह संपन्न किया गया। भगवान के जयकारों की गूंज दूर-दूर तक सुनाई दी।
इनका कहना है
सनातन धर्म में देवोत्थान एकादशी का विशेष महत्व है। इस दिन से सभी शुभ कार्यों का श्रीगणेश हो जाता है। मंदिरों के साथ घरों में भगवान विष्णु अर्थात नारायण का पंचामृत से स्नान कराया जाता है। इसके बाद विधिविधान से पूजा-अर्चना होती है।
- पवन कुमार शास्त्री
ज्योतिषाचार्य
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इस दौरान मंदिरों और घरों में गन्ने के मंडप बनाए गए और पंचामृत से भगवान का स्नान कराया गया। देवोत्थान एकादशी की मंत्रोच्चार के बीच पूजा-अर्चना की गई।
माना जाता है कि देवशयनी ग्यारस के दिन देवाधिदेव भगवान नारायण (विष्णुजी) छह माह के लिए क्षीर सागर में विश्राम करने चले जाते हैं। इससे सनातन धर्मावलंबियों के यहां पर शादी आदि शुभ कार्य बंद हो जाते हैं। छह माह विश्राम करने के बाद कार्तिक माह की देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान नारायण का जागरण होता है। जागरण से सभी शुभ कार्य वैवाहिक क्रियाएं, गृह प्रवेश, जनेऊ, नामकरण संस्कार आदि कार्य शुरू हो जाते हैं।
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रविवार को देवोत्थान एकादशी के अवसर पर बाजार में खरीदारों की भीड़ उमड़ी। लोगों ने पूजा के सामान की खरीदारी की। बाजार में 20 रुपये में कमल का फूल व कुम्हार के दीयों की एक सुराती 10 से 15 रुपये में बिकती रही। ग्वालन 20 रुपये व देवी-देवताओं के पोस्टर भी अलग-अलग कीमत में मौजूद रहे। पूजा के लिए फूल भी लोगों ने खरीदे।
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शाम होते ही मंदिरों के साथ घरों में तैयारियां शुरू हो गईं। गन्ने का मंडप सजाया गया। भगवान नारायण का पंचामृत से स्नान कराने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच घंटे व घड़ियाल की गूंज पर भगवान का जागरण हुआ। जागरण होते ही मंदिरों के साथ घरों में जयकारे लगने लगे। जयकारों का सिलसिला देर तक चलता रहा। इसके बाद आतिशबाजी हुई, जो देर रात तक चलती रही।
इन मंदिरों में हुआ तुलसी विवाह
देवोत्थानी एकादशी के अवसर पर नगर के श्री रघुनाथ जी बड़ा मंदिर, नृसिंह मंदिर, जगदीश मंदिर, तुवन मंदिर, रामराजा मंदिर आदि मंदिरों में विधि- विधान से भगवान शालिगराम व तुलसी का विवाह संपन्न किया गया। भगवान के जयकारों की गूंज दूर-दूर तक सुनाई दी।
इनका कहना है
सनातन धर्म में देवोत्थान एकादशी का विशेष महत्व है। इस दिन से सभी शुभ कार्यों का श्रीगणेश हो जाता है। मंदिरों के साथ घरों में भगवान विष्णु अर्थात नारायण का पंचामृत से स्नान कराया जाता है। इसके बाद विधिविधान से पूजा-अर्चना होती है।
- पवन कुमार शास्त्री
ज्योतिषाचार्य