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जिसने मांगा हक, उस पर दर्ज हुआ मुकदमा
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 11 Oct 2016 12:28 AM IST
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- फोटो : demo pic
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वन अधिकार अधिनियम को भले ही सालों गुजर गए हों, लेकिन जनपद के जंगलों में निवास करने वाले सहारिया परिवारों को अब जाकर फायदा मिल सकेगा। अब तक जनपद में जिस परिवार ने भी वन अधिकार अधिनियम के तहत दावा पेश किया, उस पर वन विभाग की ओर से मुकदमा दर्ज करा दिया गया। पिछले दिनों प्रदेश सरकार द्वारा इस अधिनियम का फायदा पहुंचाने के लिए जल्द ही वन आधारित जीवन जीने वाले परिवारों को उनके कब्जे वाली जमीन का पट्टा देने की घोषणा की है।
वन अधिकार अधिनियम को लागू हुए करीब दस वर्ष बीतने वाले हैं, लेकिन इतने वर्षों में जनपद में केवल ग्राम क्योलारी के एक परिवार को इसका लाभ मिल सका है। चुनावी साल को देखते हुए राज्य सरकार ने 7 अक्टूबर को 13 जिलों के जिलाधिकारियों से उन लोगों के दावा पत्र मांगे हैं, जो कि लंबे समय से वन भूमि पर कब्जा कर जीवन यापन कर रहे हैं। इसमें परंपरागत श्रेणी के लोगों से इतर को 75 वर्ष से जमीन पर कब्जे के सबूत देने होंगे, तो अनुसूचित जनजाति के लोगों को 13 दिसंबर 2005 या उससे पहले के निवास संबंधी सबूत पेश करने होंगे।
जनपद में सबसे ज्यादा सहारिया जनजाति के लोग जंगलों में निवास करते हैं। जंगल आधारित उपज पर ही निर्भर हैं। पूर्व में ग्राम अधिकार वन समिति के माध्यम से जनपद के करीब दो हजार परिवारों ने जंगल की जमीन पर पट्टे के लिए दावा पत्र पेश किया था लेकिन इन परिवारों को दावा पत्र पेश करना मुसीबत बन गया। वन विभाग की ओर से इन दो हजार परिवारों में से करीब 12 सौ परिवारों पर मुकदमा दर्ज करा दिया गया। गरीब, अनपढ़ लोग इन मुकदमों से डर गए और उन्होंने जंगल की जमीन पर हक जताना छोड़ दिया।
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जनपद में वन विभाग की भूमिका वन अधिकार अधिनियम को लागू कराने में नकारात्मक रही है। जिसने भी वन भूमि पर पट्टे के लिए आवेदन किया, तो उस पर मुकदमा दर्ज हुआ। हैरान करने वाली बात है, कि जिस जमीन पर वन विभाग आदिवासियों को खेती करने से मना कर रहा है, उसी जमीन पर वन कर्मियों की मिलीभगत से प्रभावशाली लोग खेत जोत रहे हैं।
वन विभाग की हजारों एकड़ जमीन पर खुलेआम खेती हो रही है, लेकिन वन विभाग की ओर से कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। जनपद के ग्राम महोली, भौरान, बांसपुर, बुढ़वार, रानीपुरा, चमरुउआ, इकलगुंवा, हर्षपुर, राजपुर, कोटरा गांवों में हजारों हेक्टेयर वन भूमि पर कब्जा है। सहारिया जनजाति के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे एडवोकेट मुरारी लाल जैन बताते हैं, कि वन विभाग द्वारा जनपद में दोहरी नीति अपनाई जा रही है। अधिकार के तहत वन विभाग इन परिवारों को जंगली उपज का उपयोग जीवकोपार्जन के लिए देता है। वन विभाग ये मानता है, कि इन परिवारों के जीवकोपार्जन का सहारा जंगली उपज है, लेकिन जंगली जमीन पर कब्जा मानने से इंकार करता है।
अमर उजाला ने दिखाया था जुल्म
गर्मी के मौसम में सूखे से जूझ रहे जनपद की हकीकत को दर्शाने के लिए अमर उजाला ने बुंदेलखंड में संकट सीरीज को चलाया था। इस सीरीज में जनपद के विभिन्न इलाकों में पेयजल की कमी को उजागर किया था। इस दौरान ही वन विभाग का अमानवीय चेहरा भी सामने आया था। ग्राम बालाबेहट के मजरा कछयाना में सहारिया बस्ती में लगे एक हैंडपंप को वन विभाग के लोगों ने तोड़ दिया था। लेकिन पानी के लिए तरसते सहारिया बस्ती के लोगों ने बोरिंग के पाइप में रस्सी के सहारे एक छोटा बर्तन डालकर पानी निकालना शुरु कर दिया। अमर उजाला की इस खबर को संज्ञान में लेते हुए जिलाधिकारी ने इस हैंडपंप को सही कराने के निर्देश दिए थे। कुछ वर्ष पूर्व ग्राम महोली में भी वर्षों से जंगल की जमीन पर रहकर अपने परिवार का जीवन यापन करने वाले आदिवासियों को वन विभाग द्वारा जबरन हटाने पर खूनी संघर्ष हो गया था।
इनका कहना है
जंगली जमीन के पट्टे दिलाने के लिए जल्द ही तेजी से अभियान चलाया जाएगा। जिन लोगों के दावा पत्र प्रशासन के पास जमा हैं, उनकी जांच कराकर पट्टा दिलाया जाएगा। डा रुपेश कुमार जिलाधिकारी
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वन अधिकार अधिनियम को लागू हुए करीब दस वर्ष बीतने वाले हैं, लेकिन इतने वर्षों में जनपद में केवल ग्राम क्योलारी के एक परिवार को इसका लाभ मिल सका है। चुनावी साल को देखते हुए राज्य सरकार ने 7 अक्टूबर को 13 जिलों के जिलाधिकारियों से उन लोगों के दावा पत्र मांगे हैं, जो कि लंबे समय से वन भूमि पर कब्जा कर जीवन यापन कर रहे हैं। इसमें परंपरागत श्रेणी के लोगों से इतर को 75 वर्ष से जमीन पर कब्जे के सबूत देने होंगे, तो अनुसूचित जनजाति के लोगों को 13 दिसंबर 2005 या उससे पहले के निवास संबंधी सबूत पेश करने होंगे।
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जनपद में सबसे ज्यादा सहारिया जनजाति के लोग जंगलों में निवास करते हैं। जंगल आधारित उपज पर ही निर्भर हैं। पूर्व में ग्राम अधिकार वन समिति के माध्यम से जनपद के करीब दो हजार परिवारों ने जंगल की जमीन पर पट्टे के लिए दावा पत्र पेश किया था लेकिन इन परिवारों को दावा पत्र पेश करना मुसीबत बन गया। वन विभाग की ओर से इन दो हजार परिवारों में से करीब 12 सौ परिवारों पर मुकदमा दर्ज करा दिया गया। गरीब, अनपढ़ लोग इन मुकदमों से डर गए और उन्होंने जंगल की जमीन पर हक जताना छोड़ दिया।
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जनपद में वन विभाग की भूमिका वन अधिकार अधिनियम को लागू कराने में नकारात्मक रही है। जिसने भी वन भूमि पर पट्टे के लिए आवेदन किया, तो उस पर मुकदमा दर्ज हुआ। हैरान करने वाली बात है, कि जिस जमीन पर वन विभाग आदिवासियों को खेती करने से मना कर रहा है, उसी जमीन पर वन कर्मियों की मिलीभगत से प्रभावशाली लोग खेत जोत रहे हैं।
वन विभाग की हजारों एकड़ जमीन पर खुलेआम खेती हो रही है, लेकिन वन विभाग की ओर से कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। जनपद के ग्राम महोली, भौरान, बांसपुर, बुढ़वार, रानीपुरा, चमरुउआ, इकलगुंवा, हर्षपुर, राजपुर, कोटरा गांवों में हजारों हेक्टेयर वन भूमि पर कब्जा है। सहारिया जनजाति के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे एडवोकेट मुरारी लाल जैन बताते हैं, कि वन विभाग द्वारा जनपद में दोहरी नीति अपनाई जा रही है। अधिकार के तहत वन विभाग इन परिवारों को जंगली उपज का उपयोग जीवकोपार्जन के लिए देता है। वन विभाग ये मानता है, कि इन परिवारों के जीवकोपार्जन का सहारा जंगली उपज है, लेकिन जंगली जमीन पर कब्जा मानने से इंकार करता है।
अमर उजाला ने दिखाया था जुल्म
गर्मी के मौसम में सूखे से जूझ रहे जनपद की हकीकत को दर्शाने के लिए अमर उजाला ने बुंदेलखंड में संकट सीरीज को चलाया था। इस सीरीज में जनपद के विभिन्न इलाकों में पेयजल की कमी को उजागर किया था। इस दौरान ही वन विभाग का अमानवीय चेहरा भी सामने आया था। ग्राम बालाबेहट के मजरा कछयाना में सहारिया बस्ती में लगे एक हैंडपंप को वन विभाग के लोगों ने तोड़ दिया था। लेकिन पानी के लिए तरसते सहारिया बस्ती के लोगों ने बोरिंग के पाइप में रस्सी के सहारे एक छोटा बर्तन डालकर पानी निकालना शुरु कर दिया। अमर उजाला की इस खबर को संज्ञान में लेते हुए जिलाधिकारी ने इस हैंडपंप को सही कराने के निर्देश दिए थे। कुछ वर्ष पूर्व ग्राम महोली में भी वर्षों से जंगल की जमीन पर रहकर अपने परिवार का जीवन यापन करने वाले आदिवासियों को वन विभाग द्वारा जबरन हटाने पर खूनी संघर्ष हो गया था।
इनका कहना है
जंगली जमीन के पट्टे दिलाने के लिए जल्द ही तेजी से अभियान चलाया जाएगा। जिन लोगों के दावा पत्र प्रशासन के पास जमा हैं, उनकी जांच कराकर पट्टा दिलाया जाएगा। डा रुपेश कुमार जिलाधिकारी