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Lalitpur News: श्रद्धा व उत्साह से मनाया गुरु हरकिशन साहिब का प्रकाश पर्व
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संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। गुरुद्वारा साहिब लक्ष्मीपुरा में शुक्रवार को गुरु हरकिशन साहिब का प्रकाश पर्व श्रद्धा भावना के साथ मनाया गया। धार्मिक आयोजन में सुबह साप्ताहिक पाठ साहिब का आयोजन किया गया।
मुख्य ग्रंथी ज्ञानी दलजीत सिंह व चरणजीत सिंह ने गुरबाणी कथा कीर्तन द्वारा संगत को निहाल किया गया। उन्होंने कहा कि सिखों के आठवें गुरु हरकिशन सिंह बचपन से ही बहुत ही गंभीर और सहनशील प्रवृत्ति के थे। उनके पिता अक्सर हर किशन के बड़े भाई राम राय और उनकी कठिन परीक्षा लेते रहते थे। जब हर किशन गुरुबाणी पाठ कर रहे होते तो वे उन्हें सुई चुभाते, लेकिन बाल हर किशन गुरुबाणी में ही रमे रहते।
पांच साल की उम्र में उनके पिता गुरु हरिराय ने गुरु हरकिशन को हर तरह योग्य मानते हुए सन् 1661 में गुरुगद्दी उन्हें सौंपी थी। इसीलिए उन्हें बाल गुरु भी कहा गया है। गुरु हरकिशन ने ऊंच-नीच और जाति का भेद-भाव मिटाकर सेवा का अभियान चलाया। लोग उनकी मानवता की इस सेवा से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें बाला पीर कहकर पुकारने लगे। हरकिशन अब सिखों के 8वें गुरु बन गए थे।
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गुरु सिंह सभा के अध्यक्ष ओंकार सिंह सलूजा ने कहा कि हरकिशन की याद में की दिल्ली का मशहूर गुरुद्वारा बंगला साहिब बना है। मंत्री मनजीत सिंह सलूजा ने कहा कि अमृतसर में 30 मार्च 1964 को चेचक की बीमारी के कारण महज आठ वर्ष की आयु में सिखों के सबसे छोटे गुरु गुरु हरकिशन सिंह ने प्राण त्याग दिए थे। लंगर की सेवा स्व. सरदार अवतार सिंह के परिवार की ओर से हुई।
इस अवसर पर गुरु सिंह सभा के अध्यक्ष ओंकार सिंह सलूजा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष हरविंदर सिंह सलूजा, कोषाध्यक्ष परमजीत सिंह छतवाल, हरजीत सिंह, गुणबीर सिंह, सतनाम सिंह भाटिया, अरविंदर सिंह सागरी, गौरव सिंह, अवतार सिंह आदि उपस्थित रहे।
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ललितपुर। गुरुद्वारा साहिब लक्ष्मीपुरा में शुक्रवार को गुरु हरकिशन साहिब का प्रकाश पर्व श्रद्धा भावना के साथ मनाया गया। धार्मिक आयोजन में सुबह साप्ताहिक पाठ साहिब का आयोजन किया गया।
मुख्य ग्रंथी ज्ञानी दलजीत सिंह व चरणजीत सिंह ने गुरबाणी कथा कीर्तन द्वारा संगत को निहाल किया गया। उन्होंने कहा कि सिखों के आठवें गुरु हरकिशन सिंह बचपन से ही बहुत ही गंभीर और सहनशील प्रवृत्ति के थे। उनके पिता अक्सर हर किशन के बड़े भाई राम राय और उनकी कठिन परीक्षा लेते रहते थे। जब हर किशन गुरुबाणी पाठ कर रहे होते तो वे उन्हें सुई चुभाते, लेकिन बाल हर किशन गुरुबाणी में ही रमे रहते।
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पांच साल की उम्र में उनके पिता गुरु हरिराय ने गुरु हरकिशन को हर तरह योग्य मानते हुए सन् 1661 में गुरुगद्दी उन्हें सौंपी थी। इसीलिए उन्हें बाल गुरु भी कहा गया है। गुरु हरकिशन ने ऊंच-नीच और जाति का भेद-भाव मिटाकर सेवा का अभियान चलाया। लोग उनकी मानवता की इस सेवा से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें बाला पीर कहकर पुकारने लगे। हरकिशन अब सिखों के 8वें गुरु बन गए थे।
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गुरु सिंह सभा के अध्यक्ष ओंकार सिंह सलूजा ने कहा कि हरकिशन की याद में की दिल्ली का मशहूर गुरुद्वारा बंगला साहिब बना है। मंत्री मनजीत सिंह सलूजा ने कहा कि अमृतसर में 30 मार्च 1964 को चेचक की बीमारी के कारण महज आठ वर्ष की आयु में सिखों के सबसे छोटे गुरु गुरु हरकिशन सिंह ने प्राण त्याग दिए थे। लंगर की सेवा स्व. सरदार अवतार सिंह के परिवार की ओर से हुई।
इस अवसर पर गुरु सिंह सभा के अध्यक्ष ओंकार सिंह सलूजा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष हरविंदर सिंह सलूजा, कोषाध्यक्ष परमजीत सिंह छतवाल, हरजीत सिंह, गुणबीर सिंह, सतनाम सिंह भाटिया, अरविंदर सिंह सागरी, गौरव सिंह, अवतार सिंह आदि उपस्थित रहे।