{"_id":"65f604ae7c169aa53c01fa0a","slug":"guru-disciple-relationship-is-like-devotee-and-god-acharya-nirbhay-sagar-lalitpur-news-c-131-1-ltp1001-111939-2024-03-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"गुरु-शिष्य का रिश्ता भक्त और भगवान जैसा : आचार्य निर्भय सागर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गुरु-शिष्य का रिश्ता भक्त और भगवान जैसा : आचार्य निर्भय सागर
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
मड़ावरा। आचार्य निर्भयसागर महाराज का शनिवार को मंगल आगमन हुआ। श्रद्धालु नगर की सीमा पर गाजे बाजे से जयकारा लगाते हुए गुरुवर की श्रद्धापूर्वक मंगल आरती और पाद प्रक्षालन कर उन्हें स्थानीय विद्याविहार ले गए।
विद्याविहार में आचार्य निर्भयसागर के मंगल प्रवचन से पहले आचार्य विद्यासागर महाराज के चित्र का अनावरण डाॅ. शिखरचंद्र, श्रेयांस सिंघई, कंछेदी सिंघई एवं द्वीप प्रज्वलन देवेंद्र जैन, राजेंद्र घ्या, विक्रम बजाज ने किया। दिगंबर संत के नगर आगमन पर संजय कुमार, मनोज कुमार, अनुज कुमार, प्रदीप कुमार खन्ना परिवार ने आचार्य निर्भयसागर महाराज के चरणों का पाद प्रक्षालन और शास्त्र भेंट महिला मंडल व बालिका मंडल ने किया। आचार्य श्री ने कहा कि रिश्ते बिकते नहीं और न ही बाजार में मिलते हैं। रिश्ते विचार और भावना से बनते हैं और रिश्तों का मूल्य बिल से नहीं दिल से चुकता है। जब अपेक्षा के अनुसार काम नहीं होता, रिश्तों की अपेक्षा और उपेक्षा होने लगती है तब रिश्ते टूट जाते हैं।
गुरु-शिष्य का रिश्ता भक्त और भगवान जैसा है, जो लोहे की जंजीर से भी अधिक मजबूत होता है। आचार्यश्री ने कहा कि पुण्य से सुख मिलता है और पाप से दुख मिलता है। इंसान पुण्य के फल को चाहता है पर पुण्य का कार्य कम करता है। पाप के फल को चाहता नहीं और पाप दिन रात करता है। गुरु पाषाण को भी परमात्मा बना देते हैं, मूर्छित पड़े समाज को भी होश में ले आते हैं। गुरु को उच्च स्थान पर इसलिए बैठाते हैं क्योंकि गुरु अपने ज्ञान से ठीक वैसे प्रकाशित करते हैं जैसे दीपक कमरे को प्रकाशित करता है, इसलिए प्रकाश देने वाले दीपक को भी ऊपर रखा जाता है। गुरु भौतिक जगत से हटाकर आध्यात्मिक जगत में लाते हैं और आध्यात्मिक ऊर्जा से सभी को भर देते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
मड़ावरा। आचार्य निर्भयसागर महाराज का शनिवार को मंगल आगमन हुआ। श्रद्धालु नगर की सीमा पर गाजे बाजे से जयकारा लगाते हुए गुरुवर की श्रद्धापूर्वक मंगल आरती और पाद प्रक्षालन कर उन्हें स्थानीय विद्याविहार ले गए।
विद्याविहार में आचार्य निर्भयसागर के मंगल प्रवचन से पहले आचार्य विद्यासागर महाराज के चित्र का अनावरण डाॅ. शिखरचंद्र, श्रेयांस सिंघई, कंछेदी सिंघई एवं द्वीप प्रज्वलन देवेंद्र जैन, राजेंद्र घ्या, विक्रम बजाज ने किया। दिगंबर संत के नगर आगमन पर संजय कुमार, मनोज कुमार, अनुज कुमार, प्रदीप कुमार खन्ना परिवार ने आचार्य निर्भयसागर महाराज के चरणों का पाद प्रक्षालन और शास्त्र भेंट महिला मंडल व बालिका मंडल ने किया। आचार्य श्री ने कहा कि रिश्ते बिकते नहीं और न ही बाजार में मिलते हैं। रिश्ते विचार और भावना से बनते हैं और रिश्तों का मूल्य बिल से नहीं दिल से चुकता है। जब अपेक्षा के अनुसार काम नहीं होता, रिश्तों की अपेक्षा और उपेक्षा होने लगती है तब रिश्ते टूट जाते हैं।
विज्ञापन
गुरु-शिष्य का रिश्ता भक्त और भगवान जैसा है, जो लोहे की जंजीर से भी अधिक मजबूत होता है। आचार्यश्री ने कहा कि पुण्य से सुख मिलता है और पाप से दुख मिलता है। इंसान पुण्य के फल को चाहता है पर पुण्य का कार्य कम करता है। पाप के फल को चाहता नहीं और पाप दिन रात करता है। गुरु पाषाण को भी परमात्मा बना देते हैं, मूर्छित पड़े समाज को भी होश में ले आते हैं। गुरु को उच्च स्थान पर इसलिए बैठाते हैं क्योंकि गुरु अपने ज्ञान से ठीक वैसे प्रकाशित करते हैं जैसे दीपक कमरे को प्रकाशित करता है, इसलिए प्रकाश देने वाले दीपक को भी ऊपर रखा जाता है। गुरु भौतिक जगत से हटाकर आध्यात्मिक जगत में लाते हैं और आध्यात्मिक ऊर्जा से सभी को भर देते हैं।
विज्ञापन