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प्रभु भक्ति ही मुक्ति का पथ: देवाचार्य
ब्यूराे/अमर उजाला
Updated Wed, 02 Mar 2016 01:08 AM IST
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ललितपुर। श्री तुवन मंदिर प्रांगण पर चल रही श्रीराम कथा व श्री लक्ष्मी नृसिंह मंदिर पर चल रहे श्रीराम चरित मानस पाठ का समापन हो गया है। कार्यक्रम समापन पर भंडारा आयोजित किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने प्रसाद पाया।
मंगलवार को श्रीराम कथा के आठवें व समापन के दिन पीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्र दास देवाचार्य महाराज ने कहा कि मनुष्य देह का सर्वोच्च व अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। चौरासी लाख योनियों में श्रेष्ठ मानव शरीर पाकर यदि सत्कर्म नहीं हुए तो प्रभु स्मरण नहीं हुआ। सदाचार, सत्य, अहिंसा, करुणा, दया प्रेम नहीं रहा तो मानव जीवन व्यर्थ है। प्रभु के नाम, रूप, लीला एवं धाम में निरंतर बने रहने में ही जीवन सफल है। उन्होंने बताया कि ग्रंथों में कहा गया है कि प्रभु भक्ति इतनी आनंदमयी है कि रसिक भक्त मोक्ष तक की कामना से परे हो जाता है। मानव जीवन की उपलब्धि मोक्ष सत्संग से प्राप्त होती है। अत: सत्संग में निरंतर मनसा, वाचा, कर्मणा व पूर्ण मनोयोग से सहभागी बनना चाहिए।
श्रीराम कथा के शुभारंभ पर मुख्य यजमान ऊषा जायसवाल और नगर पालिका अध्यक्ष सुभाष जायसवाल ने श्री रामायण की पूजा व आरती की। देवाचार्य ने कहा कि यदि मन में कोई शुभ संकल्प प्रकट हो तो उसे अतिशीघ्र पूर्ण करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य का जीवन क्षण भंगुर है। सदकर्म ही जीवन के कल्याण का आधार हैं, इसलिए शुभ संकल्प आगे के लिए टालना उचित नहीं है। पूजा- पाठ, गौ सेवा, दानधर्म यह पुण्यदायी होते हैं। शास्त्रों की आज्ञा है कि दोनों हाथों से सत्कर्म करें, यह न सोचें कि बायां हाथ अशुभ है। उन्होंने बताया कि भगवान माया पति हैं और परमात्मा मायायुक्त हैं। साधक भी जब माया के मुक्त होकर प्रभु पद में शरणागति प्राप्त कर लें, तभी वह मुक्त माना जाएगा। इस दौरान उन्होंने कथा के साथ- साथ विभिन्न पुराणों के उदाहरण दिए। कथा के अंत में डा.ओमप्रकाश शास्त्री ने नगर वासियों की ओर से देवाचार्य महाराज का अभिनंदन व्यक्त किया। संचालक दीनबंधु दास महाराज ने सहयोगियों व श्रद्घालुओं का आभार व्यक्त किया। पूर्व विधायक रामकुमार तिवारी द्वारा भंडारे का आयोजन किया गया।
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नवाह परायण का समापन
सुम्मेरा तालाब स्थित श्री लक्ष्मी नृसिंह मंदिर पर चल रहे रामचरित मानस नवाह पारायण का वैदिक विधि विधान से समापन हो गया। इस अवसर पर मनोरथी निखिल तिवारी, सुभाष जायसवाल और नरेश शेखावत ने श्रीरामायण की मंगल आरती की। रामायण विर्सजन का सस्वर पाठ गिरधर गोपाल शास्त्री एवं संत गांगादास महाराज, दीनबंधुदास, जगन्नाथदास, रसराज और श्यामल दास ने संपन्न कराया।
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मंगलवार को श्रीराम कथा के आठवें व समापन के दिन पीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्र दास देवाचार्य महाराज ने कहा कि मनुष्य देह का सर्वोच्च व अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। चौरासी लाख योनियों में श्रेष्ठ मानव शरीर पाकर यदि सत्कर्म नहीं हुए तो प्रभु स्मरण नहीं हुआ। सदाचार, सत्य, अहिंसा, करुणा, दया प्रेम नहीं रहा तो मानव जीवन व्यर्थ है। प्रभु के नाम, रूप, लीला एवं धाम में निरंतर बने रहने में ही जीवन सफल है। उन्होंने बताया कि ग्रंथों में कहा गया है कि प्रभु भक्ति इतनी आनंदमयी है कि रसिक भक्त मोक्ष तक की कामना से परे हो जाता है। मानव जीवन की उपलब्धि मोक्ष सत्संग से प्राप्त होती है। अत: सत्संग में निरंतर मनसा, वाचा, कर्मणा व पूर्ण मनोयोग से सहभागी बनना चाहिए।
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श्रीराम कथा के शुभारंभ पर मुख्य यजमान ऊषा जायसवाल और नगर पालिका अध्यक्ष सुभाष जायसवाल ने श्री रामायण की पूजा व आरती की। देवाचार्य ने कहा कि यदि मन में कोई शुभ संकल्प प्रकट हो तो उसे अतिशीघ्र पूर्ण करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य का जीवन क्षण भंगुर है। सदकर्म ही जीवन के कल्याण का आधार हैं, इसलिए शुभ संकल्प आगे के लिए टालना उचित नहीं है। पूजा- पाठ, गौ सेवा, दानधर्म यह पुण्यदायी होते हैं। शास्त्रों की आज्ञा है कि दोनों हाथों से सत्कर्म करें, यह न सोचें कि बायां हाथ अशुभ है। उन्होंने बताया कि भगवान माया पति हैं और परमात्मा मायायुक्त हैं। साधक भी जब माया के मुक्त होकर प्रभु पद में शरणागति प्राप्त कर लें, तभी वह मुक्त माना जाएगा। इस दौरान उन्होंने कथा के साथ- साथ विभिन्न पुराणों के उदाहरण दिए। कथा के अंत में डा.ओमप्रकाश शास्त्री ने नगर वासियों की ओर से देवाचार्य महाराज का अभिनंदन व्यक्त किया। संचालक दीनबंधु दास महाराज ने सहयोगियों व श्रद्घालुओं का आभार व्यक्त किया। पूर्व विधायक रामकुमार तिवारी द्वारा भंडारे का आयोजन किया गया।
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नवाह परायण का समापन
सुम्मेरा तालाब स्थित श्री लक्ष्मी नृसिंह मंदिर पर चल रहे रामचरित मानस नवाह पारायण का वैदिक विधि विधान से समापन हो गया। इस अवसर पर मनोरथी निखिल तिवारी, सुभाष जायसवाल और नरेश शेखावत ने श्रीरामायण की मंगल आरती की। रामायण विर्सजन का सस्वर पाठ गिरधर गोपाल शास्त्री एवं संत गांगादास महाराज, दीनबंधुदास, जगन्नाथदास, रसराज और श्यामल दास ने संपन्न कराया।