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एक-एक कर विलुप्त हो रहीं जड़ी-बूटियां

Thu, 03 Nov 2016 12:30 AM IST
lalitpur
lalitpur Updated Thu, 03 Nov 2016 12:30 AM IST
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forest plant
जंगल - फोटो : demo pic
ललितपुर। प्रदेश के सबसे बड़े वन क्षेत्र ललितपुर में किसी समय बहुतायत में पाई जाने वाली औषधीय जड़ी-बूटियां अब एक-एक कर विलुप्त होती जा रही हैं। जागरूकता के अभाव में लोग अश्वगंधा, ब्राह्मी और शंखपुष्पी जैसी अमूल्य औषधियों को नष्ट कर रहे हैं। इनको बचाने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय औषधीय वनस्पति समिति का गठन किया। लेकिन इसकी सार्थकता अभी तक सामने नहीं आ सकी है। ऐसे में अमूल्य वनस्पतियों को बचाने का संकट खड़ा हो गया है।
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बुंदेलखंड क्षेत्र का ललितपुर जिला अनादिकाल से औषधीय वनस्पतियों के लिए विख्यात रहा है। इन्हीं गुणों के चलते च्यवन ऋषि ने यहां आश्रम बनाकर इन्हें विश्वभर में प्रचलित किया। यहां विभिन्न प्रकार के गुणों से युक्त जड़ी-बूटियों का भंडारण है। विशेषकर मड़ावरा, गौना व ललितपुर वन क्षेत्र में जड़ी-बूटियों की संख्या बहुतायत में है। यहां अश्वगंधा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, सफेद मूसली समेत कई अन्य अमूल्य औषधियां मिलती हैं। वर्तमान आंकड़ों के तहत मूसली, अश्वगंधा, प्लाश, शंखपुष्पी, भूमि आंवला, खेर के बीज, गांद, कसीटा, धावड़ा, कमरकस जड़ी-बूटी विलुप्त हो गई हैं। वर्ष 2000 में केंद्र सरकार ने औषधीय पौधों सफेद मूसली, लेमन, मेंथा, पाल्मारोजा, अश्वगंधा जैसी औषधियों को बचाने के लिए औषधीय उद्योगों के मध्य समन्वय की आवश्यकता महसूस की। इसके बाद केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय औषधीय वनस्पति समिति का गठन किया गया। समिति ने 32 औषधियों के विकास को प्राथमिकता में रखा है। इनमें आंवला, अशोक, अश्वगंधा, अतीस, बेल, भूमि अम्लाकी, ब्राह्मी, चंदन, चिराता, गुग्गल, इसबगोल, जटामांसी, कालमेघ, कोकुम, कथ, कुटकी, मुलेठी, सफेद मूसली, पत्थरचुर, पिप्पली, दारुहल्दी, केसर, सर्पगंधा, शतावरी, तुलसी, वत्सनाम, मकोय प्रजाति के विकास की योजना बनाई। इनमें कुछ विशेष प्रकार की जड़ी-बूटियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। हालात यह हैं कि जागरूकता के अभाव में लोग इन औषधीय पेड़-पौधों को नष्ट कर रहे हैं। वर्तमान में अर्जुन के पेड़ों के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा हैं। दरअसल सहरिया आदिवासी लोग अर्जुन के पेड़ की छाल निकाल ले रहे हैं। इससे इन पेड़ों का विकास अवरुद्ध हो रहा है। कई छोटे पेड़ तो छाल निकलने के कुछ समय बाद उखड़ जाते हैं।
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वन अधिनियम के तहत सहरिया आदिवासियों को जड़ी-बूटी एकत्रित करने का अधिकार दिया गया है। लेकिन, उनमें जागरूकता की कमी है, जिससे वह अविकसित बीज आदि इकट्ठा कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में औषधियों के नए पौधे जन्म नहीं ले पा रहे हैं। विभाग इस दिशा में प्रयास कर रहा है।
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- वीके जैन, प्रभागीय निदेशक, सामाजिक वानिकी प्रभाग ललितपुर।

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