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हर साल फिटनेस, फिर भी बसें खस्ता हाल
ब्यूरो
Updated Mon, 28 Dec 2015 12:39 AM IST
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ललितपुर (ब्यूरो)। जिले में चलने वाली बसों की हालत खस्ता है। यह स्थिति तब है, जब सहायक संभागीय परिवहन विभाग से हर साल निर्धारित शुल्क लेकर बसों को फिटनेस सर्टिफिकेट जारी किया जाता है।
लेकिन, जिले में चलने वाली ज्यादातर बसों की स्थिति काफी खराब है। इनकी खिड़कियों के शीशे टूटे हुए हैं और बॉडी लड़खड़ाती नजर आ जाती है।
जनपद में विभिन्न मार्गों पर 138 बसें संचालित हो रही हैं। संचालन से पूर्व इन बसों की फिटनेस टेस्ट आवश्यक है। इसके लिए सहायक संभागीय परिवहन विभाग से फिटनेस प्रमाण पत्र लेना आवश्यक होता है, इसके बाद ही बस को सड़कों पर दौड़ाया जा सकता है।
परिवहन विभाग द्वारा निर्धारित शुल्क लेकर हर वर्ष बस का फिटनेस प्रमाण पत्र जारी किया जाता है। विभाग द्वारा बसों की कंडीशन मानक अनुसार पूर्ण रूप से सही होने के बाद ही फिटनेस प्रमाण पत्र बस संचालकों को जारी किए जाते हैं। इसके लिए पांच सौ रुपये शुल्क निर्धारित है। लेकिन, बस का फिटनेस प्रमाण पत्र जारी करते समय अधिकारी द्वारा मानकों को दरकिनार किया जाता है। इससे बहुत से बस संचालक और विभागीय कर्मी फिटनेस की अनदेखी करते हैं और प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं।
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लेकिन, बसों में यात्री को बैठने के लिए तमाम सुविधाएं मानक अनुरूप नहीं होती हैं, और तो और बहुत सी बसों की बॉडी की भी स्थिति काफी चिंतनीय होती है। मानक के अनुरूप फिट नहीं होने वाली अधिकांश अनफिट बसें फिटनेस प्रमाण प्राप्त कर धड़ल्ले से सड़कों पर दौड़ रही हैं। ऐसी बसों में लोगों का सफर करना खतरे से खाली नहीं है, लेकिन विभागीय अधिकारियों द्वारा अभियान चलाने के बाद भी ऐसी अनफिट बसों पर कार्रवाई नहीं की जाती है।
दलालों का रहता दखल
एआरटीओ कार्यालय में दो पहिया वाहन के लाइसेंस से लेकर वाहनों के फिटनेस सर्टीफिकेट बनवाने अथवा किसी भी प्रकार के वाहनों पर होने वाली कार्रवाई में दलालों का दखल रहता है। लिपिकों को खुुश करते ही फिटनेस प्रमाण पत्र मिलना मिनटों की बात होती है, जो दलालों के माध्यम से ही संभव है।
वर्षों से बसों का संचालन करने वाले तो बहुत कम ही विभाग के चक्कर लगाते हैं, वह तो बसों के फिटनेस का जिम्मा दलालों को सौंप देते हैं, जिससे उनका काम आसान हो जाता है और बिना किसी मशक्कत के अनफिट बसों का फिटनेस सर्टीफिकेट प्राप्त कर लिया जाता है।
20 साल पुुराने मॉडल के नियम का नहीं हो रहा पालन
जनपद में हर साल चार से पांच बसें निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद सरेंडर तो कर दी जाती हैं, लेकिन लाभ कमाने के चक्कर में बस संचालक बसों का संचालन जारी रखते हैैं। इससे जनपद में बहुत सी बसें कंडम घोषित होने के बाद भी सड़कों पर फर्राटे भर रही हैं।
सहायक संभागीय परिवहन विभाग द्वारा जनपद में 138 बसों को परमिट जारी किए गए हैं, जो विभिन्न रूटों पर निर्धारित समय पर यात्री सेवा के लिए चल रही हैं। सहायक संभागीय परिवहन विभाग द्वारा इन बसों के संचालन का 20 वर्ष पुराने मॉडल का नियम निर्धारित किया गया है। इसके तहत बसों के परमिट जारी करने की तारीख से 20 साल तक बस संचालकों द्वारा सड़कों पर बसों का संचालन किया जा सकता है, लेकिन जनपद के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत से बस संचालकों द्वारा बसों का परमिट सरेंडर करने के बाद भी कंडम हो चुकी बसों का संचालन किया जा रहा है।
ऐसे में बसों में यात्रा कर रहे यात्रियों की जान जोखिम में डाली जा रही है। हालांकि, ऐसी बसें संचालित होने के बाद उन बसों का बीमा नहीं किया जा सकता है और न ही इन बसों के संचालन के दौरान किसी भी हादसे पर क्लेम किया जा सकता है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार इस प्रकार की बसों का संचालन यदि कोई करता है,
तो वह खुद अपनी रिस्क पर ही गाड़ियों का संचालन करेगा और ऐसी बसों के संचालन होते पाए जाने पर विभाग द्वारा संबंधित बस संचालकों पर नियमानुसार कार्रवाई की जाती है। इस प्रकार जनपद के विभिन्न रूटों पर दौड़ रहीं बहुत सी बसों के संचालित होने से लोगों की जान से खिलवाड़ लगातार जारी है।
परमिट सरेंडर, फिर भी चल रही बस
ललितपुर। सहालग समाप्त होने के बाद ग्रामीण क्षेत्र के रूट पर संचालित बसों के आपरेटर परमिट सरेंडर कर देते हैं। इसका मतलब यह है कि उनकी बस रूट पर नहीं चल रही है। जबकि, वह गुपचुप तरीके से बस का संचालन करते रहते हैं। इससे विभाग को खासी चपत लगाई जाती है। लेकिन, विभाग जानते हुए भी इस ओर अनदेखी करता रहता है।
इनका कहना है
यदि कोई बस फिटनेस सर्टिफिकेट के बाद भी अनफिट पाई जाती है, तो बस का फिटनेट तत्काल फेल कर दिया जाएगा। इसको लेकर निर्देश भी जारी कर दिए गए हैं। सरेंडर बस को लेकर यदि कोई सूचना आती है तो पत्रावली तलब कर कार्रवाई की जाएगी।
- सोमलता यादव
एआरटीओ (प्रवर्तन)
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लेकिन, जिले में चलने वाली ज्यादातर बसों की स्थिति काफी खराब है। इनकी खिड़कियों के शीशे टूटे हुए हैं और बॉडी लड़खड़ाती नजर आ जाती है।
जनपद में विभिन्न मार्गों पर 138 बसें संचालित हो रही हैं। संचालन से पूर्व इन बसों की फिटनेस टेस्ट आवश्यक है। इसके लिए सहायक संभागीय परिवहन विभाग से फिटनेस प्रमाण पत्र लेना आवश्यक होता है, इसके बाद ही बस को सड़कों पर दौड़ाया जा सकता है।
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परिवहन विभाग द्वारा निर्धारित शुल्क लेकर हर वर्ष बस का फिटनेस प्रमाण पत्र जारी किया जाता है। विभाग द्वारा बसों की कंडीशन मानक अनुसार पूर्ण रूप से सही होने के बाद ही फिटनेस प्रमाण पत्र बस संचालकों को जारी किए जाते हैं। इसके लिए पांच सौ रुपये शुल्क निर्धारित है। लेकिन, बस का फिटनेस प्रमाण पत्र जारी करते समय अधिकारी द्वारा मानकों को दरकिनार किया जाता है। इससे बहुत से बस संचालक और विभागीय कर्मी फिटनेस की अनदेखी करते हैं और प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं।
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लेकिन, बसों में यात्री को बैठने के लिए तमाम सुविधाएं मानक अनुरूप नहीं होती हैं, और तो और बहुत सी बसों की बॉडी की भी स्थिति काफी चिंतनीय होती है। मानक के अनुरूप फिट नहीं होने वाली अधिकांश अनफिट बसें फिटनेस प्रमाण प्राप्त कर धड़ल्ले से सड़कों पर दौड़ रही हैं। ऐसी बसों में लोगों का सफर करना खतरे से खाली नहीं है, लेकिन विभागीय अधिकारियों द्वारा अभियान चलाने के बाद भी ऐसी अनफिट बसों पर कार्रवाई नहीं की जाती है।
दलालों का रहता दखल
एआरटीओ कार्यालय में दो पहिया वाहन के लाइसेंस से लेकर वाहनों के फिटनेस सर्टीफिकेट बनवाने अथवा किसी भी प्रकार के वाहनों पर होने वाली कार्रवाई में दलालों का दखल रहता है। लिपिकों को खुुश करते ही फिटनेस प्रमाण पत्र मिलना मिनटों की बात होती है, जो दलालों के माध्यम से ही संभव है।
वर्षों से बसों का संचालन करने वाले तो बहुत कम ही विभाग के चक्कर लगाते हैं, वह तो बसों के फिटनेस का जिम्मा दलालों को सौंप देते हैं, जिससे उनका काम आसान हो जाता है और बिना किसी मशक्कत के अनफिट बसों का फिटनेस सर्टीफिकेट प्राप्त कर लिया जाता है।
20 साल पुुराने मॉडल के नियम का नहीं हो रहा पालन
जनपद में हर साल चार से पांच बसें निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद सरेंडर तो कर दी जाती हैं, लेकिन लाभ कमाने के चक्कर में बस संचालक बसों का संचालन जारी रखते हैैं। इससे जनपद में बहुत सी बसें कंडम घोषित होने के बाद भी सड़कों पर फर्राटे भर रही हैं।
सहायक संभागीय परिवहन विभाग द्वारा जनपद में 138 बसों को परमिट जारी किए गए हैं, जो विभिन्न रूटों पर निर्धारित समय पर यात्री सेवा के लिए चल रही हैं। सहायक संभागीय परिवहन विभाग द्वारा इन बसों के संचालन का 20 वर्ष पुराने मॉडल का नियम निर्धारित किया गया है। इसके तहत बसों के परमिट जारी करने की तारीख से 20 साल तक बस संचालकों द्वारा सड़कों पर बसों का संचालन किया जा सकता है, लेकिन जनपद के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत से बस संचालकों द्वारा बसों का परमिट सरेंडर करने के बाद भी कंडम हो चुकी बसों का संचालन किया जा रहा है।
ऐसे में बसों में यात्रा कर रहे यात्रियों की जान जोखिम में डाली जा रही है। हालांकि, ऐसी बसें संचालित होने के बाद उन बसों का बीमा नहीं किया जा सकता है और न ही इन बसों के संचालन के दौरान किसी भी हादसे पर क्लेम किया जा सकता है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार इस प्रकार की बसों का संचालन यदि कोई करता है,
तो वह खुद अपनी रिस्क पर ही गाड़ियों का संचालन करेगा और ऐसी बसों के संचालन होते पाए जाने पर विभाग द्वारा संबंधित बस संचालकों पर नियमानुसार कार्रवाई की जाती है। इस प्रकार जनपद के विभिन्न रूटों पर दौड़ रहीं बहुत सी बसों के संचालित होने से लोगों की जान से खिलवाड़ लगातार जारी है।
परमिट सरेंडर, फिर भी चल रही बस
ललितपुर। सहालग समाप्त होने के बाद ग्रामीण क्षेत्र के रूट पर संचालित बसों के आपरेटर परमिट सरेंडर कर देते हैं। इसका मतलब यह है कि उनकी बस रूट पर नहीं चल रही है। जबकि, वह गुपचुप तरीके से बस का संचालन करते रहते हैं। इससे विभाग को खासी चपत लगाई जाती है। लेकिन, विभाग जानते हुए भी इस ओर अनदेखी करता रहता है।
इनका कहना है
यदि कोई बस फिटनेस सर्टिफिकेट के बाद भी अनफिट पाई जाती है, तो बस का फिटनेट तत्काल फेल कर दिया जाएगा। इसको लेकर निर्देश भी जारी कर दिए गए हैं। सरेंडर बस को लेकर यदि कोई सूचना आती है तो पत्रावली तलब कर कार्रवाई की जाएगी।
- सोमलता यादव
एआरटीओ (प्रवर्तन)