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अभिभावकों की जेब ढीली कर रहे अंग्रेजी स्कूल
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 18 Apr 2016 01:31 AM IST
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english school, lalitpur news
- फोटो : demo
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ललितपुर। जिले में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल अभिभावकों की जेब ढीली करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं। कई स्कूल कापियों में स्कूल की मुहर लगी होने के नाम पर मनमाने रेट वसूल करे रहें हैं। वहीं, कुछ स्कूल हर साल किताबों के प्रकाशक बदलकर नई किताबें खरीदने के लिए अभिभावकों को मजबूर कर रहे हैं। स्कूलों की इस तरह की हरकतें धीरे-धीरे बच्चों के माता-पिता के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही है।
अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई के बढ़ते चलन ने अभिभावकों को परेशानी में डाल दिया है। स्कूलों के प्रबंधक अभिभावकों की जेब ढीली करने को लेकर विभिन्न प्रकार के हथकंडे अपना रहे हैं, जिससे अभिभावकों के लिए बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना मुश्किल हो रहा है। अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों ने स्कूल की छपी कॅापियों के मनमाने रेट तय कर दिए हैं, जो बाजार रेट से कहीं अधिक हैं।
नर्सरी, एलकेजी व यूकेजी की कापियों के रेट 30 रुपए रखे गए हैं। वहीं, कक्षा एक से कक्षा पांच की कॉपियों में पेज कम कर दिए गए हैं। लेकिन, रेट नहीं घटाए गए। विद्यालयों ने स्कूल की मुहर लगी कॉपियों को खरीदने के लिए अभिभावकों को बाध्य करना शुरू कर दिया है। इसके अलावा हर साल प्रकाशक बदलकर नई किताबें खरीदने का बोझ प्रबंधक पहले ही बढ़ा चुके हैं। अफसरों को इस ओर ध्यान देने की फुर्सत नहीं हैं, जिसका खामियाजा अभिभावकों को अतिरिक्त धन व्यय कर भुगतना पड़ रहा है।
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अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई के बढ़ते चलन ने अभिभावकों को परेशानी में डाल दिया है। स्कूलों के प्रबंधक अभिभावकों की जेब ढीली करने को लेकर विभिन्न प्रकार के हथकंडे अपना रहे हैं, जिससे अभिभावकों के लिए बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना मुश्किल हो रहा है। अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों ने स्कूल की छपी कॅापियों के मनमाने रेट तय कर दिए हैं, जो बाजार रेट से कहीं अधिक हैं।
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नर्सरी, एलकेजी व यूकेजी की कापियों के रेट 30 रुपए रखे गए हैं। वहीं, कक्षा एक से कक्षा पांच की कॉपियों में पेज कम कर दिए गए हैं। लेकिन, रेट नहीं घटाए गए। विद्यालयों ने स्कूल की मुहर लगी कॉपियों को खरीदने के लिए अभिभावकों को बाध्य करना शुरू कर दिया है। इसके अलावा हर साल प्रकाशक बदलकर नई किताबें खरीदने का बोझ प्रबंधक पहले ही बढ़ा चुके हैं। अफसरों को इस ओर ध्यान देने की फुर्सत नहीं हैं, जिसका खामियाजा अभिभावकों को अतिरिक्त धन व्यय कर भुगतना पड़ रहा है।
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