{"_id":"aed35570885421dc988e705fc6d50838","slug":"city-going-to-pollute-day-by-day-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"जहरीली हो रही शहर की आबोहवा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जहरीली हो रही शहर की आबोहवा
ब्यूराे/अमर उजाला
Updated Wed, 20 May 2015 12:13 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ललितपुर। छोटे- बड़े वाहन और जनरेटर से निकलने वाला धुआं शहर की आबोहवा को जहरीला बना रहा है। हरियाली की कमी और बेतहाशा बढ़ते वाहनों का प्रदूषण खतरनाक रोग फैला रहा है। चिंताजनक बात यह है कि नगर में प्रदूषण के नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं है।
यातायात पुलिस की कार्रवाई भी चालान तक सिमट कर रह गई है। जिले में पिछले पांच वर्षों में वाहनों की संख्या में दोगुना से अधिक वृद्धि हुई है। लेकिन वाहनों और जनरेटरों से निकलने वाले प्रदूषित धुएं की जांच के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। हालांकि, माह नवंबर 2015 के दौरान यातायात पुलिस ने लगभग दो सैकड़ा छोटे- बड़े वाहनों में प्रदूषण पाए जाने पर शमन शुल्क वसूला था। लेकिन, चालान वसूलने के बाद ऐसे वाहनों को प्रदूषण फैलाने के लिए छोड़ दिया गया। इसके परिणामस्वरूप जिला अस्पताल में प्रदूषण से प्रभावित मरीजों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती जा रही है।
चर्म रोग विशेषज्ञ डा. मुकेश सेठ की मानें तो त्वचा से संबंधित अधिकांश बीमारियों के पीछे प्रदूषण ही मुख्य कारण है। यही नहीं, वरिष्ठ फिजीशियन डा. अमित चतुर्वेदी का कहना है कि सांस लेने में तकलीफ, फेफड़ों की खराबी एवं पेट की बीमारियाें के पीछे प्रदूषण बड़ा कारण है। जिला अस्पताल की ओपीडी में रोजाना एक दर्जन से अधिक मरीज ऐसी ही बीमारियों से ग्रसित आते हैं। इसके बाद भी प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। शहर से ग्रामीण इलाकाें में दौड़ने वाली अधिकांश बसों, सवारी आपे और टैक्सियों में डीजल और पेट्रोल के बजाय केरोसीन का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है और जिम्मेदार विभाग प्रदूषण का चालान वसूल करके कार्रवाई की लकीर पीट रहे हैं, जिसका खामियाजा भोली- भाली जनता को उठाना पड़ रहा है।
विज्ञापन
धुएं का मानक जांचने में रस्म अदायगी
धुएं से सल्फर डाई आक्साइड, नाइट्रोजन, आक्सीजन व ओजोन आदि गैस निकलती है। इसकी निर्धारित से अधिक मात्रा मनुष्य के साथ ही पशु पक्षियों के लिए भी खतरनाक है। धुएं से निकलने वाली वाली गैस का मानक जांचने के नाम पर महज रस्म अदायगी हो रही है। यातायात पुलिस तो उपकरण लिए बगैर ही वाहनों का प्रदूषण में चालान कर देती है।
प्रदूषण का प्रकार बीमारियां
बड़े सूक्ष्म कण ---- सांस लेने में तकलीफ
बारीक सूक्ष्म कण ---- फेफड़े में खराबी
सल्फर डाईआक्साइड ------ आंखों में जलन व रोशनी कम
नाईट्रोजन आक्साइड ----- दमा, पेट की बीमारियां, चिड़चिड़ापन
ऐसे कम हो सकता है वायु प्रदूषण
डीजल व पेट्रोल से चलने वाले वाहनों का कम इस्तेमाल, जनरेटर का कम प्रयोग, सोलर इनर्जी का अधिक से अधिक उपयोग और हरियाली का विस्तार कर प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है।
विज्ञापन
यातायात पुलिस की कार्रवाई भी चालान तक सिमट कर रह गई है। जिले में पिछले पांच वर्षों में वाहनों की संख्या में दोगुना से अधिक वृद्धि हुई है। लेकिन वाहनों और जनरेटरों से निकलने वाले प्रदूषित धुएं की जांच के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। हालांकि, माह नवंबर 2015 के दौरान यातायात पुलिस ने लगभग दो सैकड़ा छोटे- बड़े वाहनों में प्रदूषण पाए जाने पर शमन शुल्क वसूला था। लेकिन, चालान वसूलने के बाद ऐसे वाहनों को प्रदूषण फैलाने के लिए छोड़ दिया गया। इसके परिणामस्वरूप जिला अस्पताल में प्रदूषण से प्रभावित मरीजों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती जा रही है।
विज्ञापन
चर्म रोग विशेषज्ञ डा. मुकेश सेठ की मानें तो त्वचा से संबंधित अधिकांश बीमारियों के पीछे प्रदूषण ही मुख्य कारण है। यही नहीं, वरिष्ठ फिजीशियन डा. अमित चतुर्वेदी का कहना है कि सांस लेने में तकलीफ, फेफड़ों की खराबी एवं पेट की बीमारियाें के पीछे प्रदूषण बड़ा कारण है। जिला अस्पताल की ओपीडी में रोजाना एक दर्जन से अधिक मरीज ऐसी ही बीमारियों से ग्रसित आते हैं। इसके बाद भी प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। शहर से ग्रामीण इलाकाें में दौड़ने वाली अधिकांश बसों, सवारी आपे और टैक्सियों में डीजल और पेट्रोल के बजाय केरोसीन का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है और जिम्मेदार विभाग प्रदूषण का चालान वसूल करके कार्रवाई की लकीर पीट रहे हैं, जिसका खामियाजा भोली- भाली जनता को उठाना पड़ रहा है।
विज्ञापन
धुएं का मानक जांचने में रस्म अदायगी
धुएं से सल्फर डाई आक्साइड, नाइट्रोजन, आक्सीजन व ओजोन आदि गैस निकलती है। इसकी निर्धारित से अधिक मात्रा मनुष्य के साथ ही पशु पक्षियों के लिए भी खतरनाक है। धुएं से निकलने वाली वाली गैस का मानक जांचने के नाम पर महज रस्म अदायगी हो रही है। यातायात पुलिस तो उपकरण लिए बगैर ही वाहनों का प्रदूषण में चालान कर देती है।
प्रदूषण का प्रकार बीमारियां
बड़े सूक्ष्म कण ---- सांस लेने में तकलीफ
बारीक सूक्ष्म कण ---- फेफड़े में खराबी
सल्फर डाईआक्साइड ------ आंखों में जलन व रोशनी कम
नाईट्रोजन आक्साइड ----- दमा, पेट की बीमारियां, चिड़चिड़ापन
ऐसे कम हो सकता है वायु प्रदूषण
डीजल व पेट्रोल से चलने वाले वाहनों का कम इस्तेमाल, जनरेटर का कम प्रयोग, सोलर इनर्जी का अधिक से अधिक उपयोग और हरियाली का विस्तार कर प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है।