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अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा चंदन वन
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एक साल पहले इस तरह चंदन वन में घूम रहे थे हिरन-फोटो फाइल
- फोटो : LALITPUR
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पुलवारा (ललितपुर)। पर्यटन विभाग की उदासीनता के कारण चंदन वन गुमनामी का शिकार हो गया है। जनपद को प्राकृतिक सुंदरता के क्षेत्र में पहचान दिलाने में चंदन वन का विशेष महत्व रहा है, लेकिन चंदन वन अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है।
जिले के कस्बा बार स्थित चंदन वन पांच हेक्टेयर की जमीन पर फैला है। यह एकमात्र ऐसा वन है, जिसमें चंदन के पेड़ हैं। 30 वर्ष पहले इस वन में दूरदर्शन के प्रसिद्ध धारावाहिक ‘मुझे चांद चाहिए’ की शूटिंग हो चुकी है।
एक समय ऐसा था जब यहां बड़ी तादाद में दूरदराज से सैलानी आते थे। वन में हजारों चंदन के पेड़ों के अलावा कई अन्य प्रजातियों के पेड़ मौजूद थे। वर्तमान में विभाग की उदासीनता ने चंदन के बेशकीमती पेड़ों को अराजकतत्वों ने ठिकाने लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। साथ ही चंदन के अलावा शीशम, अर्जुन की छाल जो दवाओं के निर्माण में विशेष काम आते हैं, उनका भी दोहन किया गया। पर्यटन स्थलों की पैरवी करने एवं ‘टूरिज्म माय पैशन’ के बलबूते अपनी पहचान बनाने वाले लोगों ने पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कराने में बढ़ चढ़ कर पैरवी की, लेकिन ‘चंदन वन’ को उजड़ते देख भी इस ओर ध्यान नहीं दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर चंदन वन को फिर से सही तरीके से रखरखाव कर पुन: पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए तो यहां पर्यटकों की आवाजाही शुरू हो जाएगी। इससे यहां के स्थानीय निवासियों को रोजगार भी मिल जाएगा।
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वन में कई प्रजातियों के रहते थे जानवर
चंदन वन में बड़ी संख्या में हिरन, बारहसिंघा, मोर, चीतल, बंदर, नीलगाय आदि कई प्रजातियों के जानवर मौजूद थे। आज उनकी संख्या कागजों में भले ही कुछ और हो, लेकिन हकीकत में उनकी संख्या दहाई का अंक भी पार नहीं कर पा रही है। जानकारी के मुताबिक इन दिनों हिरन बारह सिंघा, मोर आदि जानवर भी खत्म होने की स्थिति में पहुंच गए।
नहीं है पर्यटन के जानकारों का ध्यान
जनपद के विभिन्न पर्यटन स्थल दशावतार मंदिर, देवगढ़ मंदिर, रणछोरधाम मंदिर आदि को पर्यटन स्थल बनाए जाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है, लेकिन चंदन वन की उपेक्षा की जा रही है। ऐसे में जिले में पर्यटन के समझ रखने वालों की सोच, लोगों की समझ से परे है।
बुंदेलखंड की शिमला के नाम से प्रसिद्ध था चंदन वन
वन विभाग ने यहां पर वर्ष 1966 में वन विश्रामगृह का निर्माण करीब 200 मीटर की ऊंची पहाड़ी पर कराया था। यहां तक पहुंचने के लिए टेढ़ी-मेढ़ी घुमावदार सड़क का निर्माण भी हुआ था। वन विश्राम गृह में दो शयनकक्ष, रसोई गृह, बैठक, बरामदा एवं डायनिंग हॉल का निर्माण हुआ था। उस समय विश्राम गृह की फुलवारी, घास की सुंदरता को देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे। जब घूमने वाले लोग बाहर से मेहमानों को लेकर चंदन वन के रेस्ट हाउस पर पहुंचते थे तो रेस्ट हाउस से एक तरफ तालाब और दूसरी तरफ घना जंगल देखकर लोग चंदन वन को बुंदेलखंड का शिमला की संज्ञा देते थे। जंगल की निगहबानी के लिए कर्मचारी तैनात थे।
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जिले के कस्बा बार स्थित चंदन वन पांच हेक्टेयर की जमीन पर फैला है। यह एकमात्र ऐसा वन है, जिसमें चंदन के पेड़ हैं। 30 वर्ष पहले इस वन में दूरदर्शन के प्रसिद्ध धारावाहिक ‘मुझे चांद चाहिए’ की शूटिंग हो चुकी है।
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एक समय ऐसा था जब यहां बड़ी तादाद में दूरदराज से सैलानी आते थे। वन में हजारों चंदन के पेड़ों के अलावा कई अन्य प्रजातियों के पेड़ मौजूद थे। वर्तमान में विभाग की उदासीनता ने चंदन के बेशकीमती पेड़ों को अराजकतत्वों ने ठिकाने लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। साथ ही चंदन के अलावा शीशम, अर्जुन की छाल जो दवाओं के निर्माण में विशेष काम आते हैं, उनका भी दोहन किया गया। पर्यटन स्थलों की पैरवी करने एवं ‘टूरिज्म माय पैशन’ के बलबूते अपनी पहचान बनाने वाले लोगों ने पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कराने में बढ़ चढ़ कर पैरवी की, लेकिन ‘चंदन वन’ को उजड़ते देख भी इस ओर ध्यान नहीं दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर चंदन वन को फिर से सही तरीके से रखरखाव कर पुन: पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए तो यहां पर्यटकों की आवाजाही शुरू हो जाएगी। इससे यहां के स्थानीय निवासियों को रोजगार भी मिल जाएगा।
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वन में कई प्रजातियों के रहते थे जानवर
चंदन वन में बड़ी संख्या में हिरन, बारहसिंघा, मोर, चीतल, बंदर, नीलगाय आदि कई प्रजातियों के जानवर मौजूद थे। आज उनकी संख्या कागजों में भले ही कुछ और हो, लेकिन हकीकत में उनकी संख्या दहाई का अंक भी पार नहीं कर पा रही है। जानकारी के मुताबिक इन दिनों हिरन बारह सिंघा, मोर आदि जानवर भी खत्म होने की स्थिति में पहुंच गए।
नहीं है पर्यटन के जानकारों का ध्यान
जनपद के विभिन्न पर्यटन स्थल दशावतार मंदिर, देवगढ़ मंदिर, रणछोरधाम मंदिर आदि को पर्यटन स्थल बनाए जाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है, लेकिन चंदन वन की उपेक्षा की जा रही है। ऐसे में जिले में पर्यटन के समझ रखने वालों की सोच, लोगों की समझ से परे है।
बुंदेलखंड की शिमला के नाम से प्रसिद्ध था चंदन वन
वन विभाग ने यहां पर वर्ष 1966 में वन विश्रामगृह का निर्माण करीब 200 मीटर की ऊंची पहाड़ी पर कराया था। यहां तक पहुंचने के लिए टेढ़ी-मेढ़ी घुमावदार सड़क का निर्माण भी हुआ था। वन विश्राम गृह में दो शयनकक्ष, रसोई गृह, बैठक, बरामदा एवं डायनिंग हॉल का निर्माण हुआ था। उस समय विश्राम गृह की फुलवारी, घास की सुंदरता को देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे। जब घूमने वाले लोग बाहर से मेहमानों को लेकर चंदन वन के रेस्ट हाउस पर पहुंचते थे तो रेस्ट हाउस से एक तरफ तालाब और दूसरी तरफ घना जंगल देखकर लोग चंदन वन को बुंदेलखंड का शिमला की संज्ञा देते थे। जंगल की निगहबानी के लिए कर्मचारी तैनात थे।

चंदन वन में पसरा सन्नाटा नहीं दिख रहे जानवर- फोटो : LALITPUR