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Lalitpur News: विदेश तक जाती थीं जखौरा में बनीं पीतल की मूर्तियां, अब कोई पूछने वाला तक नहीं
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जखौरा(ललितपुर)। प्रदेश सरकार उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए निवेशकों को आमंत्रित कर रही है, लेकिन जिले के पुराने उद्योग और पारंपरिक कला दम तोड़ रही है। कभी देश-विदेश में अपनी पहचान बनाने वालीं जखौरा की पीतल की मूर्तिकला संसाधनों और प्रोत्साहन के अभाव में खत्म होती जा रही है। मूर्तिकला से काम से जुड़े मूर्तिकार और कारीगर दूसरा व्यवसाय करने लगे हैं।
जखौरा क्षेत्र के अधिकांश परिवार मूर्तिकला व्यवसाय से जुड़े हुए थे। यहां बनने वाले पीतल के रथ, हाथी, घोड़े और मूर्तियां देश-विदेश तक जाती थीं। लेकिन वर्तमान में यहां गिने चुने कारीगर और स्वर्णकार समाज के लोग ही मूर्तियां बना रहे हैं। लोगों का कहना है कि मूर्ति कला के विलुप्त होने के पीछे प्रमुख कारण सरकार से प्रोत्साहन न मिलना और महंगाई के दौर में मेहनत के सापेक्ष मजदूरी न मिल पाना है। उनका कहना है कि समय बदलने के कारण हर कार्य मशीनों से किया जाने लगा और मशीनों द्वारा बना सामान हाथ के बने सामान की अपेक्षा सस्ता मिल रहा है। इसका प्रभाव भी कारोबार पर पड़ा और हाथ की बनी पीतल की मूर्तियों की मांग भी कम हो गई है।
पूर्वजों के समय से पीतल की मूूर्ति बनाने का काम घर में हो रहा है। बच्चे भी मूर्ति बनाने के काम से जुडे़ हुए हैं। लेकिन पीतल लेने में काफी दिक्कत आती है और मूर्ति निर्माण के लिए पुराना पीतल मिलने में काफी कठिनाई होती है।
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-किशनलाल सोनी।
कई पीढ़ियों से पीतल की मूूर्ति बनाने का काम परिवार में किया जा रहा है। लेकिन संसाधनों की कमी और महंगाई के चलते काम काफी प्रभावित हुआ है। अधिकांश लोगों ने इस काम को छोड़ दिया है। हमारे बच्चे भी मूर्ति बनाने के काम में रुचि नहीं लेते। उन्होंने सोने चांदी का व्यवसाय शुरू कर दिया है।- कमल किशोर सोनी
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जखौरा क्षेत्र के अधिकांश परिवार मूर्तिकला व्यवसाय से जुड़े हुए थे। यहां बनने वाले पीतल के रथ, हाथी, घोड़े और मूर्तियां देश-विदेश तक जाती थीं। लेकिन वर्तमान में यहां गिने चुने कारीगर और स्वर्णकार समाज के लोग ही मूर्तियां बना रहे हैं। लोगों का कहना है कि मूर्ति कला के विलुप्त होने के पीछे प्रमुख कारण सरकार से प्रोत्साहन न मिलना और महंगाई के दौर में मेहनत के सापेक्ष मजदूरी न मिल पाना है। उनका कहना है कि समय बदलने के कारण हर कार्य मशीनों से किया जाने लगा और मशीनों द्वारा बना सामान हाथ के बने सामान की अपेक्षा सस्ता मिल रहा है। इसका प्रभाव भी कारोबार पर पड़ा और हाथ की बनी पीतल की मूर्तियों की मांग भी कम हो गई है।
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पूर्वजों के समय से पीतल की मूूर्ति बनाने का काम घर में हो रहा है। बच्चे भी मूर्ति बनाने के काम से जुडे़ हुए हैं। लेकिन पीतल लेने में काफी दिक्कत आती है और मूर्ति निर्माण के लिए पुराना पीतल मिलने में काफी कठिनाई होती है।
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-किशनलाल सोनी।
कई पीढ़ियों से पीतल की मूूर्ति बनाने का काम परिवार में किया जा रहा है। लेकिन संसाधनों की कमी और महंगाई के चलते काम काफी प्रभावित हुआ है। अधिकांश लोगों ने इस काम को छोड़ दिया है। हमारे बच्चे भी मूर्ति बनाने के काम में रुचि नहीं लेते। उन्होंने सोने चांदी का व्यवसाय शुरू कर दिया है।- कमल किशोर सोनी