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Lalitpur News: रसायन से पके केलों से हो सकती हैं आंत की बीमारियां
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महरौनी-सिलावन। बाजार में बिक रहे रसायन से पके केले आपकी सेहत बिगाड़ सकते हैं। आंखों की रोशनी पर फर्क पड़ने के साथ आंत की बीमारियां जैसी गंभीर समस्या हो सकती है।
ठेलों पर लटक रहे केले के नीचे का हिस्सा पीला फिर हल्का हरा और ऊपर से गहरा हरा दिखाई दे है तो समझ जाएं कि वह रसायन से पकाया गया है। जानकारों का कहना है कि कारोबारी कैल्शियम कार्बाइड के घोल में केले को डुबाकर रख देते हैं जो सात से आठ घंटे में पीला हो जाता है। कैल्शियम कार्बाइड कार्सिनोजेनिक होता है, जो कैंसर का कारक है। ऐसे केलों का सेवन करने से प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। आंत की बीमारियां, डिहाइड्रेशन, डायरिया, पेप्टिक अल्सर जैसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है।
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कार्बाइड से पके केले को ऐसे पहचानें
प्राकृतिक तरीके से पके हुए केले पर हल्के भूरे और काले रंग के धब्बे होते हैं। खाने में ये मीठे होते हैं। इनका छिलका गहरा पीला और दागदार होता है, साथ ही पतला होता है। ऐसे केलों का डंठल काला दिखाई देता है। वहीं, कार्बाइड या रसायन आदि से पके हुए केले एकदम प्लेन और हल्के पीले रंग के होते हैं। इसका छिलका मोटा होता है। ऊपर से डंठल हरा दिखाई देता है।
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रसायन से पके फल खाने से मुंह में छाले हो जाते हैं। फलों का स्वाभाविक स्वाद भी खत्म हो जाता है। चिकित्सालय में प्रतिदिन 30 से 40 मरीज मुंह में छाले, पेप्टिक अल्सर, डिहाइड्रेशन आदि शिकायतें लेकर आ रहे हैं, जो रसायन युक्त फलों के खाने से हो रहा है। -डॉ राजेंद्र भूषण पटेरिया, होम्योपैथिक चिकित्सक, महरौनी।
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ठेलों पर लटक रहे केले के नीचे का हिस्सा पीला फिर हल्का हरा और ऊपर से गहरा हरा दिखाई दे है तो समझ जाएं कि वह रसायन से पकाया गया है। जानकारों का कहना है कि कारोबारी कैल्शियम कार्बाइड के घोल में केले को डुबाकर रख देते हैं जो सात से आठ घंटे में पीला हो जाता है। कैल्शियम कार्बाइड कार्सिनोजेनिक होता है, जो कैंसर का कारक है। ऐसे केलों का सेवन करने से प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। आंत की बीमारियां, डिहाइड्रेशन, डायरिया, पेप्टिक अल्सर जैसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है।
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कार्बाइड से पके केले को ऐसे पहचानें
प्राकृतिक तरीके से पके हुए केले पर हल्के भूरे और काले रंग के धब्बे होते हैं। खाने में ये मीठे होते हैं। इनका छिलका गहरा पीला और दागदार होता है, साथ ही पतला होता है। ऐसे केलों का डंठल काला दिखाई देता है। वहीं, कार्बाइड या रसायन आदि से पके हुए केले एकदम प्लेन और हल्के पीले रंग के होते हैं। इसका छिलका मोटा होता है। ऊपर से डंठल हरा दिखाई देता है।
रसायन से पके फल खाने से मुंह में छाले हो जाते हैं। फलों का स्वाभाविक स्वाद भी खत्म हो जाता है। चिकित्सालय में प्रतिदिन 30 से 40 मरीज मुंह में छाले, पेप्टिक अल्सर, डिहाइड्रेशन आदि शिकायतें लेकर आ रहे हैं, जो रसायन युक्त फलों के खाने से हो रहा है। -डॉ राजेंद्र भूषण पटेरिया, होम्योपैथिक चिकित्सक, महरौनी।