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भक्त नारद ने दिया भगवान विष्णु को श्राप
Updated Tue, 09 Oct 2018 01:37 AM IST
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भक्त नारद ने दिया भगवान विष्णु को श्राप
गणेश पूजन से शुरू हुई पहले दिन की रामलीला
रामलीला में हुआ नारद मोह का मंचन,
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। श्रीनृसिंह रामलीला मैदान में आयोजित रामलीला का मंचन गत दिवस सात अक्टूबर से शुरू किया, जिसमें पहले दिन की लीला गणेश पूजन व कोरस गीतों के साथ शुरू की गई। रामलीला में नारद मोह का भव्य व शानदार मंचन कलाकारों द्वारा किया गया। मंचन में देवर्षि नारद ने अपना उपहास उड़ाए जाने के कारण वहां अपने आराध्य भगवान विष्णु को ही श्राप दे दिया।
श्रीनृसिंह रामलीला समिति द्वारा संचालित 51 वां रामलीला का शुभारंभ मुख्य अतिथि जिलाधिकारी मानवेेंद्र सिंह और पुलिस अधीक्षक डा. ओपी सिंह द्वारा फीता काटकर पूजन किया गया। रामलीला के प्रथम दिन में दिवस देवऋषि नारद मोह की लीला का मंचन किया गया। रामलीला में सबसे पहले श्रीगणेश पूज-आरती एवं कोरस गीतों के उपरांत लीला का मंचन किया गया। रामलीला के प्रथम दृश्य में देवऋषि नारद को यह गुरूर हो गया कि उन्होंने कामदेव को जीत लिया है। उनके इसी गुरुर को तोड़ने के लिये भगवान विष्णु ने अपनी माया के द्वारा एक सुंदर नगरी की रचना की, जिसमें शीलनिधि नामक राजा की रुपवती कन्या विश्वमोहिनी का स्वयंवर आयोजित हो रहा था। भगवान की माया से वशीभूत नारद उसी माया नगरी में जा पंहुचे और विश्वमोहिनी का दिव्य रुप देख कर मोहित हो गये। नारद ने विचार किया कि कोई ऐसा यत्न किया जाये कि जिससे वह रुपवती कन्या उनका ही वरण करे। माया के बंधन में बंध कर नारद की बुद्घि भ्रष्ट हो चुकी थी। उन्होंने प्रभु का स्मरण कर उन्हें बुलाया और अपने को रुपवान बनाने की याचना की, जिससे कन्या इनके रुप को देखकर मोहित हो जाये। भगवान विष्णु ने हंसते हुए कहा कि नारद आप स्वयंवर में जाएं और कहा कि वह भी वहां पहुंचकर वही करेंगे, जो नारद के हित में होगा। मंचन में कलाकारों ने भगवान की माया के द्वारा रचे गये स्वयंवर में नारद का उपहास व नारद क्रोध का बहीुत ही सजीव व भावपूर्ण मंचन किया। यहां जब श्रीहरि राजा के वेश में स्वयंवर में वहां पंहुचे, तो सुंदरी ने उन्हें वरमाला पहनाई व उनके साथ चली गई। यह देख देवर्षि नारद के ह्रदय में क्रोधाग्नि धधकने लगी और उन्होंने भगवान लक्ष्मीनारायण को श्राप दिया कि जैसे वह सुंदरी के वियोग में भटक रहे हैं, वैसे ही भगवान विष्णु तुम भी पत्नी वियोग में भटकोगे और भगवान ने जो बानर रुप उन्हें दिया था, बानरों से विष्णु को भी सहायता लेनी पड़ेगी। भगवान श्रीविष्णु ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए अपने द्वारा रची हुई लीला को समाप्त कर दिया और सारी हकीकत बताई। तब सारी सच्चाई जानकर नारद भगवान के चरणों में गिर पड़े व बार-बार क्षमा याचना की। कार्यक्रम की अध्यक्षता सदर विधायक राम रतन कुशवाहा ने की। कार्यक्रम में समिति अध्यक्ष नरेंद्र कड़ंकी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह यादव, महामंत्री प्रभाकर शर्मा एड., कोषाध्यक्ष अखिलेश पाठक, उपजिलाधिकारी घनश्याम वर्मा, क्षेत्राधिकारी सदर हिमांशु गौरव, श्रीनृसिंह मंदिर के महंत गंगादास, संरक्षक भगवत अग्रवाल, पवन जायसवाल, अजय तोमर, नारायन सिंह यादव, कांशीराम बाबा, संजय ड्योड़िया, प्रियदर्शी चौबे, प्रदीप शर्मा, पन्नालाल साहू, चंद्रशेखर राठौर, संतोष साहू, कन्हैया नामदेव, पुष्पेंद्र सिंह आदि उपस्थित रहे। नारद मोह का अभिनय जगदीश सुड़ेले ने किया। निर्देशन जगदीश पाठक व कल्लू तिवारी व मंच का संचालन रामगोपाल नामदेव ने किया।
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गणेश पूजन से शुरू हुई पहले दिन की रामलीला
रामलीला में हुआ नारद मोह का मंचन,
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। श्रीनृसिंह रामलीला मैदान में आयोजित रामलीला का मंचन गत दिवस सात अक्टूबर से शुरू किया, जिसमें पहले दिन की लीला गणेश पूजन व कोरस गीतों के साथ शुरू की गई। रामलीला में नारद मोह का भव्य व शानदार मंचन कलाकारों द्वारा किया गया। मंचन में देवर्षि नारद ने अपना उपहास उड़ाए जाने के कारण वहां अपने आराध्य भगवान विष्णु को ही श्राप दे दिया।
श्रीनृसिंह रामलीला समिति द्वारा संचालित 51 वां रामलीला का शुभारंभ मुख्य अतिथि जिलाधिकारी मानवेेंद्र सिंह और पुलिस अधीक्षक डा. ओपी सिंह द्वारा फीता काटकर पूजन किया गया। रामलीला के प्रथम दिन में दिवस देवऋषि नारद मोह की लीला का मंचन किया गया। रामलीला में सबसे पहले श्रीगणेश पूज-आरती एवं कोरस गीतों के उपरांत लीला का मंचन किया गया। रामलीला के प्रथम दृश्य में देवऋषि नारद को यह गुरूर हो गया कि उन्होंने कामदेव को जीत लिया है। उनके इसी गुरुर को तोड़ने के लिये भगवान विष्णु ने अपनी माया के द्वारा एक सुंदर नगरी की रचना की, जिसमें शीलनिधि नामक राजा की रुपवती कन्या विश्वमोहिनी का स्वयंवर आयोजित हो रहा था। भगवान की माया से वशीभूत नारद उसी माया नगरी में जा पंहुचे और विश्वमोहिनी का दिव्य रुप देख कर मोहित हो गये। नारद ने विचार किया कि कोई ऐसा यत्न किया जाये कि जिससे वह रुपवती कन्या उनका ही वरण करे। माया के बंधन में बंध कर नारद की बुद्घि भ्रष्ट हो चुकी थी। उन्होंने प्रभु का स्मरण कर उन्हें बुलाया और अपने को रुपवान बनाने की याचना की, जिससे कन्या इनके रुप को देखकर मोहित हो जाये। भगवान विष्णु ने हंसते हुए कहा कि नारद आप स्वयंवर में जाएं और कहा कि वह भी वहां पहुंचकर वही करेंगे, जो नारद के हित में होगा। मंचन में कलाकारों ने भगवान की माया के द्वारा रचे गये स्वयंवर में नारद का उपहास व नारद क्रोध का बहीुत ही सजीव व भावपूर्ण मंचन किया। यहां जब श्रीहरि राजा के वेश में स्वयंवर में वहां पंहुचे, तो सुंदरी ने उन्हें वरमाला पहनाई व उनके साथ चली गई। यह देख देवर्षि नारद के ह्रदय में क्रोधाग्नि धधकने लगी और उन्होंने भगवान लक्ष्मीनारायण को श्राप दिया कि जैसे वह सुंदरी के वियोग में भटक रहे हैं, वैसे ही भगवान विष्णु तुम भी पत्नी वियोग में भटकोगे और भगवान ने जो बानर रुप उन्हें दिया था, बानरों से विष्णु को भी सहायता लेनी पड़ेगी। भगवान श्रीविष्णु ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए अपने द्वारा रची हुई लीला को समाप्त कर दिया और सारी हकीकत बताई। तब सारी सच्चाई जानकर नारद भगवान के चरणों में गिर पड़े व बार-बार क्षमा याचना की। कार्यक्रम की अध्यक्षता सदर विधायक राम रतन कुशवाहा ने की। कार्यक्रम में समिति अध्यक्ष नरेंद्र कड़ंकी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह यादव, महामंत्री प्रभाकर शर्मा एड., कोषाध्यक्ष अखिलेश पाठक, उपजिलाधिकारी घनश्याम वर्मा, क्षेत्राधिकारी सदर हिमांशु गौरव, श्रीनृसिंह मंदिर के महंत गंगादास, संरक्षक भगवत अग्रवाल, पवन जायसवाल, अजय तोमर, नारायन सिंह यादव, कांशीराम बाबा, संजय ड्योड़िया, प्रियदर्शी चौबे, प्रदीप शर्मा, पन्नालाल साहू, चंद्रशेखर राठौर, संतोष साहू, कन्हैया नामदेव, पुष्पेंद्र सिंह आदि उपस्थित रहे। नारद मोह का अभिनय जगदीश सुड़ेले ने किया। निर्देशन जगदीश पाठक व कल्लू तिवारी व मंच का संचालन रामगोपाल नामदेव ने किया।
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