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46 नसबंदी हुई फेल लेकिन नहीं दिया किसी को मुआवजा
Updated Mon, 19 Mar 2018 12:20 AM IST
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46 नसबंदी फेल, किसी को नहीं दिया मुआवजा
ललितपुर। परिवार नियोजन के मामले में प्रदेश के अंदर जिले को प्रथम स्थान मिलने पर भले ही स्वास्थ्य विभाग अपनी पीठ थपथपा रहा हो, लेकिन सच यह भी है कि नसबंदी फेल होने पर विभाग अभी तक एक भी पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा नहीं दे सका है। 2010 में शासन की तरफ से नसबंदी फेल होने पर मुआवजा देने का प्रावधान किया गया था, तब से अब तक 46 नसबंदी आपरेशन असफल हो चुके हैं।
बढ़ती जनसंख्या के कारण बुनियादी संसाधन सीमित होते जा रहे हैं, जिससे तमाम समस्याएं पैदा हो रही हैं। इन हालातों से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा परिवार नियोजन कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके तहत 2010 में शासन ने नसबंदी असफल होने पर मुआवजे का प्रावधान किया। ललितपुर जिला लगातार तीन सालों से (2015, 2016, 2017) परिवार नियोजन कार्यक्रम में प्रदेश में नंबर एक बना हुआ है। इस बीच 46 नसबंदी असफल होने के मामले भी आए हैं। प्रावधान के अनुसार इसमें पीड़ित को 30 हजार रुपये का मुआवजा दिया जाता है, लेकिन एक भी पीड़ित व्यक्ति मुआवजा नहीं पा सका है।
अनुबंधित कंपनी से छूटा साथ
2010 में विभाग ने नसबंदी फेल होने पर पीड़ित को मुआवजा देने के लिए आईसीआईसी कंपनी से अनुबंध किया था। कंपनी का संतोषजनक न पाए जाने पर 2015 में शासन ने मुआवजा की देने की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली। लेकिन, उस दौरान लगभग 12 आवेदकों के आवेदनों पर विचार शासन ने विचार नहीं किया। 2015 के बाद 34 नये मामले भी आए, जिनमें किसी को मुआवजा नहीं दिया गया है। कइयों पर इसलिए विचार नहीं किया जा सका, क्योंकि उनके आवेदन तय समय सीमा के बाद विभाग को प्राप्त हुए। नियमानुसार नसबंदी फेल होने पर नब्बे दिन के अंदर आवेदन करना होता है, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। हालांकि 2017-18 सत्र के दो आवेदन ऐसे हैं जो पात्र हैं उन्हें भी अब तक मुआवजा नहीं मिला है।
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कैसे होती नसबंदी असफल
महिला नसबंदी हो या पुरुष नसबंदी। दोनों में ही आपरेशन के दौरान जिस नस को काटा जाता है, उसके दोनों सिरों को धागा से अलग-अलग करके बांध दिया जाता है। आपरेशन के उपरांत यदि धागा ढीला पड़ जाए या उसकी गांठ खुल जाए तो ऐसी स्थिति में नसबंदी फेल हो जाती है। इसके अलावा यदि कटी नसों के सिरे आपस में संपर्क में आए तो वह स्वत: जुड़ जाते हैं ऐसे में नसबंदी फेल हो जाती है।
ऐसे मिलता है क्लेम
नसबंदी का आपरेशन होने के उपरांत यदि महिला के पेट में गर्भ धारण हो जाए तो उसे 90 दिन के अंदर क्लेम करना होगा। लेकिन, इससे पहले उसे अल्ट्रासाउंड करना होगा। यदि आवेदक ने अल्ट्रासाउंड नहीं कराया है तो ऐसी स्थिति में विभाग अल्ट्रासाउंड कराएगा। यदि नब्बे दिन के पश्चात आवेदन किया गया तो विभाग उसके आवेदन पर विचार नहीं करेगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस अस्पताल में उसने नसबंदी कराई है वहीं उसे क्लेम का आवेदन करना होगा। साक्ष्य के तौर पर अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट जमा करनी होगी।
मुआवजा नहीं देने के कई कारण रहे
फेल नसबंदी का क्लेम नहीं दिए जाने के कई कारण रहे हैं। इनमें एक तो शासन ने जिस कंपनी से अनुबंध किया था, उसका साथ बीच में छूट गया वहीं, कइयों ने 90 दिन के बाद आवेदन किया है। जिससे ऐसे आवेदकों को मुआवजा की राशि नहीं दी जा सकी है। दो व्यक्तियों की पात्रता सही पाई गई है, लेकिन उसकी राशि अभी शासन से प्राप्त नहीं हुई है।
- डॉ अजय भाले, अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी
पात्रों को ही मिलेगा मुआवजा
विभाग ने जिन आवेदकों की पात्रता को स्वीकार कर लिया गया है, उन्हें मुुआवजा जरूर दिया जाएगा। सभी पात्र आवेदन शासन को भेजे गए हैं।
डा. प्रताप सिंह, सीएमओ
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ललितपुर। परिवार नियोजन के मामले में प्रदेश के अंदर जिले को प्रथम स्थान मिलने पर भले ही स्वास्थ्य विभाग अपनी पीठ थपथपा रहा हो, लेकिन सच यह भी है कि नसबंदी फेल होने पर विभाग अभी तक एक भी पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा नहीं दे सका है। 2010 में शासन की तरफ से नसबंदी फेल होने पर मुआवजा देने का प्रावधान किया गया था, तब से अब तक 46 नसबंदी आपरेशन असफल हो चुके हैं।
बढ़ती जनसंख्या के कारण बुनियादी संसाधन सीमित होते जा रहे हैं, जिससे तमाम समस्याएं पैदा हो रही हैं। इन हालातों से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा परिवार नियोजन कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके तहत 2010 में शासन ने नसबंदी असफल होने पर मुआवजे का प्रावधान किया। ललितपुर जिला लगातार तीन सालों से (2015, 2016, 2017) परिवार नियोजन कार्यक्रम में प्रदेश में नंबर एक बना हुआ है। इस बीच 46 नसबंदी असफल होने के मामले भी आए हैं। प्रावधान के अनुसार इसमें पीड़ित को 30 हजार रुपये का मुआवजा दिया जाता है, लेकिन एक भी पीड़ित व्यक्ति मुआवजा नहीं पा सका है।
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अनुबंधित कंपनी से छूटा साथ
2010 में विभाग ने नसबंदी फेल होने पर पीड़ित को मुआवजा देने के लिए आईसीआईसी कंपनी से अनुबंध किया था। कंपनी का संतोषजनक न पाए जाने पर 2015 में शासन ने मुआवजा की देने की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली। लेकिन, उस दौरान लगभग 12 आवेदकों के आवेदनों पर विचार शासन ने विचार नहीं किया। 2015 के बाद 34 नये मामले भी आए, जिनमें किसी को मुआवजा नहीं दिया गया है। कइयों पर इसलिए विचार नहीं किया जा सका, क्योंकि उनके आवेदन तय समय सीमा के बाद विभाग को प्राप्त हुए। नियमानुसार नसबंदी फेल होने पर नब्बे दिन के अंदर आवेदन करना होता है, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। हालांकि 2017-18 सत्र के दो आवेदन ऐसे हैं जो पात्र हैं उन्हें भी अब तक मुआवजा नहीं मिला है।
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कैसे होती नसबंदी असफल
महिला नसबंदी हो या पुरुष नसबंदी। दोनों में ही आपरेशन के दौरान जिस नस को काटा जाता है, उसके दोनों सिरों को धागा से अलग-अलग करके बांध दिया जाता है। आपरेशन के उपरांत यदि धागा ढीला पड़ जाए या उसकी गांठ खुल जाए तो ऐसी स्थिति में नसबंदी फेल हो जाती है। इसके अलावा यदि कटी नसों के सिरे आपस में संपर्क में आए तो वह स्वत: जुड़ जाते हैं ऐसे में नसबंदी फेल हो जाती है।
ऐसे मिलता है क्लेम
नसबंदी का आपरेशन होने के उपरांत यदि महिला के पेट में गर्भ धारण हो जाए तो उसे 90 दिन के अंदर क्लेम करना होगा। लेकिन, इससे पहले उसे अल्ट्रासाउंड करना होगा। यदि आवेदक ने अल्ट्रासाउंड नहीं कराया है तो ऐसी स्थिति में विभाग अल्ट्रासाउंड कराएगा। यदि नब्बे दिन के पश्चात आवेदन किया गया तो विभाग उसके आवेदन पर विचार नहीं करेगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस अस्पताल में उसने नसबंदी कराई है वहीं उसे क्लेम का आवेदन करना होगा। साक्ष्य के तौर पर अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट जमा करनी होगी।
मुआवजा नहीं देने के कई कारण रहे
फेल नसबंदी का क्लेम नहीं दिए जाने के कई कारण रहे हैं। इनमें एक तो शासन ने जिस कंपनी से अनुबंध किया था, उसका साथ बीच में छूट गया वहीं, कइयों ने 90 दिन के बाद आवेदन किया है। जिससे ऐसे आवेदकों को मुआवजा की राशि नहीं दी जा सकी है। दो व्यक्तियों की पात्रता सही पाई गई है, लेकिन उसकी राशि अभी शासन से प्राप्त नहीं हुई है।
- डॉ अजय भाले, अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी
पात्रों को ही मिलेगा मुआवजा
विभाग ने जिन आवेदकों की पात्रता को स्वीकार कर लिया गया है, उन्हें मुुआवजा जरूर दिया जाएगा। सभी पात्र आवेदन शासन को भेजे गए हैं।
डा. प्रताप सिंह, सीएमओ