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जिले में पर्यटन की संभावनाएं अपार, सुविधाओं की दरकार
Updated Wed, 27 Sep 2017 02:23 AM IST
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पर्यटन: संभावनाएं अपार, सुविधाओं की दरकार
ललितपुर। विंध्याचल पर्वत शृंखला से घिरे बुंदेलखंड के ललितपुर जिले में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। यहां पुरातात्विक संपदा, वास्तु शिल्प, मूर्तिकला और प्राकृतिक रमणीक स्थलों का संगम देखने को मिलता है। यदि पर्यटन स्थलों को यातायात मार्ग से जोड़ते हुए सैलानियों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया करा दी जाएं तो यह राजस्व प्राप्ति का बड़ा स्रोत बन सकता है। यही नहीं, स्थानीय व्यक्तियों के लिए रोजगार के दरवाजे भी खुल जाएंगे।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1980 में विश्व पर्यटन दिवस घोषित किया, जिसे प्रत्येक वर्ष 27 सितंबर को मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक मूल्यों, पर्यटन विकास के बारे में लोगों को जागरूक किया जाए, जिससे कि पर्यटन महत्व को समझते हुए लोग प्रकृति व संस्कृति का सम्मान करें। बुंदेलखंड में पर्यटन का विशेष महत्व है। यहां पुरातात्विक संपदा, दर्शनीय स्थल के साथ सांस्कृतिक विरासत है। पर्यटन से जहां लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं, वहीं, राजस्व भी मिलता है। ललितपुर जिले में प्राचीन अवशेषों, भित्ति चित्रों, प्राचीन स्मारकों, पुरास्थलों, विश्व प्रसिद्ध मंदिरों की कमी नहीं है। यहां तालबेहट, बानपुर व बालाबेहट में किला, बार में चंदन वन, दूधई, चांदपुर-जहाजपुर, पाली में नीलकंठेश्वर, पाण्डुवन, करकरावल, देवगढ़, वंट च्युवन आश्रम, धौजरी में रणछोरधाम, मदनपुर, बालाबेहट, अमझरा घाटी, बंदरगुढ़ा, जलप्रपात, माताटीला, पवागिरी, तीर्थक्षेत्र सिरोंन जी, बाबा सदनशाह जैसे सर्वधर्म समभाव के स्थल हैं। इसके अलावा बिखरी पड़ी पुरातात्विक संपदा, वास्तु शिल्प, मूर्तिकला एवं प्राकृतिक रमणीक स्थल इसे अनोखा बनाते हैं। नागरिकों का कहना है कि यदि इन स्थलों पर यातायात के सुगम साधन, संपर्क मार्ग, बिजली, पेयजल, संचार सेवा एवं गाइडों की व्यवस्था हो जाए तो जनपद पर्यटन मानचित्र पर अपनी अलग पहचान स्थापित कर सकेगा। वर्तमान में तमाम पुरातात्विक विरासतों का अस्तित्व देखरेख के अभाव मेें संकट में है, जिन्हें संवारने की जरूरत है। पुरातत्व विभाग ने जिले के कई स्थलों का जीर्णोद्घार किया है जो नाकाफी दिखाई दे रहा है। आज भी पर्यटन स्थलों तक खस्ताहाल मार्ग की समस्या बनी हुई है।
गुप्तकालीन विरासत दशावतार मंदिर
दशावतार मंदिर-गुप्तकालीन प्रतिमाओं में से देवगढ़ का दशावतार मंदिर है। देवगढ़ के इस मंदिर में प्रतिमा विज्ञान और शिल्प कला के दृष्टिकोण से तीन विशाल फलकों पर भव्य, कलात्मक, सजीव, मौलिक प्रतिमाएं उकेरी र्गइं हैं। मंदिर के एक फलक पर ‘श्रीमद्भागवत पुराण’ में वर्णित गजेंद्र मोक्ष की प्रतिमा का सुंदर दृश्यांकन है। मंदिर के एक फलक पर शेषशायी विष्णु प्रतिमा है, जिसमें विष्णु शेषनाग के सहस्त्र फनों की छाया में विश्राम कर रहेे हैं और लक्ष्मी जी पैर दबा रहीं है तो आसमान में इन्द्र, ब्रह्रा, शिव आदि अनेक देव इस लीला को देख रहे हैं। महाभारत काल की कृष्ण लीला को नंद यशोदा की मूर्ति के रूप में सुंदर अंकन देखते ही बनता है।
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त्रिधर्म आस्था का केंद्र देवगढ
देवगढ- पुरातत्व धरोहरों की शान देवगढ भारतीय संस्कृति और शिल्प का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। ललितपुर से लगभग 33 किमी दूर बेतवा के सुरम्य किनारे के समीप एक ऊंची पहाड़ी पर त्रिधर्म आस्था केन्द्र के रूप में देवगढ़ इतिहास के पन्नों में दर्ज अमिट नाम पर्यटन के लिये सर्वाधिक ख्याति प्राप्त है। देवगढ़ जैन एवं वैष्णव सम्प्रदाय की मूर्ति कला का केन्द्र रहा है। यहां 41 जैन मंदिरों, हजारों की तादाद में जैन प्रतिमों के अतिरिक्त, 18 मानस्तम्भ व सैकड़ो की संख्या में अभिलेख उत्कीर्ण है। देवगढ़ की तीन घाटियों में सिद्धघाटी, राजघाटी एवं नाहरघाटी में गुप्तकालीन कला के दर्शन होते हैं। यहां 7वी सदी का वराह मंदिर एवं कीर्तिगिरि दुर्ग के अवशेष भी दर्शनीय हैं।
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बौद्घ अनुनायियों को आकर्षित कर रही बौद्घगुफा
बौद्धगुफा देवगढ- यह गुफा गुप्तकालीन शिल्पकला को साबित करती है। यहां जैन, वैष्णव, शैव और बौद्ध धर्मो का अस्तित्व एक साथ रहा और सभी ने अपने-अपने स्तर पर यहां विकास किया था। बौद्ध प्रतिमाएं पहाड़ी को काटकर उत्क्रीर्ण की गई हैं।
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भगवान नीलकंठ की दुुर्लभ प्रतिमा
पाली- ललितपुर से पाली लगभग 38 किमी की दूरी पर लगभग 110 फुट ऊंचे पर्वत पर पूर्वाभिमुख 10वी सदी के नीलकंठेश्वर मंदिर है जिसमें नीलकंठेश्वर भगवान शिव की प्राचीन दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है। यहां से नीचे तलहटी की ओर पान के बरेजे बेहद आकर्षक दिखाई पड़ते हैं।
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भगवान नृसिंह की दुर्लभ प्रतिमा
ललितपुर से लगभग 41 किमी दूर पाली बालाबेहट मार्ग पर स्थित दूधई में तालाब के समीप ही ऊंचे टीलों पर मन्दिरों के अवशेष दिखाई पड़ते हैं, जिनमें बड़ी सुंरग मन्दिर, छोटी सुंरग मंदिर, लिंगमहादेव मंदिर आदि हैं साथ ही समीप ही बड़ी बारात, छोटी बारात, हनुमान मंदिर, आदिनाथ एवं शान्तिनाथ जैन मंदिर, अखाड़ा नाम से प्रसिद्ध गोलाकार संरचना में छोटे वर्गाकार मंदिर है। दूधई के समीप ही 50 मीटर ऊंचे पहाड़ पर पर्वतमाला को काटकर नृसिंह भगवान और हिरणकश्यप की दुर्लभ 23 फुट ऊंची विराट प्रतिमा प्रदेश की कुछ चुनिंदा प्रतिमाओं में से एक है।
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सरोवर तट पर है वराह मंदिर
चांदपुर-जहाजपुर ललितपुर से लगभग 32 किमी की दूरी पर ललितपुर देवगढ़ मार्ग पर सैपुरा से 07 किमी की दूरी पर है। यहां भग्न मंदिरों एवं मूर्तियों के अनेक अवशेष प्राप्त हैं। यहां बड़े-बड़े प्रस्तर खण्डों से पंचायतन शैली में बना सहस्त्रलिंगेश्वर हजारिया महादेव मंदिर स्थित है। सहस्त्रलिंग मंदिर से कुछ दूरी पर सरोवर के तट के समीप वराह मंदिर स्थित है। प्राचीन मंदिर समूह के ध्वसावशेषों में लक्ष्मी-नारायण मंदिर 10वी सदी सुरक्षित है। यहां की सुन्दरता में चार चांद लगाते शान्तिनाथ जैन मंदिर परिसर में शान्तिनाथ मंदिर 12वी सदी अवस्थित है। गर्भग्रह में शान्तिनाथ की 05 मीटर ऊंची कायोत्सर्ग मुद्रा वाली भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित है।
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विरासत को सहेजे सिरोंनजी
तीर्थक्षेत्र सिरोंन जी पुरातात्विक धरोहरों की समृद्ध विरासतों को सहेजे हुए है। तीर्थक्षेत्र सिरोंनजी का किसी परिचय का मुंहताज नहीं है। ललितपुर से 22 किमी की दूरी पर अवस्थित इस गांव में 18वी सदी का प्रसिद्ध जैन मंदिर है। यहां पर भगवान शान्तिनाथ की खड़गासन मुद्रा में 18 फीट ऊंची प्रतिमा विराजमान है। यहां पर एक समृद्ध संग्राहलय भी मौजूद है, जिसमें सैकड़ो की तादाद में मूर्तियों को संग्रहित किया गया है। कई प्राचीन दुर्लभ शिलालेख भी द्रष्टव्य हैं। खैडर नदी के समीप नैसर्गिक सौन्दर्य देखने भी मिलता है।
आकर्षित करता कुंडखो जलप्रपात
अमझरा घाटी उप्र व मप्र के बार्डर पर स्थित सुप्रसिद्ध अमझरा घाटी नामक स्थान जिले में आस्था का बड़ा केन्द्र है। यहां पर अति प्राचीन हनुमान जी की विशालकाय प्रतिमा प्रतिष्ठित है व समीप में ही कुन्डखों जल प्रपात है। चारों ओर नैसर्गिक और रमणीक दृश्य सभी को आकर्षित करता है।
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फोटो- 22
पर्यटन केंद्रों हो विकास
जिले की धरोहरों स्थलों, प्राकृतिक स्थलों, संस्कृतिम एवं पर्यटन केन्द्रों को संरक्षित एवं विकसित करने की जरूरत है। जिससे रोजगार के नए अवसर निकलेंगे। जिससे इस पिछड़े क्षेत्र के हर व्यक्ति को रोजगार मिल सकेगा। वर्तमान में दर्शनीय स्थल शासन-प्रशासन की उपेक्षा के शिकार हैं। मैंने अपने स्तर से उपेक्षित स्थलों की ओर प्रशासन का ध्यान खींचने का प्रयास किया है, जिसमें काफी हद तक सफल हुए हैं। अब पर्यटन स्थलों के विकास की चर्चा होने लगी है।
फिरोज इकबाल डायमंड
पर्यटन मित्र, ललितपुर।
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ललितपुर। विंध्याचल पर्वत शृंखला से घिरे बुंदेलखंड के ललितपुर जिले में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। यहां पुरातात्विक संपदा, वास्तु शिल्प, मूर्तिकला और प्राकृतिक रमणीक स्थलों का संगम देखने को मिलता है। यदि पर्यटन स्थलों को यातायात मार्ग से जोड़ते हुए सैलानियों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया करा दी जाएं तो यह राजस्व प्राप्ति का बड़ा स्रोत बन सकता है। यही नहीं, स्थानीय व्यक्तियों के लिए रोजगार के दरवाजे भी खुल जाएंगे।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1980 में विश्व पर्यटन दिवस घोषित किया, जिसे प्रत्येक वर्ष 27 सितंबर को मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक मूल्यों, पर्यटन विकास के बारे में लोगों को जागरूक किया जाए, जिससे कि पर्यटन महत्व को समझते हुए लोग प्रकृति व संस्कृति का सम्मान करें। बुंदेलखंड में पर्यटन का विशेष महत्व है। यहां पुरातात्विक संपदा, दर्शनीय स्थल के साथ सांस्कृतिक विरासत है। पर्यटन से जहां लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं, वहीं, राजस्व भी मिलता है। ललितपुर जिले में प्राचीन अवशेषों, भित्ति चित्रों, प्राचीन स्मारकों, पुरास्थलों, विश्व प्रसिद्ध मंदिरों की कमी नहीं है। यहां तालबेहट, बानपुर व बालाबेहट में किला, बार में चंदन वन, दूधई, चांदपुर-जहाजपुर, पाली में नीलकंठेश्वर, पाण्डुवन, करकरावल, देवगढ़, वंट च्युवन आश्रम, धौजरी में रणछोरधाम, मदनपुर, बालाबेहट, अमझरा घाटी, बंदरगुढ़ा, जलप्रपात, माताटीला, पवागिरी, तीर्थक्षेत्र सिरोंन जी, बाबा सदनशाह जैसे सर्वधर्म समभाव के स्थल हैं। इसके अलावा बिखरी पड़ी पुरातात्विक संपदा, वास्तु शिल्प, मूर्तिकला एवं प्राकृतिक रमणीक स्थल इसे अनोखा बनाते हैं। नागरिकों का कहना है कि यदि इन स्थलों पर यातायात के सुगम साधन, संपर्क मार्ग, बिजली, पेयजल, संचार सेवा एवं गाइडों की व्यवस्था हो जाए तो जनपद पर्यटन मानचित्र पर अपनी अलग पहचान स्थापित कर सकेगा। वर्तमान में तमाम पुरातात्विक विरासतों का अस्तित्व देखरेख के अभाव मेें संकट में है, जिन्हें संवारने की जरूरत है। पुरातत्व विभाग ने जिले के कई स्थलों का जीर्णोद्घार किया है जो नाकाफी दिखाई दे रहा है। आज भी पर्यटन स्थलों तक खस्ताहाल मार्ग की समस्या बनी हुई है।
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गुप्तकालीन विरासत दशावतार मंदिर
दशावतार मंदिर-गुप्तकालीन प्रतिमाओं में से देवगढ़ का दशावतार मंदिर है। देवगढ़ के इस मंदिर में प्रतिमा विज्ञान और शिल्प कला के दृष्टिकोण से तीन विशाल फलकों पर भव्य, कलात्मक, सजीव, मौलिक प्रतिमाएं उकेरी र्गइं हैं। मंदिर के एक फलक पर ‘श्रीमद्भागवत पुराण’ में वर्णित गजेंद्र मोक्ष की प्रतिमा का सुंदर दृश्यांकन है। मंदिर के एक फलक पर शेषशायी विष्णु प्रतिमा है, जिसमें विष्णु शेषनाग के सहस्त्र फनों की छाया में विश्राम कर रहेे हैं और लक्ष्मी जी पैर दबा रहीं है तो आसमान में इन्द्र, ब्रह्रा, शिव आदि अनेक देव इस लीला को देख रहे हैं। महाभारत काल की कृष्ण लीला को नंद यशोदा की मूर्ति के रूप में सुंदर अंकन देखते ही बनता है।
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त्रिधर्म आस्था का केंद्र देवगढ
देवगढ- पुरातत्व धरोहरों की शान देवगढ भारतीय संस्कृति और शिल्प का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। ललितपुर से लगभग 33 किमी दूर बेतवा के सुरम्य किनारे के समीप एक ऊंची पहाड़ी पर त्रिधर्म आस्था केन्द्र के रूप में देवगढ़ इतिहास के पन्नों में दर्ज अमिट नाम पर्यटन के लिये सर्वाधिक ख्याति प्राप्त है। देवगढ़ जैन एवं वैष्णव सम्प्रदाय की मूर्ति कला का केन्द्र रहा है। यहां 41 जैन मंदिरों, हजारों की तादाद में जैन प्रतिमों के अतिरिक्त, 18 मानस्तम्भ व सैकड़ो की संख्या में अभिलेख उत्कीर्ण है। देवगढ़ की तीन घाटियों में सिद्धघाटी, राजघाटी एवं नाहरघाटी में गुप्तकालीन कला के दर्शन होते हैं। यहां 7वी सदी का वराह मंदिर एवं कीर्तिगिरि दुर्ग के अवशेष भी दर्शनीय हैं।
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बौद्घ अनुनायियों को आकर्षित कर रही बौद्घगुफा
बौद्धगुफा देवगढ- यह गुफा गुप्तकालीन शिल्पकला को साबित करती है। यहां जैन, वैष्णव, शैव और बौद्ध धर्मो का अस्तित्व एक साथ रहा और सभी ने अपने-अपने स्तर पर यहां विकास किया था। बौद्ध प्रतिमाएं पहाड़ी को काटकर उत्क्रीर्ण की गई हैं।
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भगवान नीलकंठ की दुुर्लभ प्रतिमा
पाली- ललितपुर से पाली लगभग 38 किमी की दूरी पर लगभग 110 फुट ऊंचे पर्वत पर पूर्वाभिमुख 10वी सदी के नीलकंठेश्वर मंदिर है जिसमें नीलकंठेश्वर भगवान शिव की प्राचीन दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है। यहां से नीचे तलहटी की ओर पान के बरेजे बेहद आकर्षक दिखाई पड़ते हैं।
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भगवान नृसिंह की दुर्लभ प्रतिमा
ललितपुर से लगभग 41 किमी दूर पाली बालाबेहट मार्ग पर स्थित दूधई में तालाब के समीप ही ऊंचे टीलों पर मन्दिरों के अवशेष दिखाई पड़ते हैं, जिनमें बड़ी सुंरग मन्दिर, छोटी सुंरग मंदिर, लिंगमहादेव मंदिर आदि हैं साथ ही समीप ही बड़ी बारात, छोटी बारात, हनुमान मंदिर, आदिनाथ एवं शान्तिनाथ जैन मंदिर, अखाड़ा नाम से प्रसिद्ध गोलाकार संरचना में छोटे वर्गाकार मंदिर है। दूधई के समीप ही 50 मीटर ऊंचे पहाड़ पर पर्वतमाला को काटकर नृसिंह भगवान और हिरणकश्यप की दुर्लभ 23 फुट ऊंची विराट प्रतिमा प्रदेश की कुछ चुनिंदा प्रतिमाओं में से एक है।
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सरोवर तट पर है वराह मंदिर
चांदपुर-जहाजपुर ललितपुर से लगभग 32 किमी की दूरी पर ललितपुर देवगढ़ मार्ग पर सैपुरा से 07 किमी की दूरी पर है। यहां भग्न मंदिरों एवं मूर्तियों के अनेक अवशेष प्राप्त हैं। यहां बड़े-बड़े प्रस्तर खण्डों से पंचायतन शैली में बना सहस्त्रलिंगेश्वर हजारिया महादेव मंदिर स्थित है। सहस्त्रलिंग मंदिर से कुछ दूरी पर सरोवर के तट के समीप वराह मंदिर स्थित है। प्राचीन मंदिर समूह के ध्वसावशेषों में लक्ष्मी-नारायण मंदिर 10वी सदी सुरक्षित है। यहां की सुन्दरता में चार चांद लगाते शान्तिनाथ जैन मंदिर परिसर में शान्तिनाथ मंदिर 12वी सदी अवस्थित है। गर्भग्रह में शान्तिनाथ की 05 मीटर ऊंची कायोत्सर्ग मुद्रा वाली भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित है।
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विरासत को सहेजे सिरोंनजी
तीर्थक्षेत्र सिरोंन जी पुरातात्विक धरोहरों की समृद्ध विरासतों को सहेजे हुए है। तीर्थक्षेत्र सिरोंनजी का किसी परिचय का मुंहताज नहीं है। ललितपुर से 22 किमी की दूरी पर अवस्थित इस गांव में 18वी सदी का प्रसिद्ध जैन मंदिर है। यहां पर भगवान शान्तिनाथ की खड़गासन मुद्रा में 18 फीट ऊंची प्रतिमा विराजमान है। यहां पर एक समृद्ध संग्राहलय भी मौजूद है, जिसमें सैकड़ो की तादाद में मूर्तियों को संग्रहित किया गया है। कई प्राचीन दुर्लभ शिलालेख भी द्रष्टव्य हैं। खैडर नदी के समीप नैसर्गिक सौन्दर्य देखने भी मिलता है।
आकर्षित करता कुंडखो जलप्रपात
अमझरा घाटी उप्र व मप्र के बार्डर पर स्थित सुप्रसिद्ध अमझरा घाटी नामक स्थान जिले में आस्था का बड़ा केन्द्र है। यहां पर अति प्राचीन हनुमान जी की विशालकाय प्रतिमा प्रतिष्ठित है व समीप में ही कुन्डखों जल प्रपात है। चारों ओर नैसर्गिक और रमणीक दृश्य सभी को आकर्षित करता है।
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पर्यटन केंद्रों हो विकास
जिले की धरोहरों स्थलों, प्राकृतिक स्थलों, संस्कृतिम एवं पर्यटन केन्द्रों को संरक्षित एवं विकसित करने की जरूरत है। जिससे रोजगार के नए अवसर निकलेंगे। जिससे इस पिछड़े क्षेत्र के हर व्यक्ति को रोजगार मिल सकेगा। वर्तमान में दर्शनीय स्थल शासन-प्रशासन की उपेक्षा के शिकार हैं। मैंने अपने स्तर से उपेक्षित स्थलों की ओर प्रशासन का ध्यान खींचने का प्रयास किया है, जिसमें काफी हद तक सफल हुए हैं। अब पर्यटन स्थलों के विकास की चर्चा होने लगी है।
फिरोज इकबाल डायमंड
पर्यटन मित्र, ललितपुर।