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मड़ावरा
Updated Mon, 26 Jun 2017 01:55 AM IST
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पक्की छतों ने छीन लिया छप्पर छाने वालों का रोजगार
सैदपुर (ललितपुर)।
ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों के लिए बरसात का मौसम आने से पहले कच्चे घरों में छान छप्पर का कार्य करके उन्हें कुछ दिनों का रोजगार मिल जाता था। लेकिन गांव में तेजी के साथ बनते पक्के आवासों के चलते बुजुर्ग लोगों का रोजगार खत्म होता जा रहा।
कुछ सालों पहले गांव में बड़ी संख्या में कच्चे और खपरैल के घर हुआ करते थे। बारिश के पानी से अपने घरों को बचाने के लिए ग्रामीण छान छप्पर का कार्य प्राथमिकता के साथ करवाते थे। इस कार्य के लिये अनुभवी लोगों को तजव्वों दी जाती थी। इस कार्य को ज्यादातर अनुभवी बुजुर्ग लोग ही किया करते थे। बुजुर्ग मजदूरों के लिए यह कार्य थोड़ा आसान था। अन्य मेहनत के कार्यों की अपेक्षा इस कार्य को करने में ज्यादा परिश्रम भी नहीं करना पड़ता था। इस कार्य को करने के एवज में बुजुर्ग लोगों को एक दिन में 150 से 200 रूपये तक मजदूरी के रूप में मिल जाया करते थे और यह कार्य महीनों चला करता था, जिससे बुजुर्गों मजदूरों के लिये कुछ रकम मिल जाया करती थी, जिससे वह अपनी छोटी मोटी जरूरतों को पूरा कर लेते थे। लेकिन बदलते परिवेश में ग्रामीण क्षेत्रों में भी दिन प्रतिदिन कच्चे घर कम होते जा रहे है, जिससे छान छप्पर का कार्य भी कम होता जा रहा है। एक समय इन मजदूरों के लिए गांव में ही महीनों का रोजगार मिल जाता था। वहीं, आजकल कुछ दिन की मजदूरी मिल पाती है। कुछ समय बाद छान छप्पर का कार्य करने वाले ग्रामीणों का रोजगार ठप होने के कगार पर पहुंचता जा रहा है।
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सैदपुर (ललितपुर)।
ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों के लिए बरसात का मौसम आने से पहले कच्चे घरों में छान छप्पर का कार्य करके उन्हें कुछ दिनों का रोजगार मिल जाता था। लेकिन गांव में तेजी के साथ बनते पक्के आवासों के चलते बुजुर्ग लोगों का रोजगार खत्म होता जा रहा।
कुछ सालों पहले गांव में बड़ी संख्या में कच्चे और खपरैल के घर हुआ करते थे। बारिश के पानी से अपने घरों को बचाने के लिए ग्रामीण छान छप्पर का कार्य प्राथमिकता के साथ करवाते थे। इस कार्य के लिये अनुभवी लोगों को तजव्वों दी जाती थी। इस कार्य को ज्यादातर अनुभवी बुजुर्ग लोग ही किया करते थे। बुजुर्ग मजदूरों के लिए यह कार्य थोड़ा आसान था। अन्य मेहनत के कार्यों की अपेक्षा इस कार्य को करने में ज्यादा परिश्रम भी नहीं करना पड़ता था। इस कार्य को करने के एवज में बुजुर्ग लोगों को एक दिन में 150 से 200 रूपये तक मजदूरी के रूप में मिल जाया करते थे और यह कार्य महीनों चला करता था, जिससे बुजुर्गों मजदूरों के लिये कुछ रकम मिल जाया करती थी, जिससे वह अपनी छोटी मोटी जरूरतों को पूरा कर लेते थे। लेकिन बदलते परिवेश में ग्रामीण क्षेत्रों में भी दिन प्रतिदिन कच्चे घर कम होते जा रहे है, जिससे छान छप्पर का कार्य भी कम होता जा रहा है। एक समय इन मजदूरों के लिए गांव में ही महीनों का रोजगार मिल जाता था। वहीं, आजकल कुछ दिन की मजदूरी मिल पाती है। कुछ समय बाद छान छप्पर का कार्य करने वाले ग्रामीणों का रोजगार ठप होने के कगार पर पहुंचता जा रहा है।
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