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स्वाधीनता आंदोलन में अग्रणी रहे नंदकिशोर किलेदार

Wed, 17 Jan 2018 02:17 AM IST
Updated Wed, 17 Jan 2018 02:17 AM IST
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स्वाधीनता आंदोलन में अग्रणी रहे नंदकिशोर किलेदार
स्वाधीनता आंदोलन में अग्रणी रहे नंदकिशोर
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अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नंदकिशोर किलेदार ने ललितपुर में स्वाधीनता की लौ जगाने में अग्रणी भूमिका निभाई थी। वर्ष 1920 में जब महात्मा गांधी की अगुवाई में असहयोग आंदोलन का सूत्रपात हुआ तब श्री किलेदार ने जिले में अग्रदूत बनकर आंदोलन को आगे बढ़ाया। वर्ष 1942 में अंग्रेजों ने आंदोलन को कमजोर करने के लिए उन्हें नजरबंद कर दिया था।
ब्रिटिश हुकूमत से मुक्ति दिलाने में शहर के किलेदार परिवार की भूमिका अहम रही है। इस परिवार ने एक ही बल्कि तीन स्वतंत्रता सेनानी दिए जो अंग्रेेजों के खिलाफ लड़े। इनमें वर्ष 1875 में जन्मे नंद किशोर किलेदार ने महात्मा गांधी के मिशन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर जिले में इसकी कमान संभाल ली। इस तरह यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया था। यही नहीं, उन्होंने देश में चल रहे आंदोलन की हर गतिविधि की जानकारी जनता तक पहुंचाने के लिए बंबई से प्रकाशित बैंकटेश्वर और पूना से प्रकाशित लोकमान्य तिलक का केसरी समाचार पत्र मंगवा प्रारंभ कर दिया। इससे इस आंदोलन में जनता की भागीदारी बढ़ने लगी। वर्ष 1930 में देशव्यापी आंदोलन होने से अंग्रेज घबरा गए। उन्होंने आंदोलन को कमजोर करने के लिए श्री किलेदार को गिरफ्तार कर लिया। इसमें उन्हें एक साल की सजा सुनाई गई। वर्ष 1932 में छह माह की सजा हुई। यही नहीं, वर्ष 1942 में उन्हें एक साल के लिए नजरबंद कर दिया गया।
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आजाद को पहुंचाई मदद
नंदकिशोर किलेदार ने चंद्रशेखर आजाद, शंभूनाथ व शोकतअली को कई बार सहयोग किया। एक बार चंद्रेशखर आजाद ने अंग्रेजों से बचने के लिए महिला का भेष धारण कर लिया था। इसी रूप में वह बैलगाड़ी से ग्राम सिवनी में किलेदार के घर पहुंचे थे। यहां उनकी मुुलाकात खनियाधाना के राजा से हुई थी।
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ब्रह्मलीन होने पर बाजार हुआ था बंद
वर्ष 1975 में वह ब्रह्मलीन हुए तो उनके सम्मान में बाजार, शिक्षण संस्थाएं और शासकीय कार्यालय बंद कर दिए गए थे। उनका पार्थिव शरीर तिरंगे में लपेटकर घंटाघर के मैदान में दर्शनार्थ के लिए रखा गया था।


ये हैं स्वतंत्रता सेनानी
देश के स्वतंत्रता आंदोलन में जिले का योगदान कम नहीं है। यहां एक सैकड़ा से ज्यादा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जन्में हैं। इनमें बृजनंदन किलेदार, बृजनंदन शर्मा, मथुरा प्रसाद वैद्य, वृंदावन इमलिया, बाबूलाल निगम, हरीराम चौबे, शिवचरणलाल वर्मा, हुकुमचंद बुखारिया, मदनलाल किलेदार, उत्तमचंद कठरया, शंभुदयाल संज्ञा, हरपाल सिंह, मदनलाल, गोविंद दास सिंघई, गोविंद दास जैन, हुकुमचंद बड़घरिया, रामचंद जैन, घनश्याम दास नाई, परमेष्ठीदास जैन, कमला देवी, जानकी प्रसाद, सुखलाल इमलिया, धन्नलाल गुढ़ा, प्यारेलाल कुशवाहा, कल्लूराम यादव, रमानाथ खैरा, शिखरचंद सिंघई, बाबूलाल घी वाले, अहमद खां पहलवान, केशरबाई, खूबचंद पुष्प मोदी, भैरव प्रसाद राय, मणिराम कंचन, कंहैयालाल कड़ोरे, बृजनंदन पस्तोर, जमनादास चौबे, मथुरादास लिटौरिया, गोपालदास जैन, पूजीलाल स्वर्णकार, गजराज सिंह, गुलाबचंद प्तटेलर, बलदेव प्रसाद, दयाराम पांडेय, कपूरचंद जैन आदि शामिल हैं।
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