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वड़घरिया ने पहुंचाई रसद तो किलेदार को भाता उग्र आंदोलन
Updated Wed, 24 Jan 2018 02:09 AM IST
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वड़घरिया पहुंचाते थे रसद तो किलेदार को भाता था उग्र आंदोलन
ललितपुर।
देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने में हर किसी ने अपने-अपने स्तर से मदद की है, इसी की बदौलत हम सभी खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं। उस दौरा में जहां मदनलाल किलेदार ने उग्र आंदोलन को हवा दी, वहीं, हुकुमचंद वड़घरिया ने क्रांतिकारियों तक अनाज पहुंचाकर उनकी मदद की, जिसे नगरवासी आज भी याद करते हैं।
अंग्रेजों की पिटाई करने में खुद को समझते थे धन्य
महावीरपुरा निवासी छोटेलाल किलेदार के यहां जन्में मदनलाल किलेदार भी परिवार के अन्य सदस्यों की तरह अंग्रेजों के खिलाफ हो गए। किलेदार परिवार में सबसे पहले नंदकिशोर किलेदार ने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का जज्बा दिखाया। उसके बाद उनके पुत्र बृजनंदन किलेदार भी उसी राह पर चले पड़े। इसका प्रभाव मदनलाल किलेदार पर पड़ा। जब वह बाल्यकाल में थे तब सत्याग्रहियों का सहयोग करते रहे और जब किशोरावस्था में आए तो उन्होंने आंदोलनों में भाग लेना आरंभ कर दिया। उग्र तेवर वाले किलेदार अंग्रेजों की पिटाई करने से भी पीछे नहीं रहे। वह अंग्रेजों से मारपीट करने पर खुद को धन्य समझते थे। एक समय ऐसा आया कि उनकी सक्रिय गतिविधियों से अंग्रेज परेशान हो गए। वर्ष 1942 के आंदोलन में उन्हें बंदी बना लिया गया। लेकिन न्यायाधीश कम उम्र देख न्यायाधीश ने उन्हें रिहा करने का आदेश गदे दिया। इसके बाद भी वह अंग्रेजों के प्रति नरम नहीं पड़े। उन्होंने न्यायालय में ही कह दिया था कि अगर मुझे छोड़ा जाता है तब भी मैं वापस जाकर सरकारी कार्यालयों को आग के हवाले कर दूंगा। यह सुनकर न्यायाधीश आगबबूला हो गया। न्यायाधीश ने उन्हें एक वर्ष की सजा व सौ रुपये के जुर्माने का आदेश सुनाया।
खुद को खतरे में डालकर पहुंचाते थे रसद
ललितपुर। शहर में जन्मे हुकुमचंद वड़घरिया का आजादी के आंदोलन में कम योगदान नहीं है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं को रसद पहुंचाने का काम किया है। उस समय एक जगह से दूसरी जगह अनाज भिजवाना दुरूह कार्य होता था। अधिकांश क्रांतिकारी जनता के बीच भ्रमण नहीं कर पाते थे। जिस कारण उन्हें एकांतवा करना पड़ता था। आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धि वालंटियर के माध्यम से होती थी। इस मामले में हुकुमचंद वड़घरिया ने खतरे की तनिक भी चिंता नहीं की और लगातार सेनानियों की मदद करते रहे। वर्ष 1942 के आंदोलन में धारा 144 लगा दी गई। इसका उन्होंने उल्लंघन किया तो उन्हें एक वर्ष की सजा व सौ रुपये का दंड सुनाया गया। इस दौरान महात्मा गांधी ने आह्वान किया था कि कोई सरकार को अंर्थदंड नहीं देगा। इसके कारण उन्हें दो माह का कठोर कारावास भी काटना पड़ा।
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ललितपुर।
देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने में हर किसी ने अपने-अपने स्तर से मदद की है, इसी की बदौलत हम सभी खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं। उस दौरा में जहां मदनलाल किलेदार ने उग्र आंदोलन को हवा दी, वहीं, हुकुमचंद वड़घरिया ने क्रांतिकारियों तक अनाज पहुंचाकर उनकी मदद की, जिसे नगरवासी आज भी याद करते हैं।
अंग्रेजों की पिटाई करने में खुद को समझते थे धन्य
महावीरपुरा निवासी छोटेलाल किलेदार के यहां जन्में मदनलाल किलेदार भी परिवार के अन्य सदस्यों की तरह अंग्रेजों के खिलाफ हो गए। किलेदार परिवार में सबसे पहले नंदकिशोर किलेदार ने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का जज्बा दिखाया। उसके बाद उनके पुत्र बृजनंदन किलेदार भी उसी राह पर चले पड़े। इसका प्रभाव मदनलाल किलेदार पर पड़ा। जब वह बाल्यकाल में थे तब सत्याग्रहियों का सहयोग करते रहे और जब किशोरावस्था में आए तो उन्होंने आंदोलनों में भाग लेना आरंभ कर दिया। उग्र तेवर वाले किलेदार अंग्रेजों की पिटाई करने से भी पीछे नहीं रहे। वह अंग्रेजों से मारपीट करने पर खुद को धन्य समझते थे। एक समय ऐसा आया कि उनकी सक्रिय गतिविधियों से अंग्रेज परेशान हो गए। वर्ष 1942 के आंदोलन में उन्हें बंदी बना लिया गया। लेकिन न्यायाधीश कम उम्र देख न्यायाधीश ने उन्हें रिहा करने का आदेश गदे दिया। इसके बाद भी वह अंग्रेजों के प्रति नरम नहीं पड़े। उन्होंने न्यायालय में ही कह दिया था कि अगर मुझे छोड़ा जाता है तब भी मैं वापस जाकर सरकारी कार्यालयों को आग के हवाले कर दूंगा। यह सुनकर न्यायाधीश आगबबूला हो गया। न्यायाधीश ने उन्हें एक वर्ष की सजा व सौ रुपये के जुर्माने का आदेश सुनाया।
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खुद को खतरे में डालकर पहुंचाते थे रसद
ललितपुर। शहर में जन्मे हुकुमचंद वड़घरिया का आजादी के आंदोलन में कम योगदान नहीं है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं को रसद पहुंचाने का काम किया है। उस समय एक जगह से दूसरी जगह अनाज भिजवाना दुरूह कार्य होता था। अधिकांश क्रांतिकारी जनता के बीच भ्रमण नहीं कर पाते थे। जिस कारण उन्हें एकांतवा करना पड़ता था। आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धि वालंटियर के माध्यम से होती थी। इस मामले में हुकुमचंद वड़घरिया ने खतरे की तनिक भी चिंता नहीं की और लगातार सेनानियों की मदद करते रहे। वर्ष 1942 के आंदोलन में धारा 144 लगा दी गई। इसका उन्होंने उल्लंघन किया तो उन्हें एक वर्ष की सजा व सौ रुपये का दंड सुनाया गया। इस दौरान महात्मा गांधी ने आह्वान किया था कि कोई सरकार को अंर्थदंड नहीं देगा। इसके कारण उन्हें दो माह का कठोर कारावास भी काटना पड़ा।
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