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महिला समूह गुजरात भेजेगा 10 मीट्रिक टन केले का रेशा
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ईसानगर क्षेत्र के गांव समैसा में मां सरस्वती ग्राम संगठन ने लगाई है फाइबर इकाई
लखीमपुर खीरी। ईसानगर क्षेत्र के महिला स्वयं सहायता समूह को 10 मीट्रिक टन केले का रेशा सप्लाई करने का आर्डर गुजरात से मिला है। इस आर्डर को लेकर समूह के सदस्य काफी उत्साहित हैं।
ईसानगर क्षेत्र में केले की खेती बड़े पैमाने पर होती है। केले के अनुपयुक्त तने से महिलाएं रेशा उत्पादन का कार्य करती हैं। इसकी शुरुआत एनआरएलएम (राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन) द्वारा गठित मां सरस्वती ग्राम संगठन समैसा ने करीब एक साल पहले सीडीओ अरविंद सिंह की प्रेरणा से की। मशीन के जरिए 25 महिलाओं ने केला (बनाना) का फाइबर बनाना शुरू किया।
सीडीओ अरविंद सिंह ने बताया कि केले के पौधे के तने को छीलकर पहले रेशा निकाला जाता है, जो जूट या सन की तरह होता है। इसका उपयोग पर्यावरण अनुकूल उत्पाद जैसे हैंडबैग, कारपेट चटाई, बेल्ट, कपड़े, साड़ी, सोफा कवर, दरी, फैंसी कोटी आदि बनाने में कच्चे माल की तरह किया जाता है।
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सीडीओ ने बताया कि पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की मांग लगातार बढ़ने के कारण ऐसे उत्पादों के लिए बाजार में संभावना अधिक है। ईसानगर क्षेत्र में केला की खेती अधिक होने के कारण कच्चे माल की पर्याप्त उपलब्धता है। इस कार्य में अधिक श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन कम परिश्रम में ही कार्य बखूबी हो जाता है। इस प्रोजेक्ट के माध्यम से भारी संख्या में लोगों को रोजगार दिलाया जा सकता है। बनाना फाइबर की डिमांड सूरत, अहमदाबाद, कानपुर आदि शहरों में है।
अहमदाबाद (गुजरात) की एल्टमट कंपनी की सीईओ शिखा शाह ने फाइबर की टेस्टिंग में पास होने के बाद 10 मीट्रिक टन का आर्डर दिया है। रेशे का मूल्य 150 से 250 रुपये प्रति किलोग्राम है।
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लखीमपुर खीरी। ईसानगर क्षेत्र के महिला स्वयं सहायता समूह को 10 मीट्रिक टन केले का रेशा सप्लाई करने का आर्डर गुजरात से मिला है। इस आर्डर को लेकर समूह के सदस्य काफी उत्साहित हैं।
ईसानगर क्षेत्र में केले की खेती बड़े पैमाने पर होती है। केले के अनुपयुक्त तने से महिलाएं रेशा उत्पादन का कार्य करती हैं। इसकी शुरुआत एनआरएलएम (राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन) द्वारा गठित मां सरस्वती ग्राम संगठन समैसा ने करीब एक साल पहले सीडीओ अरविंद सिंह की प्रेरणा से की। मशीन के जरिए 25 महिलाओं ने केला (बनाना) का फाइबर बनाना शुरू किया।
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सीडीओ अरविंद सिंह ने बताया कि केले के पौधे के तने को छीलकर पहले रेशा निकाला जाता है, जो जूट या सन की तरह होता है। इसका उपयोग पर्यावरण अनुकूल उत्पाद जैसे हैंडबैग, कारपेट चटाई, बेल्ट, कपड़े, साड़ी, सोफा कवर, दरी, फैंसी कोटी आदि बनाने में कच्चे माल की तरह किया जाता है।
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सीडीओ ने बताया कि पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की मांग लगातार बढ़ने के कारण ऐसे उत्पादों के लिए बाजार में संभावना अधिक है। ईसानगर क्षेत्र में केला की खेती अधिक होने के कारण कच्चे माल की पर्याप्त उपलब्धता है। इस कार्य में अधिक श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन कम परिश्रम में ही कार्य बखूबी हो जाता है। इस प्रोजेक्ट के माध्यम से भारी संख्या में लोगों को रोजगार दिलाया जा सकता है। बनाना फाइबर की डिमांड सूरत, अहमदाबाद, कानपुर आदि शहरों में है।
अहमदाबाद (गुजरात) की एल्टमट कंपनी की सीईओ शिखा शाह ने फाइबर की टेस्टिंग में पास होने के बाद 10 मीट्रिक टन का आर्डर दिया है। रेशे का मूल्य 150 से 250 रुपये प्रति किलोग्राम है।