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दुधवा के गैंडा पुनर्वासन योजना में इस साल जुड़ेंगे नए आयाम
सार
दुधवा टाइगर रिजर्व में चल रही गैंडा पुनर्वासन योजना में इस साल नए आयाम जुड़ने की उम्मीद है।प्रधान मुख्य वन संरक्षक की मंजूरी के बाद कुछ गैंडों के लिए सौर ऊर्जा चालित बाड़े से आजादी का मार्ग प्रशस्त हो गया है।इनसे हुई वंश वृद्घि के परिणाम स्वरूप इस समय दुधवा टाइगर रिजर्व में कुल 46 गैंडे हैं।
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विस्तार
लखीमपुर खीरी। दुधवा टाइगर रिजर्व में चल रही गैंडा पुनर्वासन योजना में इस साल नए आयाम जुड़ने की उम्मीद है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक की मंजूरी के बाद कुछ गैंडों के लिए सौर ऊर्जा चालित बाड़े से आजादी का मार्ग प्रशस्त हो गया है। गैंडा पुनर्वासन योजना फेज-1 से चार गैंडों को चिह्नित कर उन्हें जंगल में स्वच्छंद विचरण के लिए छोड़ा जाएगा। जंगल में छोड़ने से पहले इन गैंडों को रेडियो कॉलर लगाया जाएगा।
दुधवा टाइगर रिजर्व में गैंडा पुनर्वासन योजना शुरू होने के 38 साल बाद यह मौका आ रहा है। रेडियो कॉलर लगाने के पीछे मकसद यह है कि गैंडों की लोकेशन, गतिविधियों, रहन सहन, और खानपान पर निगरानी रखी जा सके। दुधवा टाइगर रिजर्व प्रशासन और विशेषज्ञ गैंडों की गतिविधियों का बारीकी से अध्ययन करेगा। यदि यह प्रयोग सफल रहा तो अन्य गैंडों को भी चरणबद्घ तरीके से जंगल में खुला छोड़ कर उन्हें असम और बंगाल की तरह विचरण की आजादी दी जाएगी। दुधवा टाइगर रिजर्व प्रशासन ने इसके लिए तैयारियां शुरू कर दी है।
दुधवा में वर्ष 1984 में शुरू हुई थी गैंडा पुनर्वासन योजना
दुधवा टाइगर रिजर्व में वर्ष 1984 में असम के जंगलों से पांच गैंडों को लाकर गैंडा पुनर्वासन योजना शुरू की गई थी। इसके लिए 32 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को सौरचालित बाड़ से घेर कर गैंडों के लिए सुरक्षित घर बनाया गया था। एक साल बाद 1985 में नेपाल से चार मादा गैंडा लाकर इनके साथ रखा गया। इनसे हुई वंश वृद्घि के परिणाम स्वरूप इस समय दुधवा टाइगर रिजर्व में कुल 46 गैंडे हैं। गैंडों की बढ़ती संख्या को देखते हुए चार साल पहले दुधवा के ही बेलरायां रेंज में गैंडा पुनर्वासन योजना फेज-2 के तहत 14 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को सौर ऊर्जा चालित बाड़ से घेर कर गैंडों का नया घर बनाया गया था। इसमें तीन मादा और एक नर गैंडों को रखा गया था।
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दुधवा के सभी गैंडों की बनेगी दोबारा डीएनए प्रोफाइल
दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर संजय पाठक ने बताया कि वर्ष 2018 में दुधवा के अधिकांश गैंडों की डीएनए प्रोफाइल बनाई जा चुकी है। अब एक बार फिर सभी गैंडों के सैंपल लेकर उनका डीएनए टेस्ट करने के बाद उनकी डीएनए प्रोफाइल बनाई जाएगी। ताकि गैंडों को उनकी पहचान मिल सके। इसकी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। गैंडों की गणना और डीएनए प्रोफाइल बनाने का अधूरा रह गया काम बरसात के बाद पूरा किया जाएगा।
नुकल, सहदेव से लेकर नेपोलियन तक
गैंडा पुनर्वासन योजना शुरू होने के साथ ही गैंडों के नामकरण की परंपरा रही है। असम से लाए गैंडों के नाम पावित्री, राजू, बांके रखे गए थे। नेपाल से लाई मादा गैंडों के नाम हिमरानी, स्वयंवरा जैसे नाम रखे गए थे। इनकी संतानों के नाम भी रखे गए है। इनमें नकुल सहदेव जैसे नाम शामिल है। फेज-2 में रखे गए गैडों के नाम नेपोलियन, शमा आदि रखे गए है। नामकरण इनके स्वभाव और जन्म की परिस्थितियों या अधिकारियों की पसंद से होता हैं।
एक सींग वाले गैंडों की है यह विशेषताएं
एक सींग वाला भारतीय गैंडा विश्व का चौथा सबसे बड़ा जानवर है।
इसका वजन एक से चार टन के बीच होता है।
इनकी त्वचा विशेष रूप से मोटी होती है, 1.5 और 5 सेमी मोटी होती है।
इनकी त्वचा बिना बालों के कोलेजन की कई परतों से बनी होती है।
गैंडो के थूथन पर सींग केराटिन से बना होता है, जिसमें कोई बोन घटक नहीं होता है।
विशाल आकार के लिए उनके पास अपेक्षाकृत दिमाग छोटा होता हैं।
इनकी आंखें उनके सिर के किनारों पर स्थित हैं। इसके बजाय, उनके कान ट्यूब के आकार के होते हैं।
‘दुधवा टाइगर रिजर्व में चल रही गैंडा पुनर्वासन योजना में इस साल एतिहासिक क्षण आने वाला है, जब चार गैंडों को सौर ऊर्जा चालित बाड़ से मुक्त कर उन्हें जंगल में स्वच्छंद विचरण के लिए आजाद किया जाएगा। इनकी गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए उन्हें रेडियो कॉलर लगाया जाएगा।’
- संजय पाठक, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व
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दुधवा टाइगर रिजर्व में गैंडा पुनर्वासन योजना शुरू होने के 38 साल बाद यह मौका आ रहा है। रेडियो कॉलर लगाने के पीछे मकसद यह है कि गैंडों की लोकेशन, गतिविधियों, रहन सहन, और खानपान पर निगरानी रखी जा सके। दुधवा टाइगर रिजर्व प्रशासन और विशेषज्ञ गैंडों की गतिविधियों का बारीकी से अध्ययन करेगा। यदि यह प्रयोग सफल रहा तो अन्य गैंडों को भी चरणबद्घ तरीके से जंगल में खुला छोड़ कर उन्हें असम और बंगाल की तरह विचरण की आजादी दी जाएगी। दुधवा टाइगर रिजर्व प्रशासन ने इसके लिए तैयारियां शुरू कर दी है।
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दुधवा में वर्ष 1984 में शुरू हुई थी गैंडा पुनर्वासन योजना
दुधवा टाइगर रिजर्व में वर्ष 1984 में असम के जंगलों से पांच गैंडों को लाकर गैंडा पुनर्वासन योजना शुरू की गई थी। इसके लिए 32 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को सौरचालित बाड़ से घेर कर गैंडों के लिए सुरक्षित घर बनाया गया था। एक साल बाद 1985 में नेपाल से चार मादा गैंडा लाकर इनके साथ रखा गया। इनसे हुई वंश वृद्घि के परिणाम स्वरूप इस समय दुधवा टाइगर रिजर्व में कुल 46 गैंडे हैं। गैंडों की बढ़ती संख्या को देखते हुए चार साल पहले दुधवा के ही बेलरायां रेंज में गैंडा पुनर्वासन योजना फेज-2 के तहत 14 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को सौर ऊर्जा चालित बाड़ से घेर कर गैंडों का नया घर बनाया गया था। इसमें तीन मादा और एक नर गैंडों को रखा गया था।
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दुधवा के सभी गैंडों की बनेगी दोबारा डीएनए प्रोफाइल
दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर संजय पाठक ने बताया कि वर्ष 2018 में दुधवा के अधिकांश गैंडों की डीएनए प्रोफाइल बनाई जा चुकी है। अब एक बार फिर सभी गैंडों के सैंपल लेकर उनका डीएनए टेस्ट करने के बाद उनकी डीएनए प्रोफाइल बनाई जाएगी। ताकि गैंडों को उनकी पहचान मिल सके। इसकी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। गैंडों की गणना और डीएनए प्रोफाइल बनाने का अधूरा रह गया काम बरसात के बाद पूरा किया जाएगा।
नुकल, सहदेव से लेकर नेपोलियन तक
गैंडा पुनर्वासन योजना शुरू होने के साथ ही गैंडों के नामकरण की परंपरा रही है। असम से लाए गैंडों के नाम पावित्री, राजू, बांके रखे गए थे। नेपाल से लाई मादा गैंडों के नाम हिमरानी, स्वयंवरा जैसे नाम रखे गए थे। इनकी संतानों के नाम भी रखे गए है। इनमें नकुल सहदेव जैसे नाम शामिल है। फेज-2 में रखे गए गैडों के नाम नेपोलियन, शमा आदि रखे गए है। नामकरण इनके स्वभाव और जन्म की परिस्थितियों या अधिकारियों की पसंद से होता हैं।
एक सींग वाले गैंडों की है यह विशेषताएं
एक सींग वाला भारतीय गैंडा विश्व का चौथा सबसे बड़ा जानवर है।
इसका वजन एक से चार टन के बीच होता है।
इनकी त्वचा विशेष रूप से मोटी होती है, 1.5 और 5 सेमी मोटी होती है।
इनकी त्वचा बिना बालों के कोलेजन की कई परतों से बनी होती है।
गैंडो के थूथन पर सींग केराटिन से बना होता है, जिसमें कोई बोन घटक नहीं होता है।
विशाल आकार के लिए उनके पास अपेक्षाकृत दिमाग छोटा होता हैं।
इनकी आंखें उनके सिर के किनारों पर स्थित हैं। इसके बजाय, उनके कान ट्यूब के आकार के होते हैं।
‘दुधवा टाइगर रिजर्व में चल रही गैंडा पुनर्वासन योजना में इस साल एतिहासिक क्षण आने वाला है, जब चार गैंडों को सौर ऊर्जा चालित बाड़ से मुक्त कर उन्हें जंगल में स्वच्छंद विचरण के लिए आजाद किया जाएगा। इनकी गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए उन्हें रेडियो कॉलर लगाया जाएगा।’
- संजय पाठक, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व