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Lakhimpur Kheri News: होलिका की लपटों संग दिखता सौहार्द का रंग
Fri, 20 Feb 2026 11:11 PM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Fri, 20 Feb 2026 11:11 PM IST
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पश्चिमी लखपेड़ा में स्थित होलिका दहन स्थल। संवाद
- फोटो : पश्चिमी लखपेड़ा में स्थित होलिका दहन स्थल। संवाद
मोहम्मदी। होली पर जब होलिका की लपटें आसमान को छूती हैं, तब नगर के मोहल्ला पूर्वी लखपेड़ा में केवल त्योहार ही नहीं, बल्कि आपसी सौहार्द और गंगा-जमुनी तहजीब का अनूठा दृश्य भी दिखाई देता है।
मुस्लिम बाहुल्य इस मोहल्ले में दशकों से होलिका दहन की परंपरा निभाई जा रही है, जिसमें दोनों समुदाय मिलकर भागीदारी करते है। मोहल्ले में हिंदू परिवारों की संख्या मात्र पांच-छह है, जबकि अधिकांश घर मुस्लिम समुदाय के हैं। इसके बावजूद होली का आयोजन पूरे मोहल्ले के सहयोग से होता है, जिसे कस्बे की बड़ी होली के रूप में जाना जाता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले हिंदू-मुस्लिम परिवार मिलकर होली के लिए लकड़ी इकट्ठा करते थे और होलिका दहन के बाद आग में आलू भूनकर खाने की परंपरा निभाते थे। अब लकड़ी की व्यवस्था नगरपालिका की तरफ से की जाती है, लेकिन आपसी सहयोग और भाईचारे की भावना आज भी पहले जैसी कायम है।
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नगर के अच्छन मियां के घर के पास होलिका दहन होता है, जहां त्योहार के दिन पूरा मोहल्ला एकत्र होकर आयोजन में सहयोग करता है। होलिका दहन के दौरान घरों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लोग छतों पर पानी का इंतजाम भी कर लेते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां होली को लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ और वर्षों से सौहार्द की परंपरा लगातार मजबूत होती जा रही है।
हालांकि समय के साथ आलू भूनकर खाने की पुरानी परंपरा लगभग समाप्त हो गई है, लेकिन मोहल्ले में भाईचारे और एकता का रंग आज भी उसी तरह दिखाई देता है। संवाद
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हमारे मोहल्ले की होली भाई-चारे की मिसाल और सबसे पुरानी है। यहां सभी हिंदू-मुस्लिम एक-दूसरे का सहयोग करते हैं।
-विनोद कुमार कटियार, निवासी मोहल्ला पूर्वी लखपेड़ा
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त्योहार में सभी लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। सुबह दोनों समुदायों के लोग एकत्र होकर एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं।
-मोहम्मद हनीफ, सभासद
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मुस्लिम बाहुल्य इस मोहल्ले में दशकों से होलिका दहन की परंपरा निभाई जा रही है, जिसमें दोनों समुदाय मिलकर भागीदारी करते है। मोहल्ले में हिंदू परिवारों की संख्या मात्र पांच-छह है, जबकि अधिकांश घर मुस्लिम समुदाय के हैं। इसके बावजूद होली का आयोजन पूरे मोहल्ले के सहयोग से होता है, जिसे कस्बे की बड़ी होली के रूप में जाना जाता है।
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स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले हिंदू-मुस्लिम परिवार मिलकर होली के लिए लकड़ी इकट्ठा करते थे और होलिका दहन के बाद आग में आलू भूनकर खाने की परंपरा निभाते थे। अब लकड़ी की व्यवस्था नगरपालिका की तरफ से की जाती है, लेकिन आपसी सहयोग और भाईचारे की भावना आज भी पहले जैसी कायम है।
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नगर के अच्छन मियां के घर के पास होलिका दहन होता है, जहां त्योहार के दिन पूरा मोहल्ला एकत्र होकर आयोजन में सहयोग करता है। होलिका दहन के दौरान घरों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लोग छतों पर पानी का इंतजाम भी कर लेते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां होली को लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ और वर्षों से सौहार्द की परंपरा लगातार मजबूत होती जा रही है।
हालांकि समय के साथ आलू भूनकर खाने की पुरानी परंपरा लगभग समाप्त हो गई है, लेकिन मोहल्ले में भाईचारे और एकता का रंग आज भी उसी तरह दिखाई देता है। संवाद
हमारे मोहल्ले की होली भाई-चारे की मिसाल और सबसे पुरानी है। यहां सभी हिंदू-मुस्लिम एक-दूसरे का सहयोग करते हैं।
-विनोद कुमार कटियार, निवासी मोहल्ला पूर्वी लखपेड़ा
त्योहार में सभी लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। सुबह दोनों समुदायों के लोग एकत्र होकर एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं।
-मोहम्मद हनीफ, सभासद

पश्चिमी लखपेड़ा में स्थित होलिका दहन स्थल। संवाद- फोटो : पश्चिमी लखपेड़ा में स्थित होलिका दहन स्थल। संवाद

पश्चिमी लखपेड़ा में स्थित होलिका दहन स्थल। संवाद- फोटो : पश्चिमी लखपेड़ा में स्थित होलिका दहन स्थल। संवाद