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जनवरी में ही मौसम हो गया बसंती
लखीमपुर खीरी
Updated Sat, 02 Jan 2016 09:43 PM IST
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दिसंबर बीत गया जनवरी शुरू हो गई लेकिन ठंड बढ़ने का नाम नहीं ले रही है। पिछले तीन दिनों से तो मौसम बसंती नजर आने लगा है। सुबह-शाम हल्की ठंड के बीच दिन में कड़ी धूप निकलने से सर्दी के उतरन के अहसास हो रहा है।आम तौर से दिसंबर और जनवरी माह में कड़ाके की ठंड होती है। घना कोहरा और सर्द हवाएं लोगों को अंदर तक कंपा देती हैं लेकिन इस साल ऐसा कुछ भी नहीं दिख रहा है। मौसम विज्ञानी और पर्यावरणविद मौसम के इस नए और अनोखे तेवर देखकर हैरान हैं।
दिसंबर के मध्य में पहाड़ों पर भीषण बर्फवारी होने से तराई में तीन-चार दिन शीतलहर का प्रकोप रहा लेकिन उतनी ठंड नहीं पड़ी जितनी कि पिछले वर्षों में होती रही है। ठंडी हवाओं और कोहरे का प्रकोप अभी तक न के बराबर है। जनवरी के पहले दिन से ही तापमान में बढ़ोतरी शुरू हो गई है। लोग सुबह शाम तो गर्म कपड़े पहन रहे हैं लेकिन दिन में यही गर्म कपड़े भारी लगने लगते हैं। सुबह की गुनगुनी धूप मजा देती है तो दोपहर होते-होते यही धूप बदन में चुभने लगती है। तराई में अभी तक न्यूनतम तापमान पांच डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं आया है। शनिवार को अधिकतम तापमान 22 डिग्री सेल्सियस तो न्यूनतम तापमान 10 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया।
कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है असर
कृषि वैज्ञानिक डॉ. सुहैल का कहना है कि इस साल मौसम के बदले तेवर रबी की फसलों और दलहन के उत्पादन पर बुरा प्रभाव डाल सकते हैं। कोहरा गेहूं की फसल के लिए विशेष लाभदायक होता है। इससे गेहूं की ग्रोथ तेज होती है इस बार कोहरा न पड़ने से गेहूं की फसल को उसका लाभ नहीं मिल रहा है। उनका कहना है कि मौसम के उतार-चढ़ाव से वानस्पतिक वृद्धि प्रभावित होने के साथ-साथ फसलों में रोगों और कीटों का प्रकोप बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है।
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पर्यावरण असंतुलन से मौसम में आ रहा बदलाव
पर्यावरणविद डॉ. सुनील त्रिपाठी का कहना है एयर कंडीशनर और फ्रिज से निकलने वाली क्लोरो-फ्लोरो कार्बन गैस प्राकृतिक छतरी ओजोन की पर्त को नुकसान पहुंचा रही है। इससे ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति पैदा हो रही है। अगर अभी न चेते तो भविष्य में स्थिति और अधिक भयावह हो सकती है। आम में दो माह पहले ही दिसंबर में ही बौर आना शुरू हो गया है। समय से पहले अपूर्ण और अविकसित फलों के उत्पादन की आशंका है।
मौसम के उतार-चढ़ाव से पैदा हो सकती हैं बीमारियां
डॉ. एसपी वर्मा का मानना है कि मौसम के इस उतार-चढ़ाव से तमाम तरह की बीमारियां पैदा हो सकती हैं। ऐसे में विशेष रूप से सतर्कता बरतने की जरूरत है। खानपान में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। कई नई बीमारियां भी जन्म ले सकती हैं।
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दिसंबर के मध्य में पहाड़ों पर भीषण बर्फवारी होने से तराई में तीन-चार दिन शीतलहर का प्रकोप रहा लेकिन उतनी ठंड नहीं पड़ी जितनी कि पिछले वर्षों में होती रही है। ठंडी हवाओं और कोहरे का प्रकोप अभी तक न के बराबर है। जनवरी के पहले दिन से ही तापमान में बढ़ोतरी शुरू हो गई है। लोग सुबह शाम तो गर्म कपड़े पहन रहे हैं लेकिन दिन में यही गर्म कपड़े भारी लगने लगते हैं। सुबह की गुनगुनी धूप मजा देती है तो दोपहर होते-होते यही धूप बदन में चुभने लगती है। तराई में अभी तक न्यूनतम तापमान पांच डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं आया है। शनिवार को अधिकतम तापमान 22 डिग्री सेल्सियस तो न्यूनतम तापमान 10 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया।
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कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है असर
कृषि वैज्ञानिक डॉ. सुहैल का कहना है कि इस साल मौसम के बदले तेवर रबी की फसलों और दलहन के उत्पादन पर बुरा प्रभाव डाल सकते हैं। कोहरा गेहूं की फसल के लिए विशेष लाभदायक होता है। इससे गेहूं की ग्रोथ तेज होती है इस बार कोहरा न पड़ने से गेहूं की फसल को उसका लाभ नहीं मिल रहा है। उनका कहना है कि मौसम के उतार-चढ़ाव से वानस्पतिक वृद्धि प्रभावित होने के साथ-साथ फसलों में रोगों और कीटों का प्रकोप बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है।
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पर्यावरण असंतुलन से मौसम में आ रहा बदलाव
पर्यावरणविद डॉ. सुनील त्रिपाठी का कहना है एयर कंडीशनर और फ्रिज से निकलने वाली क्लोरो-फ्लोरो कार्बन गैस प्राकृतिक छतरी ओजोन की पर्त को नुकसान पहुंचा रही है। इससे ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति पैदा हो रही है। अगर अभी न चेते तो भविष्य में स्थिति और अधिक भयावह हो सकती है। आम में दो माह पहले ही दिसंबर में ही बौर आना शुरू हो गया है। समय से पहले अपूर्ण और अविकसित फलों के उत्पादन की आशंका है।
मौसम के उतार-चढ़ाव से पैदा हो सकती हैं बीमारियां
डॉ. एसपी वर्मा का मानना है कि मौसम के इस उतार-चढ़ाव से तमाम तरह की बीमारियां पैदा हो सकती हैं। ऐसे में विशेष रूप से सतर्कता बरतने की जरूरत है। खानपान में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। कई नई बीमारियां भी जन्म ले सकती हैं।