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Lakhimpur Kheri News: श्रीराम के वनवास ने छुआ श्रद्धालुओं का मन

Mon, 10 Aug 2026 11:20 PM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी Updated Mon, 10 Aug 2026 11:20 PM IST
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Shri Ram's exile touched the hearts of devotees.
श्रीराम कथा सुनाते कथावाचक योगेंद्र महाराज। संवाद
लखीमपुर खीरी। पंजाबी कॉलोनी स्थित ऋषि आश्रम में चल रही श्रीराम कथा में सोमवार को कथावाचक योगेंद्र महाराज ने भगवान श्रीराम के वनवास का मार्मिक प्रसंग सुनाया। कथा सुन श्रद्धालु भावुक हो उठे और पंडाल जय श्रीराम के जयकारों से गूंजता रहा।
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कथावाचक ने बताया कि कैकेयी के दो वरदान मांगने पर राजा दशरथ ने भगवान श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास देने का निर्णय सुनाया। पिता की आज्ञा और वचन की मर्यादा रखते हुए श्रीराम ने बिना विरोध वन जाने का निर्णय स्वीकार किया। माता सीता और भाई लक्ष्मण भी उनके साथ वन जाने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने कहा कि श्रीराम का वनवास त्याग, आज्ञापालन और मर्यादा का अनुपम उदाहरण है। कथा के दौरान श्रद्धालु भजनों पर भाव-विभोर होकर झूमते रहे। बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा सुनने पहुंचे। संवाद
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भरत मिलाप के प्रसंग पर जय श्रीराम के उद्घोष से गूंजा पंडाल
महेवागंज। गुप्तिनाथ देवस्थान में श्रीमद्भागवत कथा में सोमवार को कथा व्यास पंडित हेमंत शास्त्री ने भरत मिलाप का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में भगवान श्रीराम और भरत का मिलाप भाई के प्रेम और त्याग का पवित्र प्रसंग है।
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कथा व्यास ने बताया कि श्रीराम के वनवास जाने पर भरत अयोध्यावासियों और गुरुजनों के साथ उन्हें मनाने वन पहुंचे। भरत श्रीराम के चरणों में गिरकर माता कैकेई के हठ के लिए क्षमा मांगते हुए अयोध्या लौटने का आग्रह करते हैं। श्रीराम उन्हें गले लगाकर समझाते हैं कि इसमें उनका कोई दोष नहीं, यह विधि का विधान है। भरत के न मानने और चित्रकूट में ही प्राण त्यागने की बात कहने पर श्रीराम अपनी चरण पादुकाएं देते हैं। भरत उन्हें सिंहासन पर रखकर 14 वर्ष तक श्रीराम के अयोध्या लौटने तक तपस्वी की तरह राज्य की सेवा करते हैं। प्रसंग सुन श्रद्धालुओं ने जय श्रीराम के उद्घोष के साथ मंगल आरती की। संत शिवानंद सरस्वती हठी बाबा ने प्रसाद बांटा।

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श्रीराम-भरत मिलाप का प्रसंग सुन भावविभोर हुए श्रोता
बेहजम। ग्राम पंचायत रुकनापुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में व्यास उमाकांत अवस्थी ने श्रीराम और भरत के प्रेम का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि भरत रामजी को मनाने वन जाते हैं और अयोध्या लौटने के लिए बार-बार आग्रह करते हैं, लेकिन श्रीराम नहीं मानते। अंत में भरत का प्रेम देखकर श्रीराम अपनी चरण पादुकाएं देकर उन्हें विदा करते हैं। भरत वन से लौटकर खड़ाऊं सिंहासन पर रखकर अयोध्या का राज्य चलाते हैं। प्रसंग सुन श्रोता भावविभोर हो गए। इस अवसर पर सोबरन लाल दीक्षित, राजेश प्रसाद शुक्ला, रामदुलारे सिंह, रामऔतार दीक्षित, अनंतराम तिवारी, शैलेंद्र सिंह और महेंद्र सिंह सहित सैकड़ों भक्त मौजूद रहे। संवाद
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