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नन्ही गौरैया तुम रूठीं, तो रूठ गईं घर की खुशियां

Sat, 19 Mar 2016 10:26 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखीमपुर खीरी
ब्यूरो/अमर उजाला, लखीमपुर खीरी Updated Sat, 19 Mar 2016 10:26 PM IST
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Ruthin little sparrow you have the enjoyment of the home were angry
गौरैया - फोटो : अमर उजला
नन्ही गौरैया तुम रूठीं, तो रूठ गईं घर की खुशियां
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न बचे प्राकृतिक आवास न बचा गौरैया का भोजन
आंगन में गौरैया को लौटाने के लिए मुहिम हुई तेज
विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर विशेष

घर के आंगन में अनाज साफ करती मां के दामन में बैठकर दाना चुगती गौरैया, खाने की थाली से चावल के दाने चुराती गौरैया और गौरैये के पीछे नन्हे-नन्हे कदमों से बच्चों के दौड़ने और खिलखिलाने के नजारे अब नजर नहीं आते। सुबह-सुबह अटारियों पर चहचहाती गौरैया अब दिखाई नहीं देती। घर आंगन की यह नन्हीं चिड़िया जैसे रूठ सी गई है। गौरैया के लुप्त होने से मानों घर परिवार से खुशियां ही गायब हो गईं। 
गौरैया के लुप्त होने का सबसे बड़ा कारण भवन निर्माण शैली में बदलाव है। अब पूरी तरह से बंद घर बनने लगे हैं। इसमें रोशनदान तक में जालियां लगा दी जाती हैं। छप्पर वाले घर बचे नहीं। इससे इनके घोंसले बनाने तक की जगह नहीं बची है। खेतों में अंधाधुंध कीटनाशकों का प्रयोग होने से इनके भोजन कीड़े मकोड़ों में कमी आई है। मोबाइल टॉवरों से उठने वाली मैग्नेटिक तरंगे इनके लिए काल साबित हो रही हैं। इस तरह इनके प्राकृतिक आवास में संकुचन और भोजन की कमी से उनकी संख्या में लगातार कमी आ रही है। 
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घर के आसपास मिलने वाली गौरैयों के लुप्त होने से पर्यावरण पर पड़ते दुष्प्रभाव को देखते हुए गौरैयों के संरक्षण के लिए वर्ष 2010 से गौरैया दिवस मनाने की शुरुआत हुई। गौरैयों को बचाने के लिए शुरू किए जागरूकता अभियान का नतीजा यह हुआ कि गौरैयों की संख्या में धीरे-धीरे इजाफा शुरू हो गया है। 
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इस साल गौरैयों के संरक्षण के लिए प्रदेश सरकार ने एक विशेष अभियान शुरू किया है। इसके तहत पूरे प्रदेश में वन विभाग और स्वयंसेवी संगठनों की ओर से नेस्ट बाक्स वितरित किए जा रहे हैं। घोंसला वितरण का यह काम फरवरी से शुरू हुआ था जो पूरे मार्च भर जारी रहेगा। गौरैया को मनाने की यह मुहिम कितना रंग लाती है यह तो समय बताएगा लेकिन लोगों में इस बार गौरैया संरक्षण के प्रति लोग अधिक जागरूक हुए हैं। 


गौरैयों की संख्या कम होने का है ये कारण
-प्राकृतिक आवास का संकुचन
-भवन निर्माण शैली में बदलाव
-भोज्य पदार्थों की कमी
-मोबाइल टॉवरों से उठने वाली मैग्नेटिक तरंगे
-फसलों में अंधाधुंध कीटनाशकों का इस्तेमाल


गौरैया का मुख्य भोजन अनाज और कीट हैं। गौरैया फसलों और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक कीटों को खाकर पर्यावरण को शुद्ध करती हैं। इसीलिए गौरैयों को खुशियों का संवाहक कहा जाता है। इसका संरक्षण पर्यावरण और समाज हित में जरूरी है। हमें इन्हें वापस बुलाने के लिए दाना पानी रखने के साथ प्रजनन को घोंसले बनाने के लिए जगह देनी होगी।
-डॉ. वीपी सिंह, पूर्व सदस्य
राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद उत्तर प्रदेश
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