UP: दिल्ली-पंजाब के लोगों को भा रहा मैगलगंज का खीरा, कम लागत में किसानों को भी हो रहा मुनाफा
मैगलगंज क्षेत्र के हैरमखेड़ा, रहजनिया, बाइकुआं, बरबर, सेमराघाट आदि गांवों में बड़ी मात्रा में खीरे की पैदावार होती है। खीरे की फसल से अच्छा मुनाफा होने से धीरे-धीरे इसकी खेती से और भी किसान जुड़ रहे हैं।
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सब्जियों की खेती में अपनी पहचान बना चुका लखीमपुर खीरी जिले का मैगलगंज क्षेत्र का खीरा दिल्ली, हरियाणा और पंजाब प्रांत के लोगों को खूब पसंद आ रहा है। यहां के खीरे की मांग इतनी अधिक है कि वहां के व्यापारी सीधे गांव पहुंचकर सौदा करते हैं और ट्रकों या डीसीएम में लादकर ले जाते हैं।
मैगलगंज क्षेत्र में पैदा होने वाले खीरे की बाहर डिमांड होने से वहां के व्यापारियों के साथ-साथ क्षेत्र के किसानों को भी खासा फायदा हो रहा है। मैगलगंज के हैरमखेड़ा, रहजनिया, बाइकुआं, बरबर, सेमराघाट आदि गांवों में बड़ी मात्रा में पैदावार होती है। खीरे में अच्छी बचत होने से धीरे-धीरे इसकी खेती से और भी किसान जुड़ते जा रहे हैं।
किसान बड़े पैमाने पर खीरे की खेती करते हैं। जैसे ही खीरा पककर तैयार होता है, वे नेशनल हाईवे के किनारे अपनी अस्थायी मंडी लगाते हैं। यहां बाहर के व्यापारी सीधे खरीदारी करते हैं, जिससे बिचौलियों का झंझट खत्म हो जाता है और किसानों को सीधा मुनाफा मिलता है।
प्रति बीघा आती है 15,000 से 18,000 तक लागत
हैरमखेड़ा निवासी किसान अवनीश वर्मा ने बताया कि खीरे की खेती में प्रति बीघा 10 से 12 हजार रुपये का मुनाफा होता है, वो भी सिर्फ चार माह में। खीरे की फसल मई में बोई जाती है, जो अगस्त अंत तक कट जाती है। एक बीघे में 15,000 से 18,000 तक की लागत आती है, जो 25,000 से 30,000 तक नकद में बिकता है। खेती की लागत में बांस, प्लास्टिक तार, खाद और बीज शामिल होते हैं।
अत्याधिक बारिश में खराब हो जाता है खीरा
खीरे की फसल के लिए अत्याधिक बारिश नुकसानदायक होती है। ज्यादा बारिश में खीरे की नार से खीरा निकलता ही नहीं है। खीरे की खेती करने के लिए किसान अपने खेतों में कुछ-कुछ दूरी पर बांस लगा देते हैं। उसी बांस पर खीरा पनपता है।
परिवहन की बेहतर सुविधा हो तो और बढ़े मुनाफा
स्थानीय किसानों का मानना है कि अगर मार्केटिंग और परिवहन की बेहतर सुविधा मिले तो खीरे की बिक्री और उत्पादन दोनों में कई गुना वृद्धि हो सकती है। इस तरह मैगलगंज का खीरा न सिर्फ किसानों की आय का स्रोत बन रहा है, बल्कि उत्तर भारत के कई बड़े बाजारों में अपनी पहचान बना रहा है।