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चंदर बाबू के ‘छप्पर’ से होती थी जनसंघ की राजनीति

Thu, 03 Feb 2022 01:38 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Thu, 03 Feb 2022 01:38 AM IST
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Jana Sangh's politics was done by Chander Babu's 'chappar'
सौरभ गुप्ता
छप्पर के नीचे अटल बिहारी बाजपेई और भैरों सिंह शेखावत भी बिता चुके हैं रात
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मोहम्मदी। किसी जमाने में मोहम्मदी में चंदर बाबू की चौपाल, जो ‘छप्पर’ के नाम से मशहूर थी, उसे सियासत की पाठशाला कहा जाता था। दर्जनों चुनाव यहीं से संचालित हुए। सभी राजनीति दलों के नेता यहां आकर जरूर रुकते थे। चुनाव के समय तो यहां शादी जैसा माहौल हुआ करता था, लेकिन अब न तो यहां छप्पर हैं और न ही छप्पर तले बैठने वाले लोग।
मोहल्ला शुक्लापुर में पूर्व चेयरमैन रमेश चंद्र गुप्ता उर्फ चंदर बाबू का मकान है। इनकी चौपाल पर छप्पर पड़ा था, तब सभी घर कच्चे होते थे। चंदरबाबू की पाठशाला पूरे साल चलती थी। चाहे संघ हो या जनसंघ या फिर भाजपा देश, प्रदेश या फिर जिले का कोई भी कार्यकर्ता पदाधिकारी यदि मोहम्मदी आता तो उनका प्रवास यहां होता था। चंदर बाबू नगर पालिका के चेयरमैन हुए, लेकिन वे अपना कार्यकाल पूरा न कर सके। उनकी मृत्यु के बाद रामचंद्र गुप्ता एडवोकेट जो संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी हुआ करते थे, कुछ वर्षों तक चुनाव प्रबंधन देखते रहे, लेकिन छप्पर हटने के बाद सियासत की पाठशाला बंद सी हो गई।
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चंदर बाबू के भांजे जगदीश गुप्ता भट्टे वाले कुछ हद तक सियासी माहौल बनाते रहे। रामचंद्र गुप्ता एडवोकेट के पुत्र सौरभ गुप्ता बताते हैं कि पिताजी बताया करते थे कि उस समय कार्यकर्ता अपनी अपनी साइकिल से गांव-गांव घर-घर जाकर पर्ची बांटने से वोट डलवाने का काम करते। बदले में उन्हें मिलती थी छप्पर के चंद्रबाबू की डांट और मीठी चाय तो सब थकान दूर हो जाती थी।
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सौरभ गुप्ता कहते हैं कि चुनावी महापर्व में लोग यहां ऐसे जुटते थे जैसे घर में बिटिया का ब्याह हो। जब प्रत्याशी जीतता था तो जय जयकार छप्पर की होती थी। इन्हीं कार्यकर्ताओं के दम पर मोहम्मदी जनसंघ का गढ़ कहलाता था। इस छप्पर के नीचे अटल बिहारी बाजपेई, भैरोसिंह शेखावत रात में प्रवास कर चुके हैं। उस समय पार्टी के पास कोई अपना कार्यालय नहीं था। छप्पर के नीचे से ही चुनाव का संचालन होता था। यदि पूरी यूपी में जनसंघ को कोई सीट मिलती तो उनमें एक सीट जनसंघ के मन्नालाल की जरूर हुआ करती थी, लेकिन अब न छप्पर, न डांटने वाले लोग, न ही डांट खाने वाले कार्यकर्ता रहे। अब तो इस छप्पर के किस्से कहानियां ही रह गई हैं।
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