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स्वाधीनता आंदोलन में बंशीधर शुक्ल की रचनाओं ने क्रांतिकारियों में भरा जोश
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क्रांति को समर्पित था उनका रचना संसार, कदम से कदम बढ़ाए जा गीत बना आजाद हिंद फौज का मार्चिंग सांग
लखीमपुर खीरी। जिले के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे पं. बंशीधर शुक्ल ने देश के स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सा लेकर न सिर्फ आजादी के सपने को साकार किया, बल्कि अपनी जोशीली रचनाओं से क्रांतिकारियों के सीने में फौलादी हौसलों की आग भर दी थी। उनकी रचना ‘कदम से कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा’ को आजाद हिंद फौज के मार्चिंग सांग का गौरव हासिल था। वहीं उनका गीत ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ आजादी के मतवालों का क्रांति गीत था।
उठो सोने वालों सबेरा हुआ है, वतन के फकीरों का फेरा हुआ है।.. उठ जाग मुसाफिर भोर भयो..., कदम से कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए जा..., मेरा रंग दे बसंती चोला... यह कुछ कालजयी रचनाएं हैं, जिनका सृजन करने वाले पं. बंशीधर शुक्ल का जन्म बसंत पंचमी 2004 को मन्यौरा गांव में हुआ था। इनके पिता छेदीलाल शुुक्ला भी अपने क्षेत्र के प्रसिद्घ कवि थे। 15 साल की उम्र उनके पिता का निधन हो गया। इससे उन्हें आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। युवावस्था में कदम रखते ही जीविकोपार्जन के लिए किताब की दुकान खोली। पिता के काव्य संस्कारों का प्रभाव उनमें बचपन से ही था, सो शुरुआती दौर में उन्होंने कुछ शृृंगार की रचनाएं लिखीं, लेकिन बाद में देशभक्तिपूर्ण कविताएं और जागरण गीत लिखने लगे।
पुस्तक व्यवसाय से जुड़े होने के कारण अक्सर उनका कानपुर आना-जाना होता था। इसी बीच उनका संपर्क अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी से हुआ। तभी से वह क्रांतिकारी पार्टी के लिए साहित्य की रचना करने लगे। इस तरह 2021 से वह पूरी तरह स्वाधीनता आंदोलन के लिए समर्पित हो गए। दमदम कांड के बाद पंडित बंशीधर शुक्ल ने एक अत्यंत क्रांतिकारी कविता लिखी। यह कविता उन दिनों बहुत लोकप्रिय हुई। इसे खूनी पर्चा का नाम दिया गया।
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वर्ष 1928 में देश भर में एक ही दिन में एक साथ रिलीज किया गया। खीरी बम कांड के बाद बंशीधर शुक्ल के घर पर भी दबिश दी गई। पुलिस ने उनके यहां से बरामद क्रांतिकारी साहित्य जब्त कर लिया और उन्हें छह महीने जेल की सजा हुई। चाहे स्वदेशी आंदोलन हो या गांधी जी का नमक सत्याग्रह सभी राजनीतिक आंदोलनों में उन्होंने खुलकर हिस्सा लिया। उन्हें आंदोलनकारियों की मदद करने में फांके तक करने पड़े लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। सन 1940 में पं. बंशीधर शुक्ल को तीन साल की सजा सुनाई गई। इसके बाद आजादी के आंदोलन में उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। जेल की सजा भी उनकी रचनाधर्मिता को रोक नहीं पाई।
अवधी भाषा के महान कवि, जिन्हें मिली अवधी सम्राट की उपाधि
पं. बंशीधर शुक्ल ने अपनी रचनाओं का सृजन लोकभाषा अवधी में किया। उनके जीवन पर शोध करने वाले संगम लाल मालवीय का कहना है कि रामचरित मानस के रचयिता तुलसी दास के बाद अवधी साहित्य में पं. बंशीधर शुक्ल का ही नाम आता है। इसलिए उन्हें अवधी सम्राट कहा जाता है। उन्होंने जनजागरण की कविताएं लिखने के साथ शोषण के खिलाफ भी जमकर आवाज उठाई। अंग्रेजी शासन के दौरान किसानों की दुर्दशा और शोषण की कहानी को अपनी रचनाओं के माध्यम से बेहद मार्मिक चित्र खींचा है। बंशीधर शुक्ल की रचनाओं पर कई विश्वविद्यालयों में शोध हुए। कानपुर विश्वविद्यालय ने उनकी रचनाओं को हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल किया है।
जीवन भर फक्कड़ और विद्रोही बने रहे बंशीधर
आजादी के बाद वर्ष 1950 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में पं. बंशीधर शुक्ल चुनाव जीतकर विधायक बने लेकिन विधायक के रूप में मिलने वाला वेतन भत्ता उन्होंने नहीं लिया। ऐशोआराम की जिंदगी से दूर रहे। जीवन भर फक्कड़ और विद्रोही बने रहे। आजादी के 75 साल बाद भी उनका कोई स्मारक जिले में नहीं बन पाया है। कुछ साल पहले लखीमपुर में मेनरोड का नामकरण बंशीधर शुक्ल के नाम पर जरूर हुआ है। पं. बंशीधर शुक्ल के पौत्र गौरव शुक्ल का कहना है कि महान क्रांतिकारी अवधी सम्राट पं. बंशीधर शुक्ल के नाम पर स्मारक बनना चाहिए जिससे आज की युवा पीढ़ी उनसे प्रेरणा ले सकें।
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लखीमपुर खीरी। जिले के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे पं. बंशीधर शुक्ल ने देश के स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सा लेकर न सिर्फ आजादी के सपने को साकार किया, बल्कि अपनी जोशीली रचनाओं से क्रांतिकारियों के सीने में फौलादी हौसलों की आग भर दी थी। उनकी रचना ‘कदम से कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा’ को आजाद हिंद फौज के मार्चिंग सांग का गौरव हासिल था। वहीं उनका गीत ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ आजादी के मतवालों का क्रांति गीत था।
उठो सोने वालों सबेरा हुआ है, वतन के फकीरों का फेरा हुआ है।.. उठ जाग मुसाफिर भोर भयो..., कदम से कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए जा..., मेरा रंग दे बसंती चोला... यह कुछ कालजयी रचनाएं हैं, जिनका सृजन करने वाले पं. बंशीधर शुक्ल का जन्म बसंत पंचमी 2004 को मन्यौरा गांव में हुआ था। इनके पिता छेदीलाल शुुक्ला भी अपने क्षेत्र के प्रसिद्घ कवि थे। 15 साल की उम्र उनके पिता का निधन हो गया। इससे उन्हें आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। युवावस्था में कदम रखते ही जीविकोपार्जन के लिए किताब की दुकान खोली। पिता के काव्य संस्कारों का प्रभाव उनमें बचपन से ही था, सो शुरुआती दौर में उन्होंने कुछ शृृंगार की रचनाएं लिखीं, लेकिन बाद में देशभक्तिपूर्ण कविताएं और जागरण गीत लिखने लगे।
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पुस्तक व्यवसाय से जुड़े होने के कारण अक्सर उनका कानपुर आना-जाना होता था। इसी बीच उनका संपर्क अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी से हुआ। तभी से वह क्रांतिकारी पार्टी के लिए साहित्य की रचना करने लगे। इस तरह 2021 से वह पूरी तरह स्वाधीनता आंदोलन के लिए समर्पित हो गए। दमदम कांड के बाद पंडित बंशीधर शुक्ल ने एक अत्यंत क्रांतिकारी कविता लिखी। यह कविता उन दिनों बहुत लोकप्रिय हुई। इसे खूनी पर्चा का नाम दिया गया।
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वर्ष 1928 में देश भर में एक ही दिन में एक साथ रिलीज किया गया। खीरी बम कांड के बाद बंशीधर शुक्ल के घर पर भी दबिश दी गई। पुलिस ने उनके यहां से बरामद क्रांतिकारी साहित्य जब्त कर लिया और उन्हें छह महीने जेल की सजा हुई। चाहे स्वदेशी आंदोलन हो या गांधी जी का नमक सत्याग्रह सभी राजनीतिक आंदोलनों में उन्होंने खुलकर हिस्सा लिया। उन्हें आंदोलनकारियों की मदद करने में फांके तक करने पड़े लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। सन 1940 में पं. बंशीधर शुक्ल को तीन साल की सजा सुनाई गई। इसके बाद आजादी के आंदोलन में उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। जेल की सजा भी उनकी रचनाधर्मिता को रोक नहीं पाई।
अवधी भाषा के महान कवि, जिन्हें मिली अवधी सम्राट की उपाधि
पं. बंशीधर शुक्ल ने अपनी रचनाओं का सृजन लोकभाषा अवधी में किया। उनके जीवन पर शोध करने वाले संगम लाल मालवीय का कहना है कि रामचरित मानस के रचयिता तुलसी दास के बाद अवधी साहित्य में पं. बंशीधर शुक्ल का ही नाम आता है। इसलिए उन्हें अवधी सम्राट कहा जाता है। उन्होंने जनजागरण की कविताएं लिखने के साथ शोषण के खिलाफ भी जमकर आवाज उठाई। अंग्रेजी शासन के दौरान किसानों की दुर्दशा और शोषण की कहानी को अपनी रचनाओं के माध्यम से बेहद मार्मिक चित्र खींचा है। बंशीधर शुक्ल की रचनाओं पर कई विश्वविद्यालयों में शोध हुए। कानपुर विश्वविद्यालय ने उनकी रचनाओं को हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल किया है।
जीवन भर फक्कड़ और विद्रोही बने रहे बंशीधर
आजादी के बाद वर्ष 1950 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में पं. बंशीधर शुक्ल चुनाव जीतकर विधायक बने लेकिन विधायक के रूप में मिलने वाला वेतन भत्ता उन्होंने नहीं लिया। ऐशोआराम की जिंदगी से दूर रहे। जीवन भर फक्कड़ और विद्रोही बने रहे। आजादी के 75 साल बाद भी उनका कोई स्मारक जिले में नहीं बन पाया है। कुछ साल पहले लखीमपुर में मेनरोड का नामकरण बंशीधर शुक्ल के नाम पर जरूर हुआ है। पं. बंशीधर शुक्ल के पौत्र गौरव शुक्ल का कहना है कि महान क्रांतिकारी अवधी सम्राट पं. बंशीधर शुक्ल के नाम पर स्मारक बनना चाहिए जिससे आज की युवा पीढ़ी उनसे प्रेरणा ले सकें।