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रेत में हरियाली : दस एकड़ में सब्जियों की खेती शुरू
Sun, 15 Feb 2026 11:00 PM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Sun, 15 Feb 2026 11:00 PM IST
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महेवागंज। फूलबेहड़ क्षेत्र में शारदा नदी किनारे की रेतीली जमीन अब फसल रूपी सोना उगलेगी। सहारनपुर और शामली के किसान यहां डेरा डालकर तरबूज, खीरा, कद्दू, लौकी और ककड़ी की खेती कर रहे हैं। करीब दस एकड़ भूमि स्थानीय किसानों से ठेके पर लेकर फसल तैयार की जा रही है।
दर्जनों किसान-व्यापारी जनवरी से परिवार सहित नदी किनारे झोंपड़ियां बनाकर रह रहे हैं। स्थानीय किसानों की खाली पड़ी जमीन एक हजार रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से ठेके पर ली गई है। सहारनपुर जिले की तहसील नुकुड़ के बेगीगांव निवासी मो. इस्लाम ने बताया कि पिछले वर्ष उन्होंने पलिया क्षेत्र में नदी किनारे खेती की थी, जबकि इस बार फूलबेहड़ में खेती शुरू की है। उनके साथ कैसर अली, निसार, इकराम, भानु और काले समेत करीब 20 किसान परिवार जुड़े हैं। प्रत्येक किसान पांच से दस एकड़ में खेती कर रहा है। रासायनिक खाद डालकर रेतीली जमीन को उपजाऊ बनाया गया है।
-- -नालियों में उगाई जा रही पौध-- --
किसानों ने नालियां खोदकर उनमें तरबूज, खीरा, लौकी, ककड़ी और कद्दू की पौध रोपी है। पौध को पॉलीथिन से ढककर सुरक्षित रखा गया है, ताकि रेत में दबने से बचाया जा सके। फूस का सहारा भी दिया गया है। करीब चार माह में फसल तैयार होने लगती है। किसानों के अनुसार, कड़ी मेहनत और तेज गर्मी के बीच चार से पांच महीने में फसल तैयार होती है। मो. इस्लाम, दाऊद और निसार ने बताया कि एक एकड़ फसल तैयार करने में करीब एक लाख रुपये तक खर्च आता है। तैयार फसल को सहारनपुर, लखनऊ, बरेली और आगरा की मंडियों में भेजा जाता है, जहां से अच्छा मुनाफा मिलता है।
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दर्जनों किसान-व्यापारी जनवरी से परिवार सहित नदी किनारे झोंपड़ियां बनाकर रह रहे हैं। स्थानीय किसानों की खाली पड़ी जमीन एक हजार रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से ठेके पर ली गई है। सहारनपुर जिले की तहसील नुकुड़ के बेगीगांव निवासी मो. इस्लाम ने बताया कि पिछले वर्ष उन्होंने पलिया क्षेत्र में नदी किनारे खेती की थी, जबकि इस बार फूलबेहड़ में खेती शुरू की है। उनके साथ कैसर अली, निसार, इकराम, भानु और काले समेत करीब 20 किसान परिवार जुड़े हैं। प्रत्येक किसान पांच से दस एकड़ में खेती कर रहा है। रासायनिक खाद डालकर रेतीली जमीन को उपजाऊ बनाया गया है।
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किसानों ने नालियां खोदकर उनमें तरबूज, खीरा, लौकी, ककड़ी और कद्दू की पौध रोपी है। पौध को पॉलीथिन से ढककर सुरक्षित रखा गया है, ताकि रेत में दबने से बचाया जा सके। फूस का सहारा भी दिया गया है। करीब चार माह में फसल तैयार होने लगती है। किसानों के अनुसार, कड़ी मेहनत और तेज गर्मी के बीच चार से पांच महीने में फसल तैयार होती है। मो. इस्लाम, दाऊद और निसार ने बताया कि एक एकड़ फसल तैयार करने में करीब एक लाख रुपये तक खर्च आता है। तैयार फसल को सहारनपुर, लखनऊ, बरेली और आगरा की मंडियों में भेजा जाता है, जहां से अच्छा मुनाफा मिलता है।
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