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आचार, मुरब्बा, जैम-जैली और अन्य उत्पादों से नाम कमा रहीं गीता देवी
सार
घर की दहलीज लांघ कर 25 सालों से महिलाओं को बना रही हैं आत्मनिर्भर
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अपने उत्पादों के साथ गीता देवी।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
विस्तार
25 साल पहले डोगरा समूह से जुड़ी थीं, अब अपने समूह की हैं अध्यक्ष
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साल 2015 में यूपी सरकार से पा चुकी हैं लक्ष्मीबाई पुरस्कार
लखीमपुर खीरी। 25 साल पहले घर की दहलीज लांघकर डोरगा समूह की कार्यकर्ता के रूप में अपना सफर शुरू करने वाली गीता देवी आज खुद समूह की अध्यक्ष हैं। आचार, मुरब्बा, जैम-जैली व सिरका जैसे उत्पाद बनाकर वह देशभर में नाम कमा रही हैं। 45 साल की गीता देवी कुछ कर गुजरने की चाहत रखने वाली उन महिलाओं के लिए मिसाल हैं, जिनके जज्बे ने तमाम बंदिशों को झेलकर अपना एक मुकाम बनाया।
ब्लॉक फूलबेहड़ के ज्ञानपुर गांव की रहने वाली गीता देवी पिछले छह साल से दुर्गा स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष हैं। वह देश में कई जगहों पर अपने हुनर का लोहा मनवा चुकी हैं। अपने संघर्ष के दौर को यादकर गीता देवी बताती हैं कि घर की माली हालत ठीक न होने की वजह से शादी के बाद से ही वह कुछ करना चाहती थीं, लेकिन सास-ससुर का सख्त पहरा और हिदायत थी कि घर से बाहर नहीं निकलना है।
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बताती हैं कि किसी तरह उन्होंने सबको मनाया। घर से बाहर सम्मानजनक काम की तलाश शुरू की। 1996 में वह डोगरा स्वयं सहायता समूह के संपर्क में आईं। तभी से उन्होंने कुछ रचनात्मक करने की शुरुआत की। गीता देवी बताती हैं कि 2011-12 में उन्होंने खुद प्रशिक्षण हासिल किया और स्वयं सहायता समूह के जरिये अचार, मुरब्बा, जैम-जैली व सिरका आदि बनाना शुरू किया।
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2015 से राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के जरिये गीता देवी ने देश के कई हिस्सों में लगने वाली प्रदर्शनियों में अपने स्टॉल लगाने शुरू कर दिये, जिससे उन्हें अच्छी आमदनी होना शुरू हो गई। गीता देवी बताती हैं कि वह दो दिन पहले ही बनारस से लौटी हैं। वह गुजरात, बिलासपुर, पटियाला, वाराणसी, लखनऊ आदि जगहों पर स्टॉल लगा चुकी हैं। बकौल गीता देवी, दूर-दूर जाने की वजह से उन्हें सामान ले जाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, इसलिये वह अब एक कार लेने की योजना बना रही हैं।
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साल 2015 में यूपी सरकार से पा चुकी हैं लक्ष्मीबाई पुरस्कार लखीमपुर खीरी। 25 साल पहले घर की दहलीज लांघकर डोरगा समूह की कार्यकर्ता के रूप में अपना सफर शुरू करने वाली गीता देवी आज खुद समूह की अध्यक्ष हैं। आचार, मुरब्बा, जैम-जैली व सिरका जैसे उत्पाद बनाकर वह देशभर में नाम कमा रही हैं। 45 साल की गीता देवी कुछ कर गुजरने की चाहत रखने वाली उन महिलाओं के लिए मिसाल हैं, जिनके जज्बे ने तमाम बंदिशों को झेलकर अपना एक मुकाम बनाया।
ब्लॉक फूलबेहड़ के ज्ञानपुर गांव की रहने वाली गीता देवी पिछले छह साल से दुर्गा स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष हैं। वह देश में कई जगहों पर अपने हुनर का लोहा मनवा चुकी हैं। अपने संघर्ष के दौर को यादकर गीता देवी बताती हैं कि घर की माली हालत ठीक न होने की वजह से शादी के बाद से ही वह कुछ करना चाहती थीं, लेकिन सास-ससुर का सख्त पहरा और हिदायत थी कि घर से बाहर नहीं निकलना है।
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बताती हैं कि किसी तरह उन्होंने सबको मनाया। घर से बाहर सम्मानजनक काम की तलाश शुरू की। 1996 में वह डोगरा स्वयं सहायता समूह के संपर्क में आईं। तभी से उन्होंने कुछ रचनात्मक करने की शुरुआत की। गीता देवी बताती हैं कि 2011-12 में उन्होंने खुद प्रशिक्षण हासिल किया और स्वयं सहायता समूह के जरिये अचार, मुरब्बा, जैम-जैली व सिरका आदि बनाना शुरू किया।
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2015 से राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के जरिये गीता देवी ने देश के कई हिस्सों में लगने वाली प्रदर्शनियों में अपने स्टॉल लगाने शुरू कर दिये, जिससे उन्हें अच्छी आमदनी होना शुरू हो गई। गीता देवी बताती हैं कि वह दो दिन पहले ही बनारस से लौटी हैं। वह गुजरात, बिलासपुर, पटियाला, वाराणसी, लखनऊ आदि जगहों पर स्टॉल लगा चुकी हैं। बकौल गीता देवी, दूर-दूर जाने की वजह से उन्हें सामान ले जाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, इसलिये वह अब एक कार लेने की योजना बना रही हैं।