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दिन में तीन बार रंग बदलता है दिव्य शिवलिंग
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लिलौटीनाथ मंदिर का दिव्य शिवलिंग।
रहस्यमयी विशेषताओं के लिए प्रसिद्घ है महाभारतकालीन लिलौटीनाथ मंदिर
मान्यता है कि भोर प्रहर में दिव्य आत्मा करती है शिवलिंग की पूजा
लखीमपुर खीरी। शहर से करीब नौ किलोमीटर दूर सुरम्य प्राकृतिक परिवेश में कंडवा नदी के किनारे स्थित प्राचीन लिलौटीनाथ मंदिर के बारे में कहा जाता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान भगवान श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में यहां शिवलिंग की स्थापना की थी।
बताया जाता है कि महाभारत काल में कौरव और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा ने अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए इस शिवलिंग की स्थापना की थी। आज भी अश्वथामा यहां नियमित रूप से पूजा अर्चना के लिए आते हैं। मान्यता है कि रात में गर्भग्रह की साफ सफाई कर मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। सुबह जब इस मंदिर को खोला जाता है तो शिवलिंग जल, दूध, बेलपत्र, फूल और अक्षत आदि से पूजित मिलता है। शिवलिंग की एक विशेषता यह भी है कि वह दिन में तीन बार रंग बदलता है।
मंदिर का शिखर करीब 50 फिट ऊंचा है। गुंबदाकार शिखर पर कंगूरेदार आकृतियां बनी हुई हैं, जो इसे आकर्षक स्वरूप प्रदान करती हैं। मंदिर के गर्भगृह में भूरे रंग का दिव्य शिवलिंग स्थापित है, जिसमें सामने की ओर एक आकृति बनी हुई है। इस आकृति को शिवभक्त मां पार्वती के रूप में देखते हैं। मुख्य मंदिर के चारों और बरामदा है, जिसे लोग परिक्रमा पथ के रूप में इस्तेमाल करते हैं। मंदिर के बाहर नंदी की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के बगल में श्रद्घालुओं ने सत्संग और अन्य धार्मिक आयोजनों के लिए विशाल और खुले हाल का निर्माण कराया है। साल की सभी अमावस्या पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्घालु जुटते हैं। सावन के सोमवार को मेला लगता है। दूर-दूर से कांवड़िये गंगाजल लाकर दिव्य शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। महाशिवरात्रि पर यहां रात भर धार्मिक आयोजनों का सिलसिला चलता है।
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मान्यता है कि भोर प्रहर में दिव्य आत्मा करती है शिवलिंग की पूजा
लखीमपुर खीरी। शहर से करीब नौ किलोमीटर दूर सुरम्य प्राकृतिक परिवेश में कंडवा नदी के किनारे स्थित प्राचीन लिलौटीनाथ मंदिर के बारे में कहा जाता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान भगवान श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में यहां शिवलिंग की स्थापना की थी।
बताया जाता है कि महाभारत काल में कौरव और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा ने अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए इस शिवलिंग की स्थापना की थी। आज भी अश्वथामा यहां नियमित रूप से पूजा अर्चना के लिए आते हैं। मान्यता है कि रात में गर्भग्रह की साफ सफाई कर मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। सुबह जब इस मंदिर को खोला जाता है तो शिवलिंग जल, दूध, बेलपत्र, फूल और अक्षत आदि से पूजित मिलता है। शिवलिंग की एक विशेषता यह भी है कि वह दिन में तीन बार रंग बदलता है।
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मंदिर का शिखर करीब 50 फिट ऊंचा है। गुंबदाकार शिखर पर कंगूरेदार आकृतियां बनी हुई हैं, जो इसे आकर्षक स्वरूप प्रदान करती हैं। मंदिर के गर्भगृह में भूरे रंग का दिव्य शिवलिंग स्थापित है, जिसमें सामने की ओर एक आकृति बनी हुई है। इस आकृति को शिवभक्त मां पार्वती के रूप में देखते हैं। मुख्य मंदिर के चारों और बरामदा है, जिसे लोग परिक्रमा पथ के रूप में इस्तेमाल करते हैं। मंदिर के बाहर नंदी की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के बगल में श्रद्घालुओं ने सत्संग और अन्य धार्मिक आयोजनों के लिए विशाल और खुले हाल का निर्माण कराया है। साल की सभी अमावस्या पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्घालु जुटते हैं। सावन के सोमवार को मेला लगता है। दूर-दूर से कांवड़िये गंगाजल लाकर दिव्य शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। महाशिवरात्रि पर यहां रात भर धार्मिक आयोजनों का सिलसिला चलता है।
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