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जिंदगी भर साथ निभाया, साथ ही छोड़ी दुनिया
अमर उजाला ब्यूरो-लखीमपुर खीरी/फरधान।
Updated Thu, 02 Jun 2016 11:22 PM IST
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हादसा
- फोटो : अमर उजाला
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दो सेवानिवृत्त शिक्षकों की मौतों से गांव में छाया मातमी सन्नाटा
शिक्षक भाइयों की मौत से दोनों परिवार सदमे में हैं। उनके खुशमिजाज स्वभाव और व्यवहार को याद कर लोगों की आंखें डबडबा जाती हैं। बेशक देवदत्त और देवेंद्र चचेरे भाई थे, लेकिन दोनों का प्यार सगे भाइयों से कम न था। जिंदगी भर दोनों ने साथ निभाया और दुनिया से विदा हुए तो भी साथ। उनकी मौत से गांव का मंजर बदला हुआ था। दोनों भाइयों के मृदुल स्वभाव के कारण हरेक व्यक्ति उनका कायल था। गुरुवार सुबह हुए हादसे की जानकारी जिसे मिली वह मौके की ओर दौड़ पड़ा।
देवेंद्र दत्त वाजपेयी और देवदत्त वाजपेयी के अलग-अलग मकान थे लेकिन दोनों में जमती खूब थी। खुशी का कोई कार्यक्रम हो या फिर अन्य कोई बात, हर काम से पहले दोनों भाई एक साथ बैठ कर विचार-विमर्श करते थे। गांव वालों के सुखदुख में हाथ बंटाने में आगे रहते थे। देवदत्त के भाई यज्ञदत्त ने बताया देवेंद्र दत्त सात साल पहले 2009 में उच्च प्राथमिक विद्यालय रामपुर गोकुल से रिटायर हुए जबकि देवदत्त वर्ष 2015 में। नौकरी के दौरान भी दोनों एक-दूसरे से सारी बातें साझा करते थे। सेवानिवृत्त होने के बाद दोनों और करीब आ गए। दोनों ने एक राय होकर अपनी दिनचर्या में मॉर्निंग वाक को भी शामिल किया। इस क्रम में रोज दोनों लखीमपुर-मोहम्मदी रोड पर साइकिल से टहलने निकलते थे। गुरुवार की सुबह भी वे सैर को निकले थे। वे नहीं उनके शव घर लौटे। दोनों के एक-एक पुत्र हैं। देवदत्त के बेटे पंकज केंद्रीय विद्यालय लखीमपुर में शिक्षक हैं जबकि देवेंद्र दत्त के पुत्र मुकेश वकालत करते हैं।
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शिक्षक भाइयों की मौत से दोनों परिवार सदमे में हैं। उनके खुशमिजाज स्वभाव और व्यवहार को याद कर लोगों की आंखें डबडबा जाती हैं। बेशक देवदत्त और देवेंद्र चचेरे भाई थे, लेकिन दोनों का प्यार सगे भाइयों से कम न था। जिंदगी भर दोनों ने साथ निभाया और दुनिया से विदा हुए तो भी साथ। उनकी मौत से गांव का मंजर बदला हुआ था। दोनों भाइयों के मृदुल स्वभाव के कारण हरेक व्यक्ति उनका कायल था। गुरुवार सुबह हुए हादसे की जानकारी जिसे मिली वह मौके की ओर दौड़ पड़ा।
देवेंद्र दत्त वाजपेयी और देवदत्त वाजपेयी के अलग-अलग मकान थे लेकिन दोनों में जमती खूब थी। खुशी का कोई कार्यक्रम हो या फिर अन्य कोई बात, हर काम से पहले दोनों भाई एक साथ बैठ कर विचार-विमर्श करते थे। गांव वालों के सुखदुख में हाथ बंटाने में आगे रहते थे। देवदत्त के भाई यज्ञदत्त ने बताया देवेंद्र दत्त सात साल पहले 2009 में उच्च प्राथमिक विद्यालय रामपुर गोकुल से रिटायर हुए जबकि देवदत्त वर्ष 2015 में। नौकरी के दौरान भी दोनों एक-दूसरे से सारी बातें साझा करते थे। सेवानिवृत्त होने के बाद दोनों और करीब आ गए। दोनों ने एक राय होकर अपनी दिनचर्या में मॉर्निंग वाक को भी शामिल किया। इस क्रम में रोज दोनों लखीमपुर-मोहम्मदी रोड पर साइकिल से टहलने निकलते थे। गुरुवार की सुबह भी वे सैर को निकले थे। वे नहीं उनके शव घर लौटे। दोनों के एक-एक पुत्र हैं। देवदत्त के बेटे पंकज केंद्रीय विद्यालय लखीमपुर में शिक्षक हैं जबकि देवेंद्र दत्त के पुत्र मुकेश वकालत करते हैं।
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