सेठ घाट पर आज उमड़ेगा श्रद्धा का सैलाब

Lakhimpur Updated Mon, 19 Nov 2012 12:00 PM IST
सूर्य अराधना का पर्व छठ पूजा शुरू
सिटी रिपोर्टर
लखीमपुर खीरी। सोमवार की शाम और मंगलवार की सुबह शहर के सेठ घाट पर श्रद्धा का सैलाब दिखेगा। छठ पूजा का अनुष्ठान शुरू हो चुका है। शनिवार से शुरू हुई छठ पूजा की प्रक्रिया मंगलवार की सुबह उदय होते सूर्य को अर्ध्य देने के साथ समाप्त होगी। इसके लिए सेठ घाट पर व्यापक तैयारियां की गई हैं। पूरे आयोजन स्थल को भव्यता से सजाया गया है।
छठ पूजा का पर्व विहार और पूर्वांचल में खास तौर से मनाया जाता है। संतानों की सलामती के लिए की जानी वाली पूजा आज पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो चुकी है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की छठ को मनाया जाने वाला यह पर्व तीन दिनों तक चलता है। मुख्य पूजा के दो दिन पहले यानि चौथ से महिलाएं ब्रत रखना शुरू कर देती हैं। यह पूजा मंदिरों में न होकर घर के पूजा स्थल और नदियों के किनारे होती है।
पहले दिन यानि चौथ को मौसमी फल, केले की पूरी गौर और इस पर्व पर खास तौर से बनाए जाने वाले पकवान ठेकुआ जिसे विहार में खजूर कहते हैं। बाजरे के आटे और गुड़ और तिल से बना यह पकवान पुआ जैसा होता है के साथ नारियल, मूली, अखरोट, बादाम, लाल पीला कपड़ा और एक बड़ा घड़ा जिस पर 12 दीपक लगे हों पूजा स्थल पर रखकर उपवास करती है। शाम को लौकी, चने की दाल और चावल खाकर व्रत तोड़ती हैं।
दूसरे दिन महिलाएं पूरे दिन उपवास रखकर शाम को गन्ने के रस की खीर बनाकर पूजास्थल पर पांच जगह मिट्टी के बर्तनों में रखकर पूजा की जाती है। इसी खीर को उपवासी महिलाएं खाकर व्रत तोड़ती है और इसी का प्रसाद वितरित किया जाता है।
तीसरे दिन 24 घंटे का निर्जल व्रत होता है। शाम को बांस की टोकरी में पूजा की सारी सामग्री रखकर घर के पूजा स्थल पर रख दिया जाता है। गन्ने का छत्र बनाकर बनाकर मिट्टी का बड़ा बर्तन, दीपक तथा मिट्टी का हाथी बनाकर रखा जाता है। उसी छत्र के नीचे पूजा का सारा सामान भी रख दिया जाता है। पूजा अर्चना के बाद सारी पूजा सामग्री नदी किनारे ले जाई जाती है। जहां नदी किनारे रंगोली बनाकर पूजा सामग्री और नारियल अर्पित करती हैं। महिलाएं घुटनों तक जल में खड़ी होकर अस्ताचल सूर्य को अर्ध्य देती हैं। अगले दिन उदय होते सूर्य को अर्ध्य देने के साथ छठ पूजा का समापन होता है।
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यह है छठ पूजा का इतिहास
छठ पूजा की शुरुआत महाभारत काल में कुंती ने सूर्य की अराधना पुत्र कर्ण के जन्म के समय से मानी जाती है। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य भगवान की बहन हैं और उन्हीं का प्रसन्न करने के लिए यह पूजा होती है। जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य, जल की महत्ता को मानते हुए इन्हीं को साक्षी मानकर नदी के किनारे सूर्य की आराधना की जाती है।

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