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Kushinagar News: दुदही के ‘लाल चंदन’ पर धंधेबाजों की नजर...जिम्मेदार बेखबर
Fri, 30 May 2025 11:40 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Fri, 30 May 2025 11:40 PM IST
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दुदही/कुशीनगर। लाल चंदन के नाम से प्रसिद्ध खैरा की लकड़ी की तस्करी सरकारी जंगल से फिर शुरू हो गई है। वन विभाग और स्थानीय पुलिस की सुस्ती के कारण जिले से बिहार तक के धंधेबाज सक्रिय हो गए हैं। पांच से अधिक खैरा के काटे गए पेड़ों की जड़ें जंगल में नजर आ रही हैं।
गांव वालों ने इसकी शिकायत वन विभाग से भी की है, लेकिन इसको लेकर जिम्मेदार गंभीर नहीं हैं और धंधेबाज मालामाल हो रहे हैं। यह हाल तब है जब लकड़ी की तस्करी की पुष्टि हो चुकी है और पूर्व में खैरा की लकड़ी काटकर बेचने वाले कई धंधेबाजों पर कार्रवाई भी की जा चुकी है। तमकुहीराज रेंज के दुदही ब्लॉक के बांसगांव खैरवा एवं बैकुंठपुर कोठी तक सरकारी जंगल करीब 20 हेक्टेयर से अधिक जमीन में फैला है। इसमें खैरा के सबसे अधिक पेड़ हैं।
कई ऐसे पेड़ हैं जो 70 वर्ष पुराने बताए जा रहे हैं। खैरा के पेड लाल चंदन के नाम से मशहूर है। आयुर्वेदिक दवा बनाने के अलावा इसका इस्तेमाल कई कामों में किया जाता है। सूत्रों के अनुसार, इन पुराने पेड़ों को एक-एक करके तस्कर वन विभाग कर्मचारियों की मिलीभगत से काट ले रहे हैं। रात करीब दो बजे से पांच बजे भोर तक तस्करों का जंगल में राज रहता है।
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रात में पेड़ काटकर उठा ले जा रहे हैं या कही घरों में छोटा-छोटा पेड़ों का टुकड़ा कर छिपा दे रहे हैं। एक ट्राॅली या एक पिकअप भर लकड़ी हो जाती है तो तस्कर बाहरी व्यापारियों से मोटी रकम लेकर इसे बेच देते हैं। इसकी मोटी कीमत मिलती है।
वर्ष 2017 में 94 बोटा खैरा की लकड़ी पकड़ी गई थी। पुलिस ने इसका मूल्य 75 लाख बताया था। क्षेत्र के अलीम अंसारी, व्यास, अशोक सिंह, नूर आलम, प्रभु भारती, सागर प्रेमी, मोतीलाल आदि ने इस तस्करी पर रोक लगाने की मांग की है।
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गांव वालों ने इसकी शिकायत वन विभाग से भी की है, लेकिन इसको लेकर जिम्मेदार गंभीर नहीं हैं और धंधेबाज मालामाल हो रहे हैं। यह हाल तब है जब लकड़ी की तस्करी की पुष्टि हो चुकी है और पूर्व में खैरा की लकड़ी काटकर बेचने वाले कई धंधेबाजों पर कार्रवाई भी की जा चुकी है। तमकुहीराज रेंज के दुदही ब्लॉक के बांसगांव खैरवा एवं बैकुंठपुर कोठी तक सरकारी जंगल करीब 20 हेक्टेयर से अधिक जमीन में फैला है। इसमें खैरा के सबसे अधिक पेड़ हैं।
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कई ऐसे पेड़ हैं जो 70 वर्ष पुराने बताए जा रहे हैं। खैरा के पेड लाल चंदन के नाम से मशहूर है। आयुर्वेदिक दवा बनाने के अलावा इसका इस्तेमाल कई कामों में किया जाता है। सूत्रों के अनुसार, इन पुराने पेड़ों को एक-एक करके तस्कर वन विभाग कर्मचारियों की मिलीभगत से काट ले रहे हैं। रात करीब दो बजे से पांच बजे भोर तक तस्करों का जंगल में राज रहता है।
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रात में पेड़ काटकर उठा ले जा रहे हैं या कही घरों में छोटा-छोटा पेड़ों का टुकड़ा कर छिपा दे रहे हैं। एक ट्राॅली या एक पिकअप भर लकड़ी हो जाती है तो तस्कर बाहरी व्यापारियों से मोटी रकम लेकर इसे बेच देते हैं। इसकी मोटी कीमत मिलती है।
वर्ष 2017 में 94 बोटा खैरा की लकड़ी पकड़ी गई थी। पुलिस ने इसका मूल्य 75 लाख बताया था। क्षेत्र के अलीम अंसारी, व्यास, अशोक सिंह, नूर आलम, प्रभु भारती, सागर प्रेमी, मोतीलाल आदि ने इस तस्करी पर रोक लगाने की मांग की है।