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अहिरौलीदान के ग्रामीणों को सताने लगी अपने मकानों की चिंता
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अहिरौलीदान के ग्रामीणों को सताने लगी अपने मकानों की चिंता
तमकुहीरोड (कुशीनगर)। अहिरौलीदान में बांध के किनारे बसे कचहरी टोला का लगभग तीन चौथाई हिस्सा पहले ही गंडक नदी में समा गया है। जिन लोगों के मकान बच गए हैं, उन्हें अभी से अपने मकानों की सुरक्षा की चिंता सताने लगी है। मानसून सत्र शुरू होने में मात्र तीन महीने का समय शेष है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते बचाव कार्य शुरू नहीं कराया गया तो इस गांव का वजूद भी खतरे में पड़ सकता है।
अहिरौलीदान बिहार बार्डर पर बसा घनी आबादी वाला गांव है। इसकी सुरक्षा के लिए बनाए गए एपी बांध के उत्तरी हिस्से से होकर गंडक नदी बहती है। वर्ष 2012 के पहले यह नदी बांध से कई किलोमीटर की दूरी पर थी और बांध व नदी के बीच कई घनी आबादी वाले गांव बसे थे, लेकिन कटान के चलते जब नदी ने वर्ष 2012 के बाद बांध की तरफ रुख किया तो सबसे पहले बैरिया टोला को निशाना बनाया और वह गांव नदी की धारा में विलीन हो गया। उसके बाद 2017 में गंडक नदी के बाढ़ व कटान के जद में आने से कंचन टोला व चित्तू टोला का वजूद भी खत्म हो गया, जबकि कचहरी टोला में नदी ने ऐसा तांडव मचाया कि पूर्व प्रधान हरिकिशुन सिंह, धुरंधर सिंह, बलिस्टर सिंह, नंदकिशोर सिंह, रामनरेश सिंह, रामाज्ञा सिंह, गया सिंह, अंबिका सिंह, बब्बन सिंह, बिंदेश्वरी सिंह सहित डेढ़ सौ से अधिक लोगों के मकान नदी की धारा में बह गए थे। इसके बाद तमकुहीराज तहसील प्रशासन की ओर से अधिकांश लोगों को सहायता धनराशि भी उपलब्ध कराई गई थी। उस भीषण कटान के बावजूद भी अरविंद सिंह पटेल, जेपी सिंह, रविंद्र सिंह, विक्रमा सिंह, रामायन सिंह, हीरा सिंह, विनोद सिंह सहित 25 से अधिक लोगों का घर सुरक्षित बच गया था। बीते वर्ष भी नदी ने कचहरी टोला के शेष हिस्से को निशाने पर लिया था, लेकिन बाढ़ खंड की तत्परता से किसी प्रकार की क्षति नहीं हुई थी। अब मानसून आने में तीन महीने का समय रह गया तो लोगों को अपने मकानों की सुरक्षा की चिंता सताने लगी है।
बाढ़ खंड तृतीय के सहायक अभियंता एसके प्रियदर्शी ने बताया कि बचाव कार्य शुरू होने पर कटान को रोकने के लिए पुख्ता इंतजाम किए जाएंगे।
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तमकुहीरोड (कुशीनगर)। अहिरौलीदान में बांध के किनारे बसे कचहरी टोला का लगभग तीन चौथाई हिस्सा पहले ही गंडक नदी में समा गया है। जिन लोगों के मकान बच गए हैं, उन्हें अभी से अपने मकानों की सुरक्षा की चिंता सताने लगी है। मानसून सत्र शुरू होने में मात्र तीन महीने का समय शेष है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते बचाव कार्य शुरू नहीं कराया गया तो इस गांव का वजूद भी खतरे में पड़ सकता है।
अहिरौलीदान बिहार बार्डर पर बसा घनी आबादी वाला गांव है। इसकी सुरक्षा के लिए बनाए गए एपी बांध के उत्तरी हिस्से से होकर गंडक नदी बहती है। वर्ष 2012 के पहले यह नदी बांध से कई किलोमीटर की दूरी पर थी और बांध व नदी के बीच कई घनी आबादी वाले गांव बसे थे, लेकिन कटान के चलते जब नदी ने वर्ष 2012 के बाद बांध की तरफ रुख किया तो सबसे पहले बैरिया टोला को निशाना बनाया और वह गांव नदी की धारा में विलीन हो गया। उसके बाद 2017 में गंडक नदी के बाढ़ व कटान के जद में आने से कंचन टोला व चित्तू टोला का वजूद भी खत्म हो गया, जबकि कचहरी टोला में नदी ने ऐसा तांडव मचाया कि पूर्व प्रधान हरिकिशुन सिंह, धुरंधर सिंह, बलिस्टर सिंह, नंदकिशोर सिंह, रामनरेश सिंह, रामाज्ञा सिंह, गया सिंह, अंबिका सिंह, बब्बन सिंह, बिंदेश्वरी सिंह सहित डेढ़ सौ से अधिक लोगों के मकान नदी की धारा में बह गए थे। इसके बाद तमकुहीराज तहसील प्रशासन की ओर से अधिकांश लोगों को सहायता धनराशि भी उपलब्ध कराई गई थी। उस भीषण कटान के बावजूद भी अरविंद सिंह पटेल, जेपी सिंह, रविंद्र सिंह, विक्रमा सिंह, रामायन सिंह, हीरा सिंह, विनोद सिंह सहित 25 से अधिक लोगों का घर सुरक्षित बच गया था। बीते वर्ष भी नदी ने कचहरी टोला के शेष हिस्से को निशाने पर लिया था, लेकिन बाढ़ खंड की तत्परता से किसी प्रकार की क्षति नहीं हुई थी। अब मानसून आने में तीन महीने का समय रह गया तो लोगों को अपने मकानों की सुरक्षा की चिंता सताने लगी है।
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बाढ़ खंड तृतीय के सहायक अभियंता एसके प्रियदर्शी ने बताया कि बचाव कार्य शुरू होने पर कटान को रोकने के लिए पुख्ता इंतजाम किए जाएंगे।