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सूत और हाथ से बने कपड़े ने दिलाई नई पहचान
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खादी वस्त्र के लिए सूत कताई करती महिला।
- फोटो : KUSHINAGAR
सूत और हाथ से बने कपड़ों ने सपहा दिलाई पहचान
300 परिवारों की चल रही आजीविका, 291 महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर
पडरौना/गुरवलिया बाजार। सूत और हाथ से बने कपड़े ने ‘सपहा’ को नई पहचान दिलाई है। यहां 12 साल पहले स्थापित हथकरघा उद्योग (खादी ग्रामोद्योग) से 300 परिवारों की आजीविका चल रही है। 291 महिलाएं आत्मनिर्भर बनी हैं।
यहां हाथ से बनी दरी और काटे गए सूत की बिक्री देश भर में होती है। इसकी गुणवत्ता बेहतरीन होने से लोग इसके प्रति आकर्षित हो रहे हैं। ग्रामोद्योग के संस्थापक पंकज पांडेय, उनके पिता जयराम पांडेय ने बताया कि वर्ष 2010 में 25 कारीगरों के साथ काम शुरू किया गया था। इस उद्योग के स्थापित होने से क्षेत्र की महिलाओं को रोजगार मिला। शुरुआत में एक तकली चरखा प्रयोग किया जाता था, लेकिन तत्कालीन लघु एवं सूक्ष्म उद्योग मंत्री कलराज मिश्र ने संस्था को काफी सहयोग किया।
उन्होंने कहा कि बाद में खादी ग्रामोद्योग बोर्ड ने 100 चरखों की व्यवस्था कर दी। इससे मांग के अनुरूप सूत कताई होने लगी। बंगाल, बिजनौर, राजस्थान, उत्तराखंड, बिहार आदि जगहों पर यहां से उत्पाद भेजा जाता है। यहां के बने कपड़ों की रंगाई बेहतरीन होती है। कई वर्षों तक कपड़े चमकदार बने रहते हैं। अब कुर्ता, पायजामा, लुंगी, धोती, पैंट, शर्ट आदि भी निर्यात किया जा रहा है।
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लागत मूल्य पर तिरंगा की बिक्री
सपहा का खादी ग्रामोद्योग संस्थान तिरंगा भी बनाता है। इसे लागत मूल्य पर बेचा जा रहा है। अब तक 1,300 झंडे बेचे जा चुके हैं।
...
कोट
यहां के सूत और खादी वस्त्रों की पहचान कई राज्यों तक है। गुणवत्ता के कारण टर्नओवर भी बढ़ रहा है। इस उद्योग से 291 महिलाएं आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।
पंकज पांडेय, उद्यमी, खादी ग्रामोद्योग संस्थान सपहा
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300 परिवारों की चल रही आजीविका, 291 महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर
पडरौना/गुरवलिया बाजार। सूत और हाथ से बने कपड़े ने ‘सपहा’ को नई पहचान दिलाई है। यहां 12 साल पहले स्थापित हथकरघा उद्योग (खादी ग्रामोद्योग) से 300 परिवारों की आजीविका चल रही है। 291 महिलाएं आत्मनिर्भर बनी हैं।
यहां हाथ से बनी दरी और काटे गए सूत की बिक्री देश भर में होती है। इसकी गुणवत्ता बेहतरीन होने से लोग इसके प्रति आकर्षित हो रहे हैं। ग्रामोद्योग के संस्थापक पंकज पांडेय, उनके पिता जयराम पांडेय ने बताया कि वर्ष 2010 में 25 कारीगरों के साथ काम शुरू किया गया था। इस उद्योग के स्थापित होने से क्षेत्र की महिलाओं को रोजगार मिला। शुरुआत में एक तकली चरखा प्रयोग किया जाता था, लेकिन तत्कालीन लघु एवं सूक्ष्म उद्योग मंत्री कलराज मिश्र ने संस्था को काफी सहयोग किया।
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उन्होंने कहा कि बाद में खादी ग्रामोद्योग बोर्ड ने 100 चरखों की व्यवस्था कर दी। इससे मांग के अनुरूप सूत कताई होने लगी। बंगाल, बिजनौर, राजस्थान, उत्तराखंड, बिहार आदि जगहों पर यहां से उत्पाद भेजा जाता है। यहां के बने कपड़ों की रंगाई बेहतरीन होती है। कई वर्षों तक कपड़े चमकदार बने रहते हैं। अब कुर्ता, पायजामा, लुंगी, धोती, पैंट, शर्ट आदि भी निर्यात किया जा रहा है।
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लागत मूल्य पर तिरंगा की बिक्री
सपहा का खादी ग्रामोद्योग संस्थान तिरंगा भी बनाता है। इसे लागत मूल्य पर बेचा जा रहा है। अब तक 1,300 झंडे बेचे जा चुके हैं।
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कोट
यहां के सूत और खादी वस्त्रों की पहचान कई राज्यों तक है। गुणवत्ता के कारण टर्नओवर भी बढ़ रहा है। इस उद्योग से 291 महिलाएं आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।
पंकज पांडेय, उद्यमी, खादी ग्रामोद्योग संस्थान सपहा