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अपनों को भी संभाल नहीं पाई सपा
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सपा का दावा था कि उसके 18 सदस्य चुनाव जीते हैं
कई निर्दलीयों के भी साथ रहने का था दावा लेकिन वोट मिले केवल 15
उदयभान त्रिपाठी
पडरौना। जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में सदस्य संख्या के आधार पर पहले सपा मजबूत दिख रही थी। इसके उलट जब मतदान हुआ तो दो तिहाई सदस्य भाजपा उम्मीदवार के साथ चले गए।
जनपद में जिला पंचायत सदस्याें की संख्या 61 है। अध्यक्ष पद पर जीत के लिए 32 सदस्यों के समर्थन की जरूरत थी। भाजपा और सपा के अलावा कांग्रेस व बसपा ने भी सदस्य पद पर उम्मीदवार उतारे थे। परिणाम आया तो भाजपा के पास केवल 06 सदस्य थे। सपा के 13 उम्मीदवार चुनाव जीते थे। हालांकि बाद में सपा ने दावा किया कि उसके पास 18 सदस्य हैं।
अन्य विपक्षी दलों के सदस्य भी भाजपा विरोध के चलते सपा के साथ रहेंगे। सपा के इस अति उत्साह को तब और बल मिल गया जब बसपा छोड़कर पूर्व सांसद बालेश्वर यादव भी सपा में आ गए। सपा ने पूर्व सांसद बालेश्वर यादव की पुत्री को जिला पंचायत अध्यक्ष का उम्मीदवार बना दिया। इसके बाद दावा किया गया कि अपनी पार्टी के अलावा अन्य दलों व निर्दलीयों को मिलाकर 37 सदस्य सपा के साथ हैं। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ा, सपा के समर्थक सदस्य भी भाजपा के पाले में जुड़ते चले गए।
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भाजपा उम्मीदवार को जिन 46 सदस्यों का साथ मिला है, उसमें से कई ऐसे हैं जो सपा के अत्यंत करीबी हैं लेकिन इस चुनाव में पार्टी उन्हें अपने पाले में रखने में सफल नहीं हो पाई। वरना जिला पंचायत अध्यक्ष का यह चुनाव इतना आसान नहीं रह जाता।
सपा जिलाध्यक्ष डॉ. मनोज यादव बोले, जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीतने के लिए हमारे पर पर्याप्त संख्या बल था। हार के कारणों की समीक्षा की जाएगी। कार्यकर्ता हतोत्साहित नहीं हैं। पार्टी पूरे दमखम से आगामी विधानसभा चुनाव लड़ेगी और विजयश्री हासिल करेगी।
भाजपा एक-एक सदस्य की कर रही थी निगरानी
एक तरफ जहां सपा अपने परंपरागत वोटर भी सहेज नहीं पा रही थी तो दूसरी तरफ भाजपा के रणनीतिकारों ने सपा के करीबी माने जाने वालों को अगली कतार में रखा। इसके अलावा प्रत्येक सदस्य की गतिविधि पर पूरी नजर रखी गई। सभी विधायक अपने क्षेत्र के जीते हुए जिला पंचायत सदस्यों के सीधे संपर्क में थे। ब्लॉक प्रमुख पद का चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे उम्मीदवारों को भी पहले जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीत लेने के मिशन पर लगाया गया था।
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कई निर्दलीयों के भी साथ रहने का था दावा लेकिन वोट मिले केवल 15
उदयभान त्रिपाठी
पडरौना। जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में सदस्य संख्या के आधार पर पहले सपा मजबूत दिख रही थी। इसके उलट जब मतदान हुआ तो दो तिहाई सदस्य भाजपा उम्मीदवार के साथ चले गए।
जनपद में जिला पंचायत सदस्याें की संख्या 61 है। अध्यक्ष पद पर जीत के लिए 32 सदस्यों के समर्थन की जरूरत थी। भाजपा और सपा के अलावा कांग्रेस व बसपा ने भी सदस्य पद पर उम्मीदवार उतारे थे। परिणाम आया तो भाजपा के पास केवल 06 सदस्य थे। सपा के 13 उम्मीदवार चुनाव जीते थे। हालांकि बाद में सपा ने दावा किया कि उसके पास 18 सदस्य हैं।
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अन्य विपक्षी दलों के सदस्य भी भाजपा विरोध के चलते सपा के साथ रहेंगे। सपा के इस अति उत्साह को तब और बल मिल गया जब बसपा छोड़कर पूर्व सांसद बालेश्वर यादव भी सपा में आ गए। सपा ने पूर्व सांसद बालेश्वर यादव की पुत्री को जिला पंचायत अध्यक्ष का उम्मीदवार बना दिया। इसके बाद दावा किया गया कि अपनी पार्टी के अलावा अन्य दलों व निर्दलीयों को मिलाकर 37 सदस्य सपा के साथ हैं। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ा, सपा के समर्थक सदस्य भी भाजपा के पाले में जुड़ते चले गए।
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भाजपा उम्मीदवार को जिन 46 सदस्यों का साथ मिला है, उसमें से कई ऐसे हैं जो सपा के अत्यंत करीबी हैं लेकिन इस चुनाव में पार्टी उन्हें अपने पाले में रखने में सफल नहीं हो पाई। वरना जिला पंचायत अध्यक्ष का यह चुनाव इतना आसान नहीं रह जाता।
सपा जिलाध्यक्ष डॉ. मनोज यादव बोले, जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीतने के लिए हमारे पर पर्याप्त संख्या बल था। हार के कारणों की समीक्षा की जाएगी। कार्यकर्ता हतोत्साहित नहीं हैं। पार्टी पूरे दमखम से आगामी विधानसभा चुनाव लड़ेगी और विजयश्री हासिल करेगी।
भाजपा एक-एक सदस्य की कर रही थी निगरानी
एक तरफ जहां सपा अपने परंपरागत वोटर भी सहेज नहीं पा रही थी तो दूसरी तरफ भाजपा के रणनीतिकारों ने सपा के करीबी माने जाने वालों को अगली कतार में रखा। इसके अलावा प्रत्येक सदस्य की गतिविधि पर पूरी नजर रखी गई। सभी विधायक अपने क्षेत्र के जीते हुए जिला पंचायत सदस्यों के सीधे संपर्क में थे। ब्लॉक प्रमुख पद का चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे उम्मीदवारों को भी पहले जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीत लेने के मिशन पर लगाया गया था।