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एक बार उतार चुके थे बजट, दोबारा बजट लेने को भेज दी फाइल
कुश्ाीनगर (ब्यूरो)
Updated Thu, 21 Dec 2017 12:14 AM IST
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शौचालय
- फोटो : कुश्ाीनगर ब्यूरो
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पडरौना। स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण योजना के तहत गांव-गांव बनवाए जा रहे शौचालयों के निर्माण में बड़ी खामी सामने आई है। जिम्मेदारों की मनमानी के चलते शौचालय निर्माण के लिए मिला बजट उन्हें आवंटित किया जा रहा है, जो इसके लिए या तो पात्र ही नहीं हैं या फिर पहले भी वे इस योजना का लाभ ले चुके हैं। हाटा ब्लाक के भैंसही गांव में इस तरह के मामले की पुष्टि के बाद डीपीआरओ ने उस गांव में बने 37 शौचालयों के निर्माण कार्य को श्रमदान घोषित करते हुए उनके भुगतान पर रोक लगा दी है।
जिले में वर्ष 2004 से ही स्वच्छता मिशन के तहत शौचालय निर्माण का कार्य चल रहा है। वर्ष 2014 में सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के तहत अगले पांच वर्ष में गांवों को खुले में शौच मुक्त बनाने का अभियान शुरू किया था। शौचालय निर्माण की धनराशि भी बढ़ाकर 12000 रुपये कर दी गई। इस योजना के तहत ग्राम पंचायत के जरिए जरूरत मंद लोगों के घर शौचालय का निर्माण कराया जा रहा है। इसके अलावा जो लोग इस योजना से प्रेरित होकर खुद भी शौचालय निर्माण करा रहे हैं उन्हें पंचायतीराज विभाग की तरफ से जांच के उपरांत 12 हजार रुपये की आर्थिक मदद दी जाती है।
इसके अलावा विभाग की तरफ से गांवों को खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) बनाने के लिए विशेष अभियान के तहत चयन करके वहां जागरूकता कार्यक्रम व शौचालय निर्माण का कार्य कराया जाता है। ओडीएफ घोषित गांवों के ग्राम प्रधानों को सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित कर प्रमाण पत्र भी दिया जा रहा है।
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इतनी मेहनत के बावजूद इस योजना में भी भ्रष्टाचार बढ़ चला है। लगातार डीएम, सीडीओ व डीपीआरओ के पास इस तरह की शिकायतें आती हैं जिनमें या तो वास्तविक लाभार्थी को योजना का लाभ नहीं दिया गया अथवा गलत लोगों को लाभ देने की बात कही जाती है। डीपीआरओ राघवेंद्र द्विवेदी ने ऐसे मामलों की जांच शुरू कराई तो कई चौंकाने वाले खुलासे होने लगे। ऐसा ही एक प्रकरण हाटा ब्लाक के गांव भैंसही का सामने आया। इस गांव में पिछले ग्राम प्रधान के कार्यकाल में ही 452 शौचालयों का निर्माण हो चुका था।
इसके बाद वर्ष 2016 में भी इस ग्राम सभा को शौचालय निर्माण के लिए बजट आवंटित हुआ। परंतु 37 शौचालय ऐसे लोगों को आवंटित कर दिए गए जिन्हें पूर्व की योजना में भी इसका लाभ मिल चुका है। जांच में मामला सही पाए जाने पर डीपीआरओ ने ग्राम प्रधान से जवाब तलब किया। मामला फंसता देख गांव के ग्राम पंचायत अधिकारी ने इन लाभार्थियों को मिलने वाले धन का चेक नहीं काटा। जांच पूरी होने पर डीपीआरओ ने इन सभी 37 शौचालयों के निर्माण को ही श्रमदान घोषित करते हुए धन अवमुक्त करने पर रोक लगा दी।
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गांव के लोगों व विभागीय सूत्रों की मानें तो भैंसही गांव में एक ही लाभार्थियों को दुबारा शौचालय निर्माण का लाभ देने का मामला पूर्व व वर्तमान प्रधान के बीच चल रही अनबन से खुला। सूत्रों की मानें तो दोनों जब-तब एक दूसरे के खिलाफ शिकायत करते रहते हैं। इस तरह का प्रकरण जब डीपीआरओ के पास पहुंचा तो इसकी विधिवत जांच कराई गई। जिन 37 लाभार्थियों के शौचालय निर्माण के लिए धन अवमुक्त करने की मांग हो रही थी उनको पहले भी इसका लाभ मिल चुका था। इधर नए बने शौचालय के लिए धन अवमुक्त करने की बाद हो रही थी।
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भैंसही गांव में बने 37 शौचालयों के निर्माण कार्य को श्रमदान घोषित करते हुए भुगतान पर रोक लगा दी गई है। इस तरह के कई अन्य प्रकरण भी संज्ञान में आए हैं जहां नियम विरुद्घ तरीके से शौचालय निर्माण कराए गए हैं। ऐसे मामलों की जांच कराकर गलत लाभार्थियों से धन की रिकवरी कराई जाएगी। संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होगी।
राघवेंद्र द्विवेदी-डीपीआरओ, कुशीनगर
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जिले में वर्ष 2004 से ही स्वच्छता मिशन के तहत शौचालय निर्माण का कार्य चल रहा है। वर्ष 2014 में सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के तहत अगले पांच वर्ष में गांवों को खुले में शौच मुक्त बनाने का अभियान शुरू किया था। शौचालय निर्माण की धनराशि भी बढ़ाकर 12000 रुपये कर दी गई। इस योजना के तहत ग्राम पंचायत के जरिए जरूरत मंद लोगों के घर शौचालय का निर्माण कराया जा रहा है। इसके अलावा जो लोग इस योजना से प्रेरित होकर खुद भी शौचालय निर्माण करा रहे हैं उन्हें पंचायतीराज विभाग की तरफ से जांच के उपरांत 12 हजार रुपये की आर्थिक मदद दी जाती है।
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इसके अलावा विभाग की तरफ से गांवों को खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) बनाने के लिए विशेष अभियान के तहत चयन करके वहां जागरूकता कार्यक्रम व शौचालय निर्माण का कार्य कराया जाता है। ओडीएफ घोषित गांवों के ग्राम प्रधानों को सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित कर प्रमाण पत्र भी दिया जा रहा है।
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इतनी मेहनत के बावजूद इस योजना में भी भ्रष्टाचार बढ़ चला है। लगातार डीएम, सीडीओ व डीपीआरओ के पास इस तरह की शिकायतें आती हैं जिनमें या तो वास्तविक लाभार्थी को योजना का लाभ नहीं दिया गया अथवा गलत लोगों को लाभ देने की बात कही जाती है। डीपीआरओ राघवेंद्र द्विवेदी ने ऐसे मामलों की जांच शुरू कराई तो कई चौंकाने वाले खुलासे होने लगे। ऐसा ही एक प्रकरण हाटा ब्लाक के गांव भैंसही का सामने आया। इस गांव में पिछले ग्राम प्रधान के कार्यकाल में ही 452 शौचालयों का निर्माण हो चुका था।
इसके बाद वर्ष 2016 में भी इस ग्राम सभा को शौचालय निर्माण के लिए बजट आवंटित हुआ। परंतु 37 शौचालय ऐसे लोगों को आवंटित कर दिए गए जिन्हें पूर्व की योजना में भी इसका लाभ मिल चुका है। जांच में मामला सही पाए जाने पर डीपीआरओ ने ग्राम प्रधान से जवाब तलब किया। मामला फंसता देख गांव के ग्राम पंचायत अधिकारी ने इन लाभार्थियों को मिलने वाले धन का चेक नहीं काटा। जांच पूरी होने पर डीपीआरओ ने इन सभी 37 शौचालयों के निर्माण को ही श्रमदान घोषित करते हुए धन अवमुक्त करने पर रोक लगा दी।
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गांव के लोगों व विभागीय सूत्रों की मानें तो भैंसही गांव में एक ही लाभार्थियों को दुबारा शौचालय निर्माण का लाभ देने का मामला पूर्व व वर्तमान प्रधान के बीच चल रही अनबन से खुला। सूत्रों की मानें तो दोनों जब-तब एक दूसरे के खिलाफ शिकायत करते रहते हैं। इस तरह का प्रकरण जब डीपीआरओ के पास पहुंचा तो इसकी विधिवत जांच कराई गई। जिन 37 लाभार्थियों के शौचालय निर्माण के लिए धन अवमुक्त करने की मांग हो रही थी उनको पहले भी इसका लाभ मिल चुका था। इधर नए बने शौचालय के लिए धन अवमुक्त करने की बाद हो रही थी।
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भैंसही गांव में बने 37 शौचालयों के निर्माण कार्य को श्रमदान घोषित करते हुए भुगतान पर रोक लगा दी गई है। इस तरह के कई अन्य प्रकरण भी संज्ञान में आए हैं जहां नियम विरुद्घ तरीके से शौचालय निर्माण कराए गए हैं। ऐसे मामलों की जांच कराकर गलत लाभार्थियों से धन की रिकवरी कराई जाएगी। संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होगी।
राघवेंद्र द्विवेदी-डीपीआरओ, कुशीनगर