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Kushinagar News: चार माह में 2208 अति कुपोषित बच्चों में से सिर्फ 53 को मिला उपचार
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मेडिकल कॉलेज में पोषण पुनर्वास केंद्र में खाली पड़े बेड।
एनआरसी खाली, 2155 बच्चों का कागजों पर हो रहा उपचार
जून से सितंबर तक चार महीने में 2208 अति कुपोषित व 10,237 कुपोषित बच्चे चिह्नित
पोषण पुनर्वास केंद्र में नौ महीने में सिर्फ 111 अति कुपोषित बच्चे हुए भर्ती
पडरौना। जिले में कुपोषण को मिटाने के सरकारी दावों के बीच कुपोषित बच्चों के उपचार और देखभाल में गंभीर लापरवाही सामने आई है। जून से सितंबर तक जिले में 2,208 अति कुपोषित बच्चों की पहचान हुई लेकिन इनमें से सिर्फ 53 को ही पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराया गया। ऐसे में 2,155 बच्चे केंद्र में भर्ती होकर मिलने वाले उपचार से वंचित रह गए।
जिलेभर में जून से सितंबर तक चार महीने में 2208 सैम (अति कुपोषित) और 10,237 मैम (कुपोषित) बच्चों की पहचान की गई लेकिन इनमें से सिर्फ 53 सैम बच्चों को ही पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराया जा सका। शेष 2,155 अत्यंत गंभीर बच्चे उदासीनता के कारण बिना इलाज के रहने को मजबूर हैं। वहीं नियम और मेडिकल गाइडलाइन कहती है कि ‘सैम’ श्रेणी में आने वाले बच्चों की जान को सीधा खतरा होता है और उन्हें तत्काल विशेष देखभाल व चिकित्सा की जरूरत होती है।
वहीं, जनवरी से सितंबर यानी नौ महीने में पोषण पुनर्वास केंद्र में सिर्फ 111 अति कुपोषित बच्चों को ही भर्ती कर आहार व उपचार किया गया है। जिले में चिह्नित अधिकांश बच्चे अब भी एनआरसी की सुविधा से दूर हैं। ऐसे बच्चों को समय पर उपचार न मिलने से अति कुपोषित बच्चों में संक्रमण और गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी और विभागीय उदासीनता के कारण बच्चों को केंद्र तक नहीं लाया जा रहा है।
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कई स्थानों पर आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की निगरानी व्यवस्था भी कमजोर होती दिखाई दे रही है। माहवार अति कुपोषित व कुपोषित बच्चों को चिह्नित किया जाता है। इसमें गंभीर बच्चों को अस्पताल में भर्ती किया जाता है और अन्य बच्चों को उनके घर पर ही पोषण संबंधी सामग्री उपलब्ध कराई जाती है।
पोषण पुनर्वास केंद्र में अति कुपोषित बच्चों में सुधार की स्थिति
जिले में संचालित 10 बेड के पोषण पुनर्वास केंद्र में 15 दिन भर्ती कर अति कुपोषित बच्चों को वजन, लंबाई व बांह की मोटाई के मुताबिक निर्धारित मानक के मुताबिक आहार दिया जाता है। इसके बाद उन्हें घर भेज दिया जाता है लेकिन ऐसे बच्चों का फॉलोअप किया जाता है। यह फॉलोअप डिस्चार्ज होने के 15, 30, 45 और 60 दिन पर चार बार होता है। इससे जुड़ी इस तरह कुछ केस हिस्ट्री सामने आई है।
केस एक
पोषण पुनर्वास केंद्र में एक अति कुपोषित बच्चे को 26 अगस्त 2026 को भर्ती कर उपचार और निर्धारित मानक के मुताबिक आहार दिया गया। उसे केंद्र से पांच सितंबर को डिस्चार्ज कर दिया गया। 15 दिन पर पहले फॉलोअप में बच्चे के वजन में वृद्धि दर्ज की गई। बच्चे का वजन 10.300 किलोग्राम से बढ़कर 11.950 किलोग्राम हो गया था।
केस दो
पोषण पुनर्वास केंद्र में 22 अगस्त 2026 को एक अति कुपोषित बच्चे को भर्ती किया गया। वहां उपचार और निर्धारित मानक के मुताबिक आहार व चिकित्सकीय सलाह के साथ उपचार के बाद सात सितंबर 2026 को डिस्चार्ज कर दिया गया। केंद्र पर 15 दिन बाद फॉलोअप में 6.440 किलोग्राम वजन से घटकर 6.220 किलोग्राम हो गया था।
2026 में अब तक माहवार पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती बच्चों का विवरण:
जनवरी- 06
फरवरी- 10
मार्च- 10
अप्रैल- 10
मई -15
जून- 13
जुलाई- 10
अगस्त - 14
सितंबर- 20
अक्तूबर- 03
वर्जन
अधिकांश सैम बच्चों का चिकित्सकीय प्रबंधन समुदाय स्तर पर करा दिया जाता है। पीएचसी पर स्वास्थ्य परीक्षण कराकर सैम बच्चों के लिए निर्धारित छह दवाएं उपलब्ध करा दी जाती हैं। साथ ही पोषण के मामले में उनके अभिभावकों की काउंसिलिंग कराई जाती है। जिन बच्चों के वजन में वृद्धि नहीं होती है उन्हें रेफर पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) किया जाता है। - एके दूबे, जिला कार्यक्रम अधिकारी, कुशीनगर
ये होते हैं सैम और मैम बच्चे
अति कुपोषित (सैम) : गंभीर अति कुपोषित बच्चे, जिन्हें तत्काल उपचार की जरूरत होती है।
कुपोषित (मैम): मध्यम कुपोषित बच्चे, जिन्हें अतिरिक्त पोषण और निगरानी की आवश्यकता होती है।
कटघरे में स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, अति कुपोषित बच्चों को तुरंत भर्ती न करने पर उनके अंगों के फेल होने व संक्रमण से जान जाने की खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे में ये सवाल लाजिमी है...
जब अति कुपोषित बच्चों की पहचान जून, जुलाई, अगस्त व सितंबर में हो चुकी थी तो उन्हें एनआरसी (पोषण पुनर्वास केंद्र) में भर्ती क्यों नहीं कराया गया?
क्या स्वास्थ्य विभाग की जमीनी टीमें (एएनएम, आशा) कार्यकर्ता फील्ड में सिर्फ कागजी खानापूर्ति कर रही हैं?
चिह्नित बच्चों के माता-पिता को जागरूक करने और उन्हें अस्पताल तक लाने में विभाग क्यों नाकाम रहा?
-सरकार कुपोषण मुक्ति के लिए हर साल भारी-भरकम बजट पानी की तरह बहा रही है। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि चिह्नित हो चुके बच्चों को भी उपचार नसीब नहीं हो पा रहा है।
समय रहते इन मासूमों का सही पोषण और इलाज नहीं मिला, तो जिले में स्थिति और भयावह हो सकती है।
वर्जन
मेडिकल कॉलेज में एनआरसी 10 बेड का संचालित होता है। इलाज के लिए पूरा इंतजाम हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को कुपोषित बच्चों को भेजना चाहिए। आरबीएसके (राष्ट्रीय बाल सुरक्षा कार्यक्रम) टीम से भी इस मामले में जवाब तलब किया जाएगा क्योंकि यह टीम ग्राउंड लेवल पर हर रोज जाती है। कुपोषित बच्चे एनआरसी तक नहीं पहुंच रहे हैं, इसलिए इलाज नहीं मिल रहा है।
- डॉ. चंद्रप्रकाश, सीएमओ, कुशीनगर
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जून से सितंबर तक चार महीने में 2208 अति कुपोषित व 10,237 कुपोषित बच्चे चिह्नित
पोषण पुनर्वास केंद्र में नौ महीने में सिर्फ 111 अति कुपोषित बच्चे हुए भर्ती
पडरौना। जिले में कुपोषण को मिटाने के सरकारी दावों के बीच कुपोषित बच्चों के उपचार और देखभाल में गंभीर लापरवाही सामने आई है। जून से सितंबर तक जिले में 2,208 अति कुपोषित बच्चों की पहचान हुई लेकिन इनमें से सिर्फ 53 को ही पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराया गया। ऐसे में 2,155 बच्चे केंद्र में भर्ती होकर मिलने वाले उपचार से वंचित रह गए।
जिलेभर में जून से सितंबर तक चार महीने में 2208 सैम (अति कुपोषित) और 10,237 मैम (कुपोषित) बच्चों की पहचान की गई लेकिन इनमें से सिर्फ 53 सैम बच्चों को ही पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराया जा सका। शेष 2,155 अत्यंत गंभीर बच्चे उदासीनता के कारण बिना इलाज के रहने को मजबूर हैं। वहीं नियम और मेडिकल गाइडलाइन कहती है कि ‘सैम’ श्रेणी में आने वाले बच्चों की जान को सीधा खतरा होता है और उन्हें तत्काल विशेष देखभाल व चिकित्सा की जरूरत होती है।
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वहीं, जनवरी से सितंबर यानी नौ महीने में पोषण पुनर्वास केंद्र में सिर्फ 111 अति कुपोषित बच्चों को ही भर्ती कर आहार व उपचार किया गया है। जिले में चिह्नित अधिकांश बच्चे अब भी एनआरसी की सुविधा से दूर हैं। ऐसे बच्चों को समय पर उपचार न मिलने से अति कुपोषित बच्चों में संक्रमण और गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी और विभागीय उदासीनता के कारण बच्चों को केंद्र तक नहीं लाया जा रहा है।
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कई स्थानों पर आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की निगरानी व्यवस्था भी कमजोर होती दिखाई दे रही है। माहवार अति कुपोषित व कुपोषित बच्चों को चिह्नित किया जाता है। इसमें गंभीर बच्चों को अस्पताल में भर्ती किया जाता है और अन्य बच्चों को उनके घर पर ही पोषण संबंधी सामग्री उपलब्ध कराई जाती है।
पोषण पुनर्वास केंद्र में अति कुपोषित बच्चों में सुधार की स्थिति
जिले में संचालित 10 बेड के पोषण पुनर्वास केंद्र में 15 दिन भर्ती कर अति कुपोषित बच्चों को वजन, लंबाई व बांह की मोटाई के मुताबिक निर्धारित मानक के मुताबिक आहार दिया जाता है। इसके बाद उन्हें घर भेज दिया जाता है लेकिन ऐसे बच्चों का फॉलोअप किया जाता है। यह फॉलोअप डिस्चार्ज होने के 15, 30, 45 और 60 दिन पर चार बार होता है। इससे जुड़ी इस तरह कुछ केस हिस्ट्री सामने आई है।
केस एक
पोषण पुनर्वास केंद्र में एक अति कुपोषित बच्चे को 26 अगस्त 2026 को भर्ती कर उपचार और निर्धारित मानक के मुताबिक आहार दिया गया। उसे केंद्र से पांच सितंबर को डिस्चार्ज कर दिया गया। 15 दिन पर पहले फॉलोअप में बच्चे के वजन में वृद्धि दर्ज की गई। बच्चे का वजन 10.300 किलोग्राम से बढ़कर 11.950 किलोग्राम हो गया था।
केस दो
पोषण पुनर्वास केंद्र में 22 अगस्त 2026 को एक अति कुपोषित बच्चे को भर्ती किया गया। वहां उपचार और निर्धारित मानक के मुताबिक आहार व चिकित्सकीय सलाह के साथ उपचार के बाद सात सितंबर 2026 को डिस्चार्ज कर दिया गया। केंद्र पर 15 दिन बाद फॉलोअप में 6.440 किलोग्राम वजन से घटकर 6.220 किलोग्राम हो गया था।
2026 में अब तक माहवार पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती बच्चों का विवरण:
जनवरी- 06
फरवरी- 10
मार्च- 10
अप्रैल- 10
मई -15
जून- 13
जुलाई- 10
अगस्त - 14
सितंबर- 20
अक्तूबर- 03
वर्जन
अधिकांश सैम बच्चों का चिकित्सकीय प्रबंधन समुदाय स्तर पर करा दिया जाता है। पीएचसी पर स्वास्थ्य परीक्षण कराकर सैम बच्चों के लिए निर्धारित छह दवाएं उपलब्ध करा दी जाती हैं। साथ ही पोषण के मामले में उनके अभिभावकों की काउंसिलिंग कराई जाती है। जिन बच्चों के वजन में वृद्धि नहीं होती है उन्हें रेफर पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) किया जाता है। - एके दूबे, जिला कार्यक्रम अधिकारी, कुशीनगर
ये होते हैं सैम और मैम बच्चे
अति कुपोषित (सैम) : गंभीर अति कुपोषित बच्चे, जिन्हें तत्काल उपचार की जरूरत होती है।
कुपोषित (मैम): मध्यम कुपोषित बच्चे, जिन्हें अतिरिक्त पोषण और निगरानी की आवश्यकता होती है।
कटघरे में स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, अति कुपोषित बच्चों को तुरंत भर्ती न करने पर उनके अंगों के फेल होने व संक्रमण से जान जाने की खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे में ये सवाल लाजिमी है...
जब अति कुपोषित बच्चों की पहचान जून, जुलाई, अगस्त व सितंबर में हो चुकी थी तो उन्हें एनआरसी (पोषण पुनर्वास केंद्र) में भर्ती क्यों नहीं कराया गया?
क्या स्वास्थ्य विभाग की जमीनी टीमें (एएनएम, आशा) कार्यकर्ता फील्ड में सिर्फ कागजी खानापूर्ति कर रही हैं?
चिह्नित बच्चों के माता-पिता को जागरूक करने और उन्हें अस्पताल तक लाने में विभाग क्यों नाकाम रहा?
-सरकार कुपोषण मुक्ति के लिए हर साल भारी-भरकम बजट पानी की तरह बहा रही है। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि चिह्नित हो चुके बच्चों को भी उपचार नसीब नहीं हो पा रहा है।
समय रहते इन मासूमों का सही पोषण और इलाज नहीं मिला, तो जिले में स्थिति और भयावह हो सकती है।
वर्जन
मेडिकल कॉलेज में एनआरसी 10 बेड का संचालित होता है। इलाज के लिए पूरा इंतजाम हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को कुपोषित बच्चों को भेजना चाहिए। आरबीएसके (राष्ट्रीय बाल सुरक्षा कार्यक्रम) टीम से भी इस मामले में जवाब तलब किया जाएगा क्योंकि यह टीम ग्राउंड लेवल पर हर रोज जाती है। कुपोषित बच्चे एनआरसी तक नहीं पहुंच रहे हैं, इसलिए इलाज नहीं मिल रहा है।
- डॉ. चंद्रप्रकाश, सीएमओ, कुशीनगर