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निर्भय बनाकर अन्याय से लड़ने का साहस देती है लोक संस्कृति : प्रो. सदानंद
Mon, 15 Apr 2024 02:54 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Mon, 15 Apr 2024 02:54 AM IST
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लोकरंग कार्यक्रम में पत्रिका का विमोचन करते अतिथि।
फाजिलनगर। सांस्कृतिक भड़ैती, फूहड़पन के विरुद्ध जनसंस्कृति के संवर्द्धन के लिए क्षेत्र के जोगिया जनूबी पट्टी गांव में पत्रिका विमोचन के साथ दो दिवसीय 17वें लोकरंग का रविवार की रात आगाज हुआ। इसके बाद देश भर आए विभिन्न कलाकारों ने विलुप्त हो रही लोक लोकसंस्कृतियों को अपनी प्रस्तुति से जीवंत किया।
मुख्य अतिथि बीएचयू के पूर्व कुलपति व हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर सदानंद शाही ने कहा कि लोकसंस्कृति हमें निर्भय बनाने के साथ हर अन्याय के प्रतिकार का साहस देती है। हर तरह के डर का प्रतिकार करती है। अन्याय करने वाली सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध रचती है। लोकसंस्कृति कथनी के बजाय करनी पर और दोनों के एकरूपता पर जोर देती है। लोकगाथाओं ने हमेशा श्रमशील लोगों की प्रतिष्ठा की है। लोकसंस्कृति ही हमारे देश की आत्मा है। देश को जानना ही असल देशभक्ति है। यदि अपने देश की नदियों, वनस्पतियों, रीति रिवाज, संस्कृति और सबसे बढ़कर अपने लोगों को नहीं जानना ही देशभक्ति है। उन्होंने कहा कि लोक कलाओं का संरक्षण और उत्थान आसान काम नहीं है। यह धारा के विपरीत तैरना है। पूरी दुनिया, देश का प्रेम हासिल करने के लिए कुछ देना पड़ता है।
इसके पूर्व लोकरंग पत्रिका का मुख्य अतिथि सहित बीआरडी मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रोफेसर केपी कुशवाहा, डॉ. किरन कुशवाहा, प्रोफेसर नीरज खरे, प्रोफेसर कमलेश वर्मा, डॉ. रवि शंकर सोनकर, डॉ. आशा सिंह, महेंद्र प्रसाद कुशवाहा, अपर्णा, रामजी यादव, नीदरलैंड से आये मशहूर सरनामी गायक राजमोहन ने लोकार्पण किया। इसके बाद नीदरलैंड से आए राजमोहन, मानव डी, वरुण नंदा को प्रो सदानंद शाही ने अंग वस्त्र भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम के उद्घाटन के बाद गांव की महिलाएं मतिरानी देवी, सुशीला, हानतारा, खुशबुन व सुभागी ने अवधी सोहर सुनाकर लोगों को भावविभोर कर दिया। लोगगीत/जनगीत जीरादेई सिवान के मुख्य गायक आशुतोष संजना कुमारी आशु कुमारी की टीम ने अपने कार्यक्रम प्रस्तुत किए। कुशीनगर के मुख्य कलाकार ताज व उनकी टीम के गोरख शर्मा, बीरेंद्र प्रसाद, सोहित प्रसाद, सनातन मास्टर, जुनाब अली ने विलुप्त हो रहे पवारियां नृत्य को ऊंचाई दी। नटराज कल्लचर एसोसिएशन नालबारी असम की टीम ने बोडों नृत्य प्रस्तुत किया। इनके टीम में गितेन, नाबा गौतम धरमेन, तपन, संगीता, पल्वी, पिनाकी टीना पल्लानी मेदी रहे। ताल म्यूजिक एंड डांस एकेडमी नामची सिक्किम की टीम ने तमांग सेलो डांस की शानदार प्रस्तुति कर अपने कला का लोहा मनवा दिया। चंदालाल कालबेलिया जयपुर राजस्थान की टीम के कलाकार चंदालाल कालबेलिया, असरफ, लक्ष्मी देवी, मंजू सपेरा, संपत सपेरा, लक्ष्मी सपेरा ने कमाचा, खड़ताल, भपंग, अलगोजा, ढोलक की जुगलबंदी, सात मटके की भवई नृत्य और परंपरागत लोकगीत प्रस्तुत किया। अंत में भाई का विरोध, भिखारी ठाकुर रचित पारिवारिक नाटक लोगों को वर्तमान परिवेश पर सोचने को मजबूर कर दिया। कार्यक्रम का संचालन रीवा विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष कवि प्रोफेसर दिनेश कुशवाहा ने किया। अंत में कार्यक्रम के आयोजन समिति के अध्यक्ष सुबाष कुशवाहा ने आगंतुकों के प्रति आभार प्रकट किया। इस दौरान भुनेश्वर राय, सिकंदर, विष्णुदेव राय, हदीश अंसारी, नितांत सिंह, अनुभव राय आदि मौजूद रहे।
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मुख्य अतिथि बीएचयू के पूर्व कुलपति व हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर सदानंद शाही ने कहा कि लोकसंस्कृति हमें निर्भय बनाने के साथ हर अन्याय के प्रतिकार का साहस देती है। हर तरह के डर का प्रतिकार करती है। अन्याय करने वाली सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध रचती है। लोकसंस्कृति कथनी के बजाय करनी पर और दोनों के एकरूपता पर जोर देती है। लोकगाथाओं ने हमेशा श्रमशील लोगों की प्रतिष्ठा की है। लोकसंस्कृति ही हमारे देश की आत्मा है। देश को जानना ही असल देशभक्ति है। यदि अपने देश की नदियों, वनस्पतियों, रीति रिवाज, संस्कृति और सबसे बढ़कर अपने लोगों को नहीं जानना ही देशभक्ति है। उन्होंने कहा कि लोक कलाओं का संरक्षण और उत्थान आसान काम नहीं है। यह धारा के विपरीत तैरना है। पूरी दुनिया, देश का प्रेम हासिल करने के लिए कुछ देना पड़ता है।
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इसके पूर्व लोकरंग पत्रिका का मुख्य अतिथि सहित बीआरडी मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रोफेसर केपी कुशवाहा, डॉ. किरन कुशवाहा, प्रोफेसर नीरज खरे, प्रोफेसर कमलेश वर्मा, डॉ. रवि शंकर सोनकर, डॉ. आशा सिंह, महेंद्र प्रसाद कुशवाहा, अपर्णा, रामजी यादव, नीदरलैंड से आये मशहूर सरनामी गायक राजमोहन ने लोकार्पण किया। इसके बाद नीदरलैंड से आए राजमोहन, मानव डी, वरुण नंदा को प्रो सदानंद शाही ने अंग वस्त्र भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम के उद्घाटन के बाद गांव की महिलाएं मतिरानी देवी, सुशीला, हानतारा, खुशबुन व सुभागी ने अवधी सोहर सुनाकर लोगों को भावविभोर कर दिया। लोगगीत/जनगीत जीरादेई सिवान के मुख्य गायक आशुतोष संजना कुमारी आशु कुमारी की टीम ने अपने कार्यक्रम प्रस्तुत किए। कुशीनगर के मुख्य कलाकार ताज व उनकी टीम के गोरख शर्मा, बीरेंद्र प्रसाद, सोहित प्रसाद, सनातन मास्टर, जुनाब अली ने विलुप्त हो रहे पवारियां नृत्य को ऊंचाई दी। नटराज कल्लचर एसोसिएशन नालबारी असम की टीम ने बोडों नृत्य प्रस्तुत किया। इनके टीम में गितेन, नाबा गौतम धरमेन, तपन, संगीता, पल्वी, पिनाकी टीना पल्लानी मेदी रहे। ताल म्यूजिक एंड डांस एकेडमी नामची सिक्किम की टीम ने तमांग सेलो डांस की शानदार प्रस्तुति कर अपने कला का लोहा मनवा दिया। चंदालाल कालबेलिया जयपुर राजस्थान की टीम के कलाकार चंदालाल कालबेलिया, असरफ, लक्ष्मी देवी, मंजू सपेरा, संपत सपेरा, लक्ष्मी सपेरा ने कमाचा, खड़ताल, भपंग, अलगोजा, ढोलक की जुगलबंदी, सात मटके की भवई नृत्य और परंपरागत लोकगीत प्रस्तुत किया। अंत में भाई का विरोध, भिखारी ठाकुर रचित पारिवारिक नाटक लोगों को वर्तमान परिवेश पर सोचने को मजबूर कर दिया। कार्यक्रम का संचालन रीवा विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष कवि प्रोफेसर दिनेश कुशवाहा ने किया। अंत में कार्यक्रम के आयोजन समिति के अध्यक्ष सुबाष कुशवाहा ने आगंतुकों के प्रति आभार प्रकट किया। इस दौरान भुनेश्वर राय, सिकंदर, विष्णुदेव राय, हदीश अंसारी, नितांत सिंह, अनुभव राय आदि मौजूद रहे।
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